21वीं सदी में नज़रुल: एक ज्वलंत चेतना की प्रासंगिकता

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 30-08-2025
Nazrul in the 21st century: The relevance of a burning consciousness
Nazrul in the 21st century: The relevance of a burning consciousness

 

dरेजाउद्दीन स्टालिन

काज़ी नज़रुल इस्लाम की कविताएँ मात्र काव्य नहीं, बल्कि एक जीवंत, विचारशील और कल्पनाशील जीवनरेखा हैं.उनके काव्य में जहाँ प्रेम और करुणा है, वहीं विश्वासघात और विद्रोह की भी झलक है.आज़ादी की लड़ाई में उनकी कविताएँ जनता की आवाज़ बनीं.वे केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि क्रांति और बदलाव के संवाहक थे.नज़रुल साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, सांप्रदायिकता, शोषण और आतंकवाद के विरुद्ध एक प्रखर चेतना थे.

उन्होंने एक बार कहा था, "मेरे एक हाथ में मुड़ी हुई बाँसुरी है और दूसरे में युद्ध का तुरही." इस कथन में उनके व्यक्तित्व की संपूर्णता समाई है – एक ओर सौंदर्य, कला और प्रेम की पुकार, तो दूसरी ओर अन्याय के विरुद्ध क्रांति का उद्घोष.

नारी मुक्ति और सामाजिक समानता के अग्रदूत

उस दौर में जब भारत रूढ़िवाद और पितृसत्ता के बोझ तले दबा हुआ था, नज़रुल ने स्त्री स्वतंत्रता की बात की.वे समाज की बेड़ियों को तोड़ने वाले कवि थे.

व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और मानव गरिमा की स्थापना उनका मुख्य उद्देश्य था.उनकी कविताएँ केवल काव्यात्मक सौंदर्य नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का घोष थीं – व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र तक, हर स्तर पर एक अजेय स्वर.

उनकी कविताएँ साम्प्रदायिक सद्भाव का ऐसा उदाहरण हैं, जो आज भी मार्गदर्शक बन सकती हैं.इस्लाम धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा रखते हुए भी वे हिंदू धर्म और अन्य पंथों के प्रति सम्मान से भरे थे.उनका कथन था: "भारत में प्रेम एक कैदी है, मैं उसे आज़ाद करना चाहता हूँ."

नज़रुल: एक सच्चे क्रांतिकारी कवि

नज़रुल सत्ता परिवर्तन मात्र को क्रांति नहीं मानते थे.उनके लिए क्रांति का अर्थ था – जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, आवास और चिकित्सा जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति.

वे मानते थे कि जब तक सत्ता इन पहलुओं को नहीं अपनाती, तब तक कोई भी परिवर्तन अधूरा है.उनका काव्य और चिंतन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता की माँग करता था."बदलाव सिर्फ़ चेहरे का नहीं, व्यवस्था का होना चाहिए," यह उनका स्पष्ट संदेश था।

पुनर्जागरण और नज़रुल

बंगाल पुनर्जागरण के संदर्भ में विनय घोष की पुस्तक बंगाल रेनेसां और प्रो. वरुण डे की टिप्पणियों में यह स्पष्ट होता है कि उस काल का नवजागरण उच्च जाति के सीमित वर्ग तक सीमित रहा.

वहीं नज़रुल इस सीमित दायरे से बाहर निकलते हैं.वे उस नवजागरण की ‘व्यावहारिक संतान’ हैं, जो केवल बुद्धिजीविता तक सीमित न होकर आम जनता की चेतना से जुड़ी हुई है.

राममोहन राय, विद्यासागर और मधुसूदन दत्त की विचारधारा को उन्होंने आगे बढ़ाया, लेकिन उससे कहीं आगे जाकर उसे जनता के संघर्षों से जोड़ा.अमेरिकी लेखक युलस्टन लैंगली ने उन्हें दक्षिण-पूर्व एशिया का एक अद्वितीय उपनिवेश-विरोधी कवि और चिंतक कहा.

एक सार्वभौमिक कवि

नज़रुल केवल बंगाल के नहीं, बल्कि विश्व के कवि हैं.उनके गीत और कविताएँ इस्लामी संस्कृति से लेकर हिंदू भक्ति तक को समेटे हुए हैं.उन्होंने ग़ज़लें, कीर्तन, श्यामा संगीत, आधुनिक गीत – हर विधा में लिखा। यही उनकी विशिष्टता है.

जैसे अंग्रेज़ी साहित्य में शेक्सपियर के बाद मिल्टन, और फिर टीएस एलियट, एज्रा पाउंड, डब्ल्यूबी यीट्स आए, उसी तरह बंगाली कविता में रवींद्रनाथ के बाद नज़रुल आधुनिक रोमांटिक और विद्रोही चेतना के प्रतीक बने.

उनकी तुलना 20 वीं सदी के अन्य क्रांतिकारी कवियों – पाब्लो नेरुदा, नाज़िम हिकमत, मायाकोवस्की, निकानोर पारा आदि से की जाती है.वे भी युद्ध के खिलाफ थे, शांति के पक्षधर थे और जनता की आवाज़ को बुलंदी देने वाले कवि थे.

उनका उद्घोष था – "कहो वीर, कहो उन्नत माँ!"

कविता की प्रासंगिकता और लोकप्रियता

नज़रुल की कविताएँ पौराणिकता पर आधारित नहीं, बल्कि पौराणिक कथाओं को समकालीन संदर्भों में प्रस्तुत करती हैं.उन्होंने शास्त्रीय रूपकों को नवीन अर्थ दिए.आज की अमूर्त और दुर्बोध कविता की तुलना में नज़रुल की रचनाएँ आज भी जीवंत, सजीव और लोकप्रिय हैं.

आज भी पुस्तक मेलों में उनकी कृतियाँ – अग्निवीणा, सारबहरा, बिशेर बंशी – बिकती हैं.उनकी कविता में जो क्रांति है, वह आज के समय में और अधिक प्रासंगिक हो गई है.

जब समाज में पूंजीवाद और शोषण की बातें होती हैं, तो नज़रुल हमें याद आते हैं,"...चुप हो जाओ, झूठों के झुंड! बताओ, कुलियों से कितने पाई के बदले कितने करोड़ मिले हैं?"

नज़रुल और जन आंदोलनों से जुड़ाव

नज़रुल केवल कवि नहीं, आंदोलनों के प्रतीक भी हैं.

1952का भाषा आंदोलन,

1969का जन विद्रोह,

1971का मुक्ति संग्राम,

1990का सत्ताच्युत आंदोलन,

और 2024की जुलाई क्रांति—

इन सभी ऐतिहासिक पलों में नज़रुल की रचनाएँ प्रेरणा का स्रोत रहीं.

उनके गीतों के बिना कोई आंदोलन संपूर्ण नहीं था.'आनंदमयीर आगमन' जैसा गीत लिखने पर उन्हें जेल हुई, लेकिन उन्होंने अपने गीतों को कभी रोका नहीं.उन्होंने हर अत्याचारी सत्ता के विरुद्ध स्वर उठाया.

स्त्री चेतना और आधुनिकता की आवाज़

एक जगह नज़रुल की कविता में एक स्त्री कहती है, "वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों की विजय का गान गाएगी."नज़रुल की स्त्री की यह आवाज़ केवल प्रतीक नहीं, बल्कि संघर्षशील चेतना है.आज जब आध्यात्मिक कविता के नाम पर बौद्धिक धुंध छाई हुई है, तब नज़रुल का स्पष्ट और उद्देश्यपूर्ण स्वर नई पीढ़ी के लिए अत्यंत आवश्यक बन गया है.

21वीं सदी के लिए नज़रुल क्यों ज़रूरी हैं?

आज जब दुनिया फिर से साम्राज्यवाद, पूंजीवाद, धार्मिक उन्माद और असहिष्णुता की ओर बढ़ रही है, नज़रुल का ओजस्वी स्वर और उनकी कविता हमें रास्ता दिखा सकती है.वे 21वीं सदी के लिए नैतिक और वैचारिक मार्गदर्शक हैं.उनकी कविता क्रांति की मशाल है, और चेतना की चिंगारी भी.

आज ज़रूरत है कि उनकी कविताओं और गीतों को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए.उनकी धर्मनिरपेक्ष सोच, न्यायप्रियता, स्त्री-मुक्ति का समर्थन, सामाजिक समानता की भावना – यह सब कुछ 21वीं सदी के भारत और उपमहाद्वीप के लिए अमूल्य धरोहर है.

12भाद्र, 1976को जब उन्होंने बांग्लादेश की धरती पर अंतिम सांस ली, तब वे केवल एक कवि नहीं रहे – वे जनचेतना का स्थायी स्वर बन चुके थे.

नज़रुल आज भी बोलते हैं – अन्याय के खिलाफ, अत्याचार के खिलाफ, और मानवता के पक्ष में.इसलिए 21वीं सदी में नज़रुल न केवल प्रासंगिक हैं, बल्कि अनिवार्य हैं.

(रेज़ाउद्दीन स्टालिन: कवि और नज़रुल शोधकर्ता)