हिंदी हैं हमः आरएसएस भागवत के साथ मुस्लिमों की बैठक के साथ बदल सकता है ?

Story by  मंजीत ठाकुर | Published by  [email protected] | Date 05-10-2022
उथल-पुथल के दौर में राजनैतिक नेतृत्व
उथल-पुथल के दौर में राजनैतिक नेतृत्व

 

हिंदी हैं हम/ सईद नक़वी                                                                                                                         

भाऊराव देवरस : मुसलमानों का बाबर से कोई संबंध क्यों होना चाहिए? वह मध्य एशिया से आया था.

प्रश्न: आपके पूर्वज भी मध्य एशिया से आए थे.आर्य मध्य एशिया से आए थे?

देवरस: इसको लेकर कुछ विवाद है.अब इसका विरोध किया जा रहा है.बहुत सारी किताबें हैं जो इसका खंडन करती हैं.

प्रश्न: आपका मतलब आर्य कहीं से नहीं आए?

देवरस: नहीं, हमने नहीं आए.

प्रश्न: तो वे बस यहीं पर पैदा हुए और यहीं बढ़े-फैले?

देवरस: हां. आर्य और आदिवासी जैसे शब्द क्या हैं (चिढ़ते हैं). इसे अंग्रेजों ने बनाया है.

यह आरएसएस के विचारक भाऊराव देवरस के साथ दो घंटे के लंबे साक्षात्कार का बेतरतीब ढंग से उठाया गया अंश है. साक्षात्कार 1990 की सर्दियों में संगठन के मुख्यालय केशव कुंज, झंडेवालान में हुआ था. चूंकि उनके बड़े भाई, बालासाहेब देवरस, आरएसएस प्रमुख, बीमार थे, भाऊराव आरएसएस की सबसे महत्वपूर्ण आवाज थे.

आरएसएस के शीर्ष अधिकारियों के साथ इस ऐतिहासिक बातचीत और हाल ही में आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत के साथ पांच वरिष्ठ मुस्लिम पेशेवरों की बैठक के बीच, ठीक 32 साल बीत चुके हैं. ये तीन दशक आज तक सांप्रदायिकता और जातिवाद में उछाल को परिभाषित करते हैं. 1990 में परिस्थितियां अलग थीं.

अलीगढ़, मुरादाबाद, अहमदाबाद और अन्य जगहों पर संक्षिप्त अवधि के लिए प्रधानमंत्री रहे वी.पी. सिंहनेअन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) के लिए सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण देने वाली मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की घोषणा की. इससे दलितों, आदिवासियों और ओबीसी के लिए आरक्षण कोटा 50 प्रतिशत तक बढ़ गया.

ऊंची जातियों में आग लग गई थी. मुझे याद है कि कैसे एम्स चौराहे पर दिल्ली विश्वविद्यालय के एक छात्र राजीव गोस्वामी द्वारा आत्मदाह के प्रयास ने मंडल विरोधी आंदोलन को तेज कर दिया था. इसने अनिवार्य रूप से उच्च जातियों को निचली जातियों के खिलाफ खड़ा कर दिया. यह विभाजन सैकड़ों वर्षों से एक सामाजिक वास्तविकता रहा है.

मंडल के बाद जो नया था, वह चुनावी राजनीति में जाति का आक्रामक इस्तेमाल होने लगा था. उत्तर प्रदेश (जो ऐतिहासिक रूप से गोविंद भल्लभ पंत, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, बिंदेश्वरी दूबे, नारायण दत्त तिवारी की चपेट में रहा है) में राजनीतिक सत्ता हथियाने के लिए जाति के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से एक बड़े पैमाने पर प्रतिक्रिया हुई थी


इस मोड़ पर, मुसलमान, जो पारंपरिक रूप से कांग्रेस का वोट बैंक थेकांग्रेस के साथ असहज महसूस करने लगे. इस बेचैनी का एक कारण था. जेपी आंदोलन और उसके बाद जनता पार्टी द्वारा दिल्ली से बाहर किए जाने से आहत कांग्रेस बदलने लगी – उसने सॉफ्ट हिंदुत्व का दामन थाम लिया. इंदिरा गांधी ने 1983 में जम्मू का चुनाव अल्पसंख्यक विरोधी तेवरों के साथ लड़ा था, हालांकि उनके ध्यान में अल्पसंख्यक पंजाबी सूबा के लिए आंदोलन कर रहे सिख थे.

1984 में उनकी हत्या के बाद, अभूतपूर्व तीन-चौथाई बहुमत के साथ राजीव गांधी सत्ता में लौटे थे,लेकिन उनकी जीत को इंदिरा लहर की बजाए अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के खिलाफ "हिंदू एकीकरण" के रूप में देखा गया. आखिर, यह भाजपा के "एकजुट होने" की अपील से कैसे अलग था?

राजीव गांधी ने पहले शाह बानो के फैसले को पलटकर और सलमान रुश्दी के सैटेनिक वर्सेज पर प्रतिबंध लगाकर मुसलमानों का "तुष्टीकरण" किया. हिंदू दक्षिणपंथी सकते में थे.

अयोध्या से राम राज्य की घोषणा करने पहुंचे गांधी, बाबरी मस्जिद स्थित राम मंदिर के ताले खोले. राम मंदिर के लिए शिलान्यास समारोह की अनुमति देते समय, गांधी और उनके साथी धोखेबाजी पर उतर गए.

उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा विवादित घोषित भूमि पर "शिलान्यास" की अनुमति दी. उन्होंने मुसलमानों को एक खुला झूठ बताया कि उच्च न्यायालय की सलाह का उल्लंघन नहीं किया गया था.

इस छल के कुछ ही मिनटों के भीतर, विहिप ने एक संवाददाता सम्मेलन में घोषणा की कि वे गांधी पर हावी हो गए हैं: शिलान्यास ठीक उसी भूमि पर किया गया था जिसकी उन्होंने मांग की थी.

यही वह प्रकरण था जिसके कारण मुसलमानों ने कांग्रेस को भारी संख्या में छोड़ दिया. 6 दिसंबर 1992 को, जब प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव दिन भर सोते रहे जब बाबरी मस्जिद को तोड़ा गया, कांग्रेस से मुस्लिमों का पलायन पूरा हुआ.

1989 में मंडल और 1992 में मस्जिद के बीच, मुस्लिम अपना पड़ाव किधर लगाएं, इसी ऊहापोह में रहे. इस दहशत में उन्हें मुलायम सिंह यादव और मायावती जैसे खास जाति के नेताओं ने लालच दिया, लेकिन इनके साथ आने के बाद मुस्लिमो ने अपने हाथ जलाकर सीखा कि इन लोगों ने केवल यादव और दलित हितों को आगे बढ़ाने के लिए काम किया. (मैं केवल कथा को सरल रखने के लिए यूपी पर ध्यान केंद्रित कर रहा हूं.)


विभाजन के बाद से, मुस्लिम कांग्रेस की गोद में सुरक्षित महसूस करते थे. लेकिन 2005 में सच्चर आयोग की रिपोर्ट ने जो खुलासा किया, वह "तुष्टीकरण" के तमगे के अलावा उन्हें सिफर ही मिला.

हर विकास सूचकांक पर वह हिंदू दलितों से भी नीचे पहुंच गए थे.

जातियों के नेताओं की ओर मुड़कर, मुस्लिम ने पहली बार उस दिशा में हस्तक्षेप किया जो अनिवार्य रूप से सवर्णों और पिछड़ों के बीच एक आंतरिक हिंदू संघर्ष था. वास्तव में निचली जातियों का साथ देकर मुस्लिम ने पहली बार जाति पिरामिड को उलटने की कोशिश की थी, इस दुस्साहस को आसानी से भुलाया नहीं जा सकता था.

आरएसएस-भाजपा गठबंधन कोई जोखिम नहीं लेने वाला था. स्थायी रूप से खतरे को दूर करने के लिए हिंदू एकीकरण ही एकमात्र तरीका था. यह हवा में भगवा रंग बिखेर देने से ही मुमकिन था. लव जेहाद, बीफ लिंचिंग, मस्जिदों पर लाउडस्पीकर, घर वापसी, कथित आतंकवाद के लिए मुसलमानों की हाई प्रोफाइल गिरफ्तारी और इस तरह के मुद्दों ने तापमान को सांप्रदायिक रूप से चार्ज रखा.

लेकिन यह उस पैमाने पर लामबंदी के लिए पर्याप्त नहीं है जिससे जीत हासिल होगी. फिलवक्त के लिए आप इसको 2024 का चुनाव मान लें.

राष्ट्रव्यापी लामबंदी के लिए सांप्रदायिकता को राष्ट्रवाद से जोड़ना होगा. इसके लिए कश्मीर में उबाल और पाकिस्तान के साथ संघर्षपूर्ण संबंधों की आवश्यकता होगी. सिद्धांत यह है कि 2019 के चुनाव परिणाम बालाकोट के बिना संभव नहीं हो सकते थे.

यही वह दृष्टिकोण है जिसके खिलाफ आरएसएस प्रमुख ने मुट्ठी भर मुस्लिम पेशेवरों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं.

भाऊराव देवरस के साथ पहले के साक्षात्कार की व्यवस्था के.आर. मलकानी ने की थी, जो 1982 के मुरादाबाद दंगों के बाद इंडियन एक्सप्रेस में मेरा संपादकीय लेख पढ़ने के बाद मेरे पास पहुंचे.

समग्र संस्कृति पर 30 लघु फिल्मों की श्रृंखला ने प्रगतिशील और हिंदू अधिकार को समान रूप से प्रभावित किया. मेरी किताब, रिफ्लेक्शंस ऑफ ए इंडियन मुस्लिम, जिसमें इनमें से कुछ शामिल हैं, का विमोचन एक कम्युनिस्ट निखिल चक्रवर्ती ने किया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आरएसएस के मुरली मनोहर जोशी थे.



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