मोदी-शी की संभावित मुलाकात पर टिकी निगाहें, क्या पिघलेगी बर्फ?

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 31-08-2025
All eyes on the possible meeting between Modi and Xi, will the ice melt?
All eyes on the possible meeting between Modi and Xi, will the ice melt?

 

मलिक असगर हाशमी

शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का शिखर सम्मेलन इस बार चीन के तियानजिन शहर में हो रहा है, जहां दुनिया के 20 से अधिक शीर्ष नेता एकत्र हो रहे हैं. इनमें रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रमुख हैं. यह संगठन अब जनसंख्या के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय समूह बन चुका है.

इस बार का सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू की गई वैश्विक व्यापारिक जंग ने विश्व राजनीति में हलचल मचा दी है. यह सम्मेलन जहां प्रतीकात्मक रूप से एक मंच प्रदान करता है, वहीं यह एक ऐसा अवसर भी है जहां एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के नेता अमेरिका के नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था से अलग एक समानांतर प्रणाली में अपनी आवाज़ बुलंद कर सकते हैं.

एससीओ की स्थापना 2001 में चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान ने की थी. शुरुआत में यह संगठन मध्य एशिया की सुरक्षा चिंताओं पर केंद्रित था, लेकिन पिछले दो दशकों में इसका दायरा काफी बढ़ गया है. अब यह वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका निभा रहा है. खासकर ऐसे समय में जब चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी महाशक्ति बन चुका है.

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अल-जजीरा के एक लेख में एरिन हेल ने बेहद प्रभावशाली ढंग से लिखा है,चीन-वैश्विक दक्षिण परियोजना के प्रधान संपादक एरिक ओलेंडर के अनुसार, एससीओ चीन के उस प्रयास का हिस्सा है जिसके तहत वह अमेरिकी प्रभुत्व वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के समानांतर एक वैकल्पिक ढांचा खड़ा करना चाहता है. ओलेंडर का कहना है कि यह मंच उन देशों को एकजुट करता है जो अमेरिकी नीतियों से परेशान हैं और एक अलग आवाज़ बनाना चाहते हैं.

इस सम्मेलन में पुतिन, जो युद्ध अपराधों के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) द्वारा वांछित हैं, बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस जैसे दिग्गजों की भागीदारी हो रही है.

हालांकि, यह सम्मेलन केवल दोस्ताना मुस्कान और औपचारिक फोटो खिंचवाने का मौका नहीं है. इसके पीछे गहराई से कई भू-राजनीतिक खिंचाव और जटिल समीकरण मौजूद हैं. भारत और पाकिस्तान, भारत और चीन, सऊदी अरब और ईरान, चीन और रूस , इन सभी देशों के बीच आपसी तनाव और प्रतिस्पर्धा किसी से छिपी नहीं है.

इस लेख में आगे कहा गया है,जून 2025 में क़िंगदाओ में हुए एससीओ रक्षा मंत्रियों की बैठक में भारत, चीन, रूस, ईरान, पाकिस्तान और मध्य एशियाई देशों के रक्षा मंत्रियों ने हिस्सा लिया था. उस समय भी इस मंच की भू-राजनीतिक गंभीरता साफ नजर आई थी.

एससीओ के सदस्य देशों में अब भारत, पाकिस्तान, ईरान और बेलारूस जैसे बड़े नाम शामिल हो चुके हैं. वहीं, अफगानिस्तान और मंगोलिया पर्यवेक्षक के रूप में जुड़े हुए हैं. इसके अतिरिक्त, 14 देशों को संवाद साझेदार का दर्जा मिला है जिनमें संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, तुर्किये, कतर, म्यांमार, कंबोडिया और श्रीलंका जैसे देश शामिल हैं.

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जून 2025 में क़िंगदाओ में हुए एससीओ रक्षा मंत्रियों की बैठक

विशेष ध्यान इस बार दक्षिण पूर्व एशिया के नेताओं पर रहेगा जिन्हें चीन-अमेरिका प्रतिस्पर्धा में “स्विंग स्टेट्स” कहा जा रहा है. मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो और ASEAN महासचिव काओ किम हॉर्न जैसी हस्तियां इस सम्मेलन में शिरकत करेंगी.

विश्लेषकों की निगाहें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित मुलाकात पर भी टिकी हैं. इन दोनों नेताओं ने पिछले सात वर्षों में औपचारिक रूप से मुलाकात नहीं की है. भारत और अमेरिका के बीच पुराना गठबंधन रहा है, लेकिन हाल ही में ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50% तक के टैरिफ लगा दिए हैं, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में खटास आई है.

व्हाइट हाउस का आरोप है कि भारत रूस से तेल खरीदकर मास्को की अर्थव्यवस्था को जीवित रखे हुए है, जिससे यूक्रेन युद्ध को बल मिल रहा है. वहीं, चीन के साथ भारत के रिश्ते 2020 की गलवान घाटी की झड़प के बाद बेहद तनावपूर्ण हो गए थे. हालांकि 2024 में दोनों देशों ने सीमावर्ती मुद्दों पर एक समझौता किया.

अब विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के चलते भारत और चीन के बीच संवाद के रास्ते खुल सकते हैं. चीन के लिए यह मौका है कि वह भारत को अमेरिका-नेतृत्व वाले मंचों जैसे क्वाड से दूर कर सके. क्वाड में भारत के अलावा अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं.

लेख में कहा गया है,जर्मनी के मर्केटर इंस्टीट्यूट के विश्लेषक क्लॉस सॉन्ग का कहना है कि सम्मेलन के बाद चीन भारत के साथ अपने संबंधों को किस प्रकार प्रस्तुत करता है, यह इस संबंध में अहम संकेत देगा. उन्होंने कहा कि चीन की आधिकारिक भाषा में छोटे बदलाव भी बड़ी कूटनीतिक दिशा का संकेत हो सकते हैं.

इस सम्मेलन के दौरान पुतिन और शी जिनपिंग की यह पहली मुलाकात होगी, जब पुतिन ने इसी महीने अलास्का में ट्रंप से यूक्रेन युद्ध पर चर्चा की थी. वर्ष 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण से कुछ हफ्ते पहले चीन और रूस ने “नो लिमिट्स पार्टनरशिप” की घोषणा की थी, जिसके बाद से बीजिंग रूस की आर्थिक रीढ़ बना हुआ है.

यह भारत के लिए एक पेचीदा स्थिति है, क्योंकि चीन ने रूस को आर्थिक समर्थन देने के बावजूद अमेरिका से कोई गंभीर प्रतिबंध नहीं झेला, जबकि भारत को ट्रंप के गुस्से का सामना करना पड़ा है.

सिंगापुर स्थित राजरत्नम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के डेनियल बालाजस का मानना है कि इस सम्मेलन का प्रमुख परिणाम एक साझा बयान के रूप में सामने आएगा. चीन और रूस संभवतः “यूनिलेटरलिज्म” यानी एकतरफा वैश्विक नेतृत्व – जो कि अमेरिका की ओर संकेत करता है, के विरोध में बात करेंगे, लेकिन बयान की भाषा को सभी पक्षों के लिए स्वीकार्य बनाए रखने के लिए नरम रखा जाएगा.

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बालाजस का कहना है कि साझा बयान की प्रतीकात्मकता उसकी सामग्री से अधिक महत्वपूर्ण होगी. संभवतः इसमें आर्थिक सहयोग, बहुपक्षीयता की अहमियत और सुरक्षा-स्थिरता जैसे मुद्दों पर सामान्य सहमति देखने को मिलेगी.

सम्मेलन के बाद 2 सितंबर को सभी प्रतिनिधियों के पास बीजिंग में रुककर द्विपक्षीय वार्ताओं के लिए एक पूरा दिन रहेगा और यही असली कूटनीतिक गतिविधियों का समय होगा. ओलेंडर का कहना है कि 2 सितंबर को “कौन किससे मिलता है” – इस पर सभी की नजर होगी.

3 सितंबर को द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 80वीं वर्षगांठ के अवसर पर भव्य सैन्य परेड का आयोजन किया जाएगा, जिसमें उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन, सर्बिया के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुसिच और स्लोवाकिया के प्रधानमंत्री रॉबर्ट फिको भी शामिल हो सकते हैं.

हालांकि प्रधानमंत्री मोदी के इस परेड में शामिल होने की संभावना नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वह अपने विदेश मंत्री या किसी वरिष्ठ प्रतिनिधि को भेज सकते हैं.

अंततः, यह सम्मेलन चीन के लिए एक अवसर है कि वह वैश्विक दक्षिण (Global South) में अपनी छवि को बेहतर बनाए. मर्केटर इंस्टीट्यूट के सॉन्ग कहते हैं, “यह चीन का तरीका है यह दिखाने का कि उसके मित्र कौन हैं, और कौन उसकी वैश्विक कहानी का समर्थन करने को तैयार है.”इस तरह, एससीओ का यह सम्मेलन न केवल बहुपक्षीय सहयोग का मंच है, बल्कि वैश्विक राजनीति में उभरती नई ध्रुवीयता की झलक भी देता है.