आवाज द वाॅयस/मुंबई
महान गायक मोहम्मद रफ़ी की याद में आयोजित विशेष संगीतमय संध्या ‘रूह-ए-रफ़ी’ मुंबई में एक भावनात्मक माहौल के बीच संपन्न हुई, जिसमें दिग्गज गीतकार जावेद अख्तर और अभिनेता जीतेंद्र ने अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम को विशेष बना दिया। कार्यक्रम का आयोजन वरिष्ठ संगीतकार, लेखक और परिवर्तन कोच राजेश ढाबरे द्वारा किया गया था, जिनकी पहल पर यह श्रद्धांजलि कार्यक्रम संभव हुआ.
इस मौके पर जावेद अख्तर ने मोहम्मद रफ़ी के प्रति अपने दिल से जुड़े भाव साझा करते हुए कहा कि किसी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने कलाकारों को कितनी इज्ज़त देता है.
उन्होंने कहा कि रफ़ी साहब की आवाज़ आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई है और उन्हें उतनी ही मोहब्बत मिल रही है जितनी उनके जीवनकाल में मिली थी. उन्होंने यह भी कहा कि रफ़ी साहब की आवाज़ ने उन्हें हमेशा प्रभावित किया और यह उनके जीवन की एक अधूरी ख्वाहिश रह गई कि वह रफ़ी साहब के लिए एक गीत लिख पाते.
उन्होंने यह कहते हुए अपनी भावनाएं व्यक्त कीं कि "यह मेरी बदकिस्मती थी कि जब रफ़ी साहब जीवित थे, तब मैंने गीत लेखन की शुरुआत नहीं की थी. उस समय मैं इंडस्ट्री में पटकथा लेखक के रूप में कार्यरत था. अब यह ख्वाहिश मेरे दिल में ही रह गई है कि काश रफ़ी साहब मेरे लिखे हुए किसी गीत को अपनी आवाज़ देते."
जब उनसे रफ़ी साहब के पसंदीदा गानों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने ‘जाग दिल-ए-दीवाना’, ‘मेरी दुनिया में तुम आई’, ‘साथी ना कोई मंज़िल’ और ‘हुई शाम उनका ख़याल आ गया’ जैसे कालजयी गीतों का ज़िक्र किया, जो आज भी लोगों के दिलों पर राज करते हैं.
कार्यक्रम में अभिनेता जीतेंद्र ने भी रफ़ी साहब को याद करते हुए कहा कि वह दौर बेहद खास था जब सिर्फ चार-पाँच गायक थे, लेकिन उनके गीतों में जो जादू था, वह आज की बहुलता में खो सा गया है.
उन्होंने कहा कि आज देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन उस दौर की गहराई और भावनात्मकता की बात ही कुछ और थी. उन्होंने लता मंगेशकर, आशा भोसले, मोहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार जैसे गायकों की बात करते हुए कहा कि "उनका दौर वापस नहीं आ सकता, वह जादू लौटना मुश्किल है."
इस आयोजन ने न केवल रफ़ी साहब को याद करने का अवसर दिया बल्कि यह भी दिखाया कि उनके जैसे कलाकारों की विरासत समय के साथ और भी समृद्ध होती जा रही है.
जावेद अख्तर और जीतेंद्र की उपस्थिति ने कार्यक्रम को और भी विशेष बना दिया, और दर्शकों को उस सुनहरे दौर की झलक देखने को मिली जब भावनाएं सुरों में ढलकर लोगों के दिलों तक पहुंचती थीं.
'रूह-ए-रफ़ी' न केवल एक संगीत कार्यक्रम था बल्कि यह एक सजीव उदाहरण था कि कैसे एक कलाकार की आवाज़ समय और पीढ़ियों की सीमाओं को पार कर अमर हो जाती है. रफ़ी साहब की गायकी और उनकी विरासत आज भी उसी जोश और जज़्बे से याद की जाती है, और आगे भी की जाती रहेगी.