मलिक असगर हाशमी
सूफी परंपरा में संगीत और नृत्य को भक्ति का दर्जा देने वाले महान सूफी संत और कवि मौलाना जलालुद्दीन रूमी (जन्म: 30सितंबर 1207) को भला कौन नहीं जानता? लेकिन क्या आप जानते हैं कि अगर रूमी की एक मशहूर कविता ‘A Voice Through the Door’ (दरवाज़े से आती आवाज़) की एक पंक्ति निर्देशक इम्तियाज़ अली तक न पहुँचती, तो न तो फिल्म 'रॉकस्टार' इतिहास रच पाती और न ही हमें 'नादान परिंदे' जैसा कालजयी गाना मिलता!
यह किस्सा उस दौर का है जब रणबीर कपूर की शुरुआती फिल्में कुछ खास कमाल नहीं कर पा रही थीं और वे फिल्मों से ज़्यादा अन्य वजहों से चर्चा में थे। दूसरी तरफ, इम्तियाज़ अली अपनी पहली फिल्म 'सोचा न था' के चार सालों तक लटके रहने से काफी निराश थे और खुद को साबित करने के लिए लगातार नई कहानियाँ लिख रहे थे। इसी दौर में उन्होंने 'रॉकस्टार' का ढाँचा तैयार किया।
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शुरुआत में इम्तियाज़ ने यह कहानी जॉन अब्राहम को ध्यान में रखकर लिखी थी। उनकी कल्पना में दूर-दूर तक रणबीर कपूर नहीं थे। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। एक दिन जब इम्तियाज़ और रणबीर की मुलाकात हुई, तो रणबीर ने मुस्कुराते हुए कहा, "सुनते हैं आपने 'रॉकस्टार' नाम की कोई कहानी लिखी है? क्यों न हम दोनों मिलकर यह फिल्म बनाएँ, मैं इसमें काम करूँगा!" इम्तियाज़ राज़ी हो गए और इस तरह 'रॉकस्टार' का सफर शुरू हुआ।

एक खास मुद्रा में इम्तियाज अली
जब फिल्म की आत्मा ही गायब थी...
फिल्म का संगीत दे रहे थे ऑस्कर विजेता ए. आर. रहमान। फिल्म का सबसे दर्दनाक और अहम सीन शूट हो चुका था,जॉर्डन (रणबीर कपूर) अस्पताल के बाहर है, पुलिस उसे घसीटते हुए ले जा रही है, भीड़ का शोर है और जॉर्डन के चेहरे पर एक गूँजती हुई तन्हाई है।
यह फिल्म का सबसे प्रभावशाली मोड़ था, जहाँ एक ऐसा गाना चाहिए था जो दर्शकों का दिल चीर दे। लेकिन दिक्कत यह थी कि इस सीन के लिए कोई गाना लिखा ही नहीं जा पा रहा था! कई कोशिशों के बाद भी जब बात नहीं बनी, तो रहमान साहब ने सिर्फ ड्रम्स की ‘डम-डम... डम-डम’ धुन रिकॉर्ड करके छोड़ दी, ताकि जब भी बोल तैयार हों, गाना वहाँ फिट किया जा सके।
इम्तियाज़ अली बुरी तरह मायूस हो चुके थे। फिल्म दांव पर लगी थी और उसका सबसे बड़ा गाना नदारद था।

ऑस्ट्रिया से आया एक मैसेज और जल उठी 'बत्ती'
तभी एक दिन चमत्कार हुआ !ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले इम्तियाज़ के दोस्त सत्यार्थ ने उन्हें मोबाइल पर एक साधारण-सा एसएमएस (SMS) भेजा। उस मैसेज में मौलाना रूमी की फारसी कविता का अंग्रेजी अनुवाद लिखा था:"The hunting falcon hears the sound of the drums... Come home, Come home!"(शिकारी बाज ड्रमों की आवाज़ सुनता है... घर लौट आओ, घर लौट आओ!)
इन पंक्तियों को पढ़ते ही इम्तियाज़ अली की आँखों के सामने पूरी फिल्म कौंध गई ! उनके मुँह से अचानक निकला... "मुझे मेरा गाना मिल गया!"
रूमी के इसी विचार और दर्द को केंद्र में रखकर गीतकार इरशाद कामिल ने कालजयी बोल लिखे— "ओ नादान परिंदे घर आजा..."

अपने चाहने वालों के साथ इम्यिाज अली. सारी तस्वीरें इम्यिाज के इंस्टा से
बोल जो रूह को छू गए:
क्यूँ देस-बिदेस फिरे मारा
क्यूँ हाल-बेहाल थका-हारा
तू रात-बिरात का बंजारा
ओ नादान परिंदे घर आजा...
कागा कागा रे मोरी इतनी अरज तोसे
चुन-चुन खाइयो मांस
अरजिया रे खाइयों ना तू नैना मोरे
पिया के मिलन की आस...
एक इतिहास का निर्माण
जब ए. आर. रहमान का रूहानी संगीत, मोहित चौहान की मर्मस्पर्शी आवाज़ और रूमी के दर्शन से निकले इरशाद कामिल के बोल एक साथ मिले, तो जन्म हुआ 'नादान परिंदे' का। यह सिर्फ एक गाना नहीं बना, बल्कि 'रॉकस्टार' की आत्मा बन गया। इसी गाने ने फिल्म को कामयाबी के शिखर पर पहुँचाया और आज भी जब यह गाना बजता है, तो सुनने वाले के दिल में एक अजीब-सी कशिश और सूफियाना सुकून भर जाता है।
कहते हैं न, कला की कोई सीमा नहीं होती---800 साल पहले एक सूफी संत द्वारा लिखी गई पंक्ति ने आधुनिक सिनेमा का सबसे बड़ा संगीत इतिहास रच दिया !
(इनपुटः इम्यिाज अली के इंटरव्यू से)