प्रमोद जोशी
अरसे से अनुमान था कि पश्चिम एशिया में पाकिस्तान की पहल पर पचास के दशक में हुए ‘बग़दाद पैक्ट’ या ‘सेंटो’ को फिर से जगाया जा सकता है, जिसे ‘इस्लामिक ‘नेटो’ भी कहा गया था. कमोबेश उसी तर्ज पर एक नई संधि की शुरुआत पिछले हफ्ते हो गई है.
सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में गत 7अगस्त को क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मक्का समझौते पर दस्तखत कर दिए हैं.
हालांकि मिस्र और क़तर ने शुरुआती चर्चाओं में भाग लिया था, लेकिन शुक्रवार को हुई चर्चा में उनका उल्लेख प्रतिभागी के रूप में नहीं किया गया. फिर भी, कुछ नए देशों के इसमें शामिल होने की संभावनाएँ खुली हुई हैं.
समझौते को दुनियाभर के विशेषज्ञों ने अलग-अलग नज़रों से देखा है. मसलन क्षेत्रीय और वैश्विक भू-राजनीति, सऊदी-ईरान और इसराइल रिश्ते, अमेरिका और दूसरी ताकतों की भूमिका और भारत का नज़रिया. मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी की सार्थकता को लेकर भी सवाल हैं.
समझौते का पाठ सार्वजनिक रूप से जारी नहीं किया गया है, जिससे तीनों देशों के दायित्वों के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है. अलबत्ता पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि समझौते में प्रावधान है कि तीनों में से किसी एक देश पर भी सशस्त्र हमला हुआ, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा.
इसी बयान के अनुसार, तीनों देश एक वर्ष से वार्ता में शामिल थे. इसकी शुरुआत सितंबर 2025में, पाकिस्तान और सऊदी अरब के रक्षा समझौते से हुई. समझौते ने सऊदी अरब की बढ़ती असुरक्षा और तेजी से अस्थिर होते क्षेत्र में सुरक्षा की बड़ी भूमिका निभाने की पाकिस्तान की बढ़ती इच्छा दोनों को उजागर किया.
अब, तुर्की के शामिल होने से, लगता है कि यह गठबंधन रणनीतिक गहराई और फौजी ताकत दोनों हासिल करना चाहता है.
समझौतों की शृंखला
यह समझौता लाल सागर में हमलों को रोकने के लिए एक समुद्री गठबंधन बनाने के प्रयासों के बाद हुआ है. पिछले महीने, सऊदी अरब ने दर्जनों देशों को इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया था.
14देशों ने इसके लिए अपना समर्थन जताया है. अभी स्पष्ट नहीं है कि वह गठबंधन भी कैसे काम करेगा. सऊदी अरब के अलावा गठबंधन के शेष 13सदस्य हैं तुर्की, कुवैत, बहरीन, क़तर, जॉर्डन, मिस्र, पाकिस्तान, जिबूती, सोमालिया, बांग्लादेश, यमन, सूडान और कोमोरोस.
संयुक्त अरब अमीरात और ओमान, जो अमेरिका के करीबी सहयोगी हैं, उस गठबंधन में भी शामिल नहीं हैं. इसके अलावा सऊदी अरब और अमेरिका के बीच नाभिकीय ऊर्जा से जुड़ा समझौता भी हुआ है।
कैसा रक्षा-सिद्धांत?
यह साफ नहीं है कि इसका कोई संगठन भी बनेगा या नहीं, क्या कोई मुख्यालय होगा, अपनी सेना होगी वगैरह. हमले की स्थिति में एक देश, दूसरे को किस प्रकार की सैन्य, राजनीतिक या रसद संबंधी सहायता प्रदान करेगा? सामूहिक रक्षा-सिद्धांत के तहत सैन्य बल का प्रयोग स्वतः अनिवार्य होगा या नहीं?
ये तीनों देश रक्षा उद्योग में अपना सहयोग बिल्कुल नए सिरे से शुरू नहीं कर रहे हैं. सऊदी अरब ने 2023में तुर्की को बायरक्तर अकिंसी यूएवी का ऑर्डर दिया था. इस समझौते में स्वदेशीकरण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण भी शामिल था.
बाद में एसेल्सान और रोकेत्सान ने सेंसर और गोला-बारूद पर सहयोग के माध्यम से इस कार्यक्रम में भाग लिया. अकिंसी कार्यक्रम ने एक औद्योगिक मॉडल स्थापित किया जिसे अब अन्य क्षेत्रों में भी विस्तारित किया जा सकता है.
पाँचवीं पीढ़ी का विमान
पाँचवीं पीढ़ी के विमानों की ‘कान’ परियोजना तुर्की-सऊदी औद्योगिक सहयोग का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र बन सकता है. तुर्की एयरोस्पेस ने फरवरी 2026में कहा था कि सऊदी अरब के साथ बातचीत उन्नत चरण में पहुँच गई है, जिसमें प्रत्यक्ष खरीद, कार्यक्रम में भागीदारी और संभावित स्थानीय उत्पादन शामिल हैं.
हालाँकि इस समय पाकिस्तान अपनी रक्षा-तकनीक के लिए काफी बद तक चीन के सहारे है, पर तुर्की के साथ उसका सहयोग बढ़ रहा है. इसमें युद्धपोतों का उत्पादन और पाँचवीं पीढ़ी के विमान की परियोजना भी शामिल है.
चार पोतों वाले मिल्जैम कार्यक्रम के तहत इस्तानबुल और कराची में निर्माण कार्य चल रहा है, वहीं पाकिस्तान एयरोनॉटिकल कॉम्प्लेक्स ने तुर्क वायुसेना को सुपर मशक बेसिक ट्रेनर विमानों की आपूर्ति की है.
अमेरिका की भूमिका
अमेरिकी विदेश-नीति में सऊदी अरब, तुर्की, क़तर और पाकिस्तान शक्तिशाली गुट के रूप में उभरे हैं. ये देश खुले तौर पर इसराइल-विरोधी हैं और कम से कम पाकिस्तान और तुर्की भारत-विरोधी भी हैं. हालाँकि क़तर इस गठबंधन में शामिल नहीं है, पर इसमें भविष्य की संभावनाओं के दरवाज़े खुले हुए हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने 7-8जुलाई को अंकारा में ‘नेटो’ के शिखर सम्मेलन में संकेत दिया कि वे, काट्सा प्रतिबंधों को हटाते हुए तुर्की को एफ-35लड़ाकू विमान कार्यक्रम में फिर से शामिल करने पर विचार कर रहे हैं, जो वाशिंगटन-अंकारा संबंधों में एक बड़ा बदलाव है.
भारत के लिए संकेत
समझौते के पीछे भारत के लिए भी संकेत हैं. पश्चिम एशिया में भारत और इसराइल के बीच रक्षा-तकनीक का सहयोग है. भारत-यूएई सहयोग भी बढ़ रहा है, जिसमें अंतरिक्ष-अनुसंधान और सामरिक सहयोग शामिल है.
यूएई अब सऊदी-समूह से अलग है. वहीं भारत का सऊदी अरब के साथ आर्थिक सहयोग जारी है, और दोनों देशों ने पाकिस्तान के संदर्भ में संतुलनकारी नीति को अपनाया है, पर हाल में यूएई की पाकिस्तान से कुछ दूरी भी नज़र आने लगी है.
तुर्की अब दक्षिण एशिया की राजनीति के और करीब आ गया है. वहीं भारत ने पूर्वी भूमध्य सागर में अपनी नौसैनिक उपस्थिति का विस्तार किया है. भारत ने पश्चिम एशिया आर्थिक गलियारे की पेशकश की है, जो तुर्की को बाईपास करेगा.
भारतीय पहल
भारत ने आर्मेनिया, साइप्रस, ग्रीस और इसराइल के साथ रक्षा संबंधों को गहरा किया है. आर्मेनिया 2022में भारत की आकाश सैम प्रणाली का पहला विदेशी खरीदार बन गया, जबकि ग्रीस और इसराइल भारत के साथ हवाई युद्ध और नौसैनिक अंतर-संचालनीयता पर ध्यान केंद्रित करते हुए संयुक्त अभ्यास करते हैं. ग्रीस, तुर्की का प्रतिस्पर्धी देश है.
संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर जैसे मुद्दों पर तुर्की, लगातार इस्लामाबाद के पक्ष में मतदान करता है. दोनों देश इस्लामी-राष्ट्रवाद की विचारधारा साझा करते हैं.
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान, तुर्की ने पाकिस्तान को 350से अधिक ड्रोन प्रदान किए और भारतीय लक्ष्यों के खिलाफ हमलों के लिए सैन्य सलाहकार तैनात किए. ऑपरेशन के दौरान उसने भारत की खुले तौर पर निंदा भी की.
JUST IN:
— The Geopolitics (@Newstoday555) August 6, 2026
🇮🇷 Iran has introduced new domestically developed air defense systems, describing them as a cost-effective alternative to high-priced foreign platforms.
Supporters say the systems have proven capable of downing aircraft worth millions of dollars, underscoring Iran's… pic.twitter.com/ZFYjWYCAeU
तुर्क-सऊदी अतीत
तुर्की के उस्मानिया साम्राज्य और सऊदी अरब के टकराव का लंबा इतिहास है, पर बीसवीं सदी की शुरुआत में उस्मानिया साम्राज्य के पतन और तीसरे सऊदी राज्य की स्थापना के बाद से चीजें काफी बदल चुकी हैं.
प्रथम विश्व युद्ध के बाद उस्मानिया साम्राज्य का पतन हो गया और तुर्की का वर्तमान गणराज्य उसका उत्तराधिकारी बना. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, तुर्की और सऊदी अरब दोनों अमेरिका के घनिष्ठ सहयोगी बन गए, लेकिन दोनों के बीच संबंध तनावपूर्ण ही बने रहे.
तुर्की ने 2010-11में ‘बहारे अरब’ के नाम से मगरिब से उठे जम्हूरी-तूफान का समर्थन किया, तो सऊदी अरब ने इन विद्रोहों को राजनीतिक स्थिरता के लिए खतरा माना.2018 में इस्तानबुल में सऊदी दूतावास के अंदर जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या के बाद संबंध और बिगड़े. कई क्षेत्रीय संघर्षों में भी वे एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं, जिनमें सबसे प्रमुख लीबिया का संघर्ष था.
हाल के वर्षों में यह प्रतिद्वंद्विता धीरे-धीरे कम होने लगी है, क्योंकि पश्चिम एशिया में संतुलन बदलने वाले कई घटनाक्रम देखने को मिले हैं.
सुरक्षा की तलाश
इसमें शामिल प्रत्येक सदस्य की अपनी-अपनी ताकत और कमजोरियाँ हैं. पाकिस्तान, मुस्लिम जगत का एकमात्र परमाणु शक्ति संपन्न देश है, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था मुश्किलों से जूझ रही है. सऊदी अरब, धन संपन्न है, लेकिन उसे गंभीर सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. खासतौर से ईरान और हूतियों से.
तुर्की के रक्षा-उद्योगों का आधार तेजी से बढ़ रहा है, जिसमें उन्नत ड्रोन उत्पादन क्षमताएँ शामिल हैं, लेकिन वह अपने पड़ोस में इसराइल के बढ़ते सैन्यवाद को लेकर चिंतित है.1940 के दशक के उत्तरार्ध से अब तक सऊदी अरब सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहा है.
बदले में उसने तेल की निर्बाध आपूर्ति का वादा किया था. पूर्वी एशिया में चीन के बढ़ते खतरे को देखते हुए, अमेरिका ने पश्चिम एशिया को कम तवज़्ज़ो दी. 2019में ईरान समर्थित हूतियों ने जब सऊदी तेल रिफाइनरियों पर हमले किए, तब अमेरिका ने कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं दी.
वैकल्पिक छतरी
उसके बाद से सऊदी अरब, सुरक्षा के लिए किसी वैकल्पिक छतरी की तलाश में है. 2023में, उसने चीनी मध्यस्थता में ईरान के साथ रिश्ते सामान्य बनाए. 7अक्तूबर, 2023को हमास के हमले के बाद इसराइल ने जब लड़ाई छेड़ी, तो सऊदी अरब की चिंता और बढ़ी.
क़तर पर इसराइली बमबारी के कुछ हफ़्तों बाद सितंबर 2025में सऊदी-पाकिस्तान रक्षा समझौते की घोषणा की गई. इस साल 28फरवरी को अमेरिका-इसराइल के ईरान पर हमलों के बाद रियाद को यह विश्वास हो गया कि अमेरिकी सुरक्षा गारंटी अब विश्वसनीय नहीं रही.
हालाँकि तुर्की ‘नेटो’ का सदस्य है, पर उसे अंदेशा है कि अमेरिका के सबसे करीबी सहयोगी, इसराइल के साथ संघर्ष की स्थिति में ‘नेटो’ की सामूहिक सुरक्षा गारंटी काम नहीं करेगी.‘नेटो’ खुद भी गंभीर आंतरिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, क्योंकि डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका उसमें दिलचस्पी कम दिखा रहा है.
पाकिस्तानी नज़रिया
तीसरा पक्षकार पाकिस्तान है, जो भारत के प्रति अपनी शत्रुता को इस गठबंधन से जोड़ेगा. खासतौर से उसे आशा है कि अब कश्मीर के मामले को वह ज्यादा शिद्दत से उठा सकेगा. इसके अलावा वह सऊदी पैसे अपना रक्षा-उद्योग को मज़बूत कर सकता है.
गठबंधन का मतलब यह भी नहीं है कि ईरान या हूतियों के साथ सऊदी लड़ाई में पाकिस्तान भी कूदेगा, या भारत-पाकिस्तान संघर्ष में तुर्की भी उतरेगा. सितंबर 2025में सऊदी-पाकिस्तान समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद, पाकिस्तान का तालिबानी अफगानिस्तान के साथ टकराव चल रहा है, पर सऊदी अरब ने कुछ नहीं किया.
सऊदी अरब पर ईरान और हूतियों ने बार-बार हमले किए हैं. लेकिन किसी दूसरे देश ने हस्तक्षेप नहीं किया. फिर भी, यह समझौता महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह तीन प्रमुख शक्तियों को एक साझा सुरक्षा ढाँचे के अंदर ले आया है.
संरचना बदलेगी
क्षेत्र के कुछ दूसरे देश भी इसमें शामिल होने के लिए प्रेरित हो सकते हैं, जबकि भारत, संयुक्त अरब अमीरात, इसराइल और ईरान सहित वे देश जिनके इस गठबंधन के सदस्यों के साथ संबंध सहज नहीं हैं, प्रति-संतुलनकारी रणनीति तलाशेंगे.
शीत युद्ध के दौरान ‘नेटो’ का सदस्य रहते हुए तुर्की ने ईरान, पाकिस्तान और यूनाइटेड किंगडम के साथ ‘सेंटो’ में भी भाग लिया था. ‘सेंटो’ ने ‘नेटो’ की सामूहिक रक्षा गारंटी को दक्षिण एशिया तक फैलाया नहीं.
बहरहाल मक्का समझौता ‘नेटो’ देशों से जुड़े सबसे महत्त्वपूर्ण समझौतों में से एक बनेगा. यह पूर्वी भूमध्य सागर और ‘नेटो’ के दक्षिण-पूर्वी हिस्से को खाड़ी, लाल सागर और हिंद महासागर से जोड़ेगा.

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