नौशाद अख्तर
हर साल स्वतंत्रता दिवस के करीब आते ही लोगों के मन में देश की आजादी के इतिहास को जानने की उत्सुकता बढ़ जाती है। लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर वे कौन सी बड़ी घटनाएं थीं जिनकी वजह से अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।
इन ऐतिहासिक मोड़ों के पीछे एक लंबा संघर्ष और बलिदान की पूरी कहानी छिपी है। आज के इस लेख में हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम के उन दस सबसे महत्वपूर्ण पड़ावों पर चर्चा कर रहे हैं जिन्होंने देश की किस्मत हमेशा के लिए बदल दी।
1857 का महान विद्रोह और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम
ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ यह देश का पहला बड़ा और संगठित सशस्त्र विद्रोह था। इस क्रांति ने अंग्रेजों के मन में खौफ पैदा कर दिया था। इसके दूरगामी परिणाम सामने आए और ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन हमेशा के लिए समाप्त हो गया। इसके बाद भारत की सत्ता का सीधा नियंत्रण ब्रिटिश क्राउन यानी महारानी के हाथों में चला गया।
1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना
देशभर में राजनीतिक चेतना जगाने के लिए साल 1885 में कांग्रेस की स्थापना की गई। एओ ह्यूम, दिनशॉ वाचा और दादाभाई नौरोजी जैसे दिग्गजों ने इसके गठन में अहम भूमिका निभाई। इस संगठन ने स्वतंत्रता आंदोलन को एक बहुत बड़ा और संगठित राजनीतिक मंच प्रदान किया जिसके जरिए अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद की जाने लगी।
1905 का बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन
लॉर्ड कर्जन ने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत बंगाल का बंटवारा कर दिया था। इसके विरोध में पूरे देश में स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई। इस आंदोलन ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने और देशवासियों के दिलों में राष्ट्रवाद की अलख जगाने का ऐतिहासिक काम किया।
1915 में महात्मा गांधी का भारत आगमन
दक्षिण अफ्रीका में सफल सत्याग्रह के बाद महात्मा गांधी जनवरी 1915 में स्वदेश लौटे। उनके आने से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पूरी धारा ही बदल गई। उन्होंने इसे चुनिंदा लोगों के दायरे से निकालकर एक विशाल जन आंदोलन का रूप दे दिया जिससे हर वर्ग का आम आदमी आजादी की लड़ाई से जुड़ गया।
1919 का जलियांवाला बाग हत्याकांड
अमृतसर के जलियांवाला बाग में शांतिपूर्ण सभा कर रहे मासूम लोगों पर जनरल डायर ने अंधाधुंध गोलियां चलवाईं। इस भीषण नरसंहार ने पूरे देश को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। इस घटना से दुखी होकर रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी नाइटहुड की उपाधि अंग्रेजों को लौटा दी। इसी क्रूरता ने गांधी जी को पूर्ण असहयोग आंदोलन शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
1920 का असहयोग आंदोलन
महात्मा गांधी के नेतृत्व में यह देश का पहला बड़ा और पूरी तरह से अहिंसक राष्ट्रव्यापी आंदोलन था। देश के वकीलों, छात्रों और आम नागरिकों ने सरकारी संस्थाओं का खुलकर बहिष्कार किया। हालांकि साल 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधी जी ने इस आंदोलन को वापस ले लिया था।
1930 का नमक सत्याग्रह और दांडी मार्च
गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार के अन्यायपूर्ण नमक कानून को तोड़ने के लिए साबरमती से दांडी तक चौबीस दिनों की लंबी पदयात्रा की। इस ऐतिहासिक यात्रा ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की मजबूत नींव रखी। इस एक कदम ने ब्रिटिश साम्राज्य की आर्थिक जड़ों को हिलाकर रख दिया।
1939 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज
नेताजी ने तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा का ओजस्वी नारा देकर सशस्त्र क्रांति के रास्ते को चुना। आजाद हिंद फौज के सैन्य अभियानों और बाद में लाल किले में चले ऐतिहासिक मुकदमों ने ब्रिटिश सेना के भीतर काम कर रहे भारतीय सैनिकों के दिलों में देशभक्ति की ऐसी आग भड़काई जिसने अंग्रेजी राज की चूलें हिला दीं।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान महात्मा गांधी ने करो या मरो का नारा देकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अंतिम और निर्णायक जंग का ऐलान कर दिया। इस आंदोलन के दौरान देश के तमाम बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया। इसके बावजूद देश की आम जनता ने खुद आंदोलन की कमान संभाली और अंग्रेजी शासन को पूरी तरह पंगु बना दिया।
1946 का शाही नौसेना विद्रोह
मुंबई में भारतीय नौसैनिकों ने खराब खाने और नस्लीय भेदभाव के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया। यह विद्रोह बहुत कम समय में कराची से लेकर कोलकाता तक फैल गया। इस बड़ी घटना ने अंग्रेजों को साफ समझा दिया कि अब वे भारतीय सैनिकों और कर्मचारियों के भरोसे भारत पर ज्यादा दिन तक राज नहीं कर सकते। इस विद्रोह ने भारत की आजादी के अंतिम रास्ते को पूरी तरह से साफ कर दिया।