ध्यानचंद: जिन्होंने हॉकी से भारत को आज़ादी का अहसास दिलाया

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 29-08-2025
Dhyanchand: The one who made India feel free through hockey
Dhyanchand: The one who made India feel free through hockey

 

saleemसाक़िब सलीम

 

क्या आप जानते हैं कि भारत की आज़ादी से ग्यारह साल पहले, 15 अगस्त को यूरोप की धरती पर पहली बार भारतीय तिरंगा लहराया गया था ? यह कोई राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि 1936 के बर्लिन ओलंपिक का वह गौरवशाली क्षण था, जब भारतीय हॉकी टीम ने जर्मनी को हराकर फाइनल मुकाबला जीता और ओलंपिक का स्वर्ण पदक अपने नाम किया. इस ऐतिहासिक टीम का नेतृत्व कर रहे थे मेजर ध्यानचंद, जो न सिर्फ़ एक महान खिलाड़ी थे, बल्कि एक राष्ट्रीय प्रतीक बन चुके थे.

आज भी हम ध्यानचंद की तुलना कई दिग्गज खिलाड़ियों, जैसे डोनाल्ड ब्रैडमैन, मोहम्मद अली या सचिन तेंदुलकर से करते हैं, लेकिन यह तुलना अधूरी है. ध्यानचंद की उपलब्धियों को सिर्फ़ खेल के नज़रिए से देखना उनके योगदान को सीमित कर देना है.

उन्होंने ऐसे दौर में भारत को जीत दिलाई, जब हम एक गुलाम देश थे, जब देश की पहचान कहीं दर्ज नहीं थी, और जब राष्ट्रीयता की भावना खेल के माध्यम से ही पनप रही थी.

d

ध्यानचंद की प्रेरणा से भारतीय हॉकी टीम ने 1928 (एम्स्टर्डम), 1932 (लॉस एंजेल्स) और 1936 (बर्लिन) में लगातार तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते. लेकिन यह जीत सिर्फ़ मैदान पर नहीं थी, बल्कि यह भारतीय राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति थी. उस समय, भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं मिली थी. पर हॉकी की जीत ने यह दिखा दिया कि भारत सिर्फ़ एक उपनिवेश नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण और सक्षम राष्ट्र है.

इन खेलों में भारत की भागीदारी कोई संयोग नहीं थी. यह एक राष्ट्रवादी परियोजना का हिस्सा थी, जिसकी नींव सर दोराबजी टाटा ने रखी और जिसमें पटियाला, भोपाल, मैसूर, हैदराबाद जैसी रियासतों ने आर्थिक सहायता प्रदान की.

लेकिन जिनके दम पर यह सपना साकार हुआ, वे थे ध्यानचंद, उनकी प्रतिभा, संघर्ष, और समर्पण.ध्यानचंद की जिंदगी आसान नहीं थी। उनकी पृष्ठभूमि साधारण थी, वे सेना में एक मामूली पद पर कार्यरत थे.

1928 और 1932 में वह भारतीय टीम का हिस्सा रहे, लेकिन उन्हें कप्तानी नहीं दी गई , वजह थी वर्गभेद। उस दौर में एक निम्न वर्ग से आए व्यक्ति के लिए कप्तान बनना आसान नहीं था, भले ही वह टीम का सबसे कुशल खिलाड़ी क्यों न हो.

लेकिन 1936 में, उन्होंने हर सामाजिक बाधा को पार करते हुए कप्तानी हासिल की और अपने नेतृत्व में भारत को ऐतिहासिक जीत दिलाई.1936 के बर्लिन ओलंपिक का बजट बहुत सीमित था.

भारतीय खिलाड़ी थर्ड क्लास में यात्रा करते थे, खाने तक के पैसे नहीं होते थे, और उपकरण भी सीमित थे. फिर भी, उनके दिलों में राष्ट्रीय गर्व की भावना ज़िंदा थी. उनके लिए यह खेल सिर्फ़ एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई का हिस्सा था.

टीम के एक सदस्य एम.एन. मसूद ने उद्घाटन समारोह की यादें साझा करते हुए लिखा कि जब जर्मनी का राष्ट्रगान बजा, तो उन्हें भारत की तस्वीर सामने दिखी  भूख, गरीबी, बेरोजगारी और सामाजिक विषमता.

उस क्षण उन्होंने यह महसूस किया कि भारत को प्रतिनिधित्व देने का यह अवसर कितना महत्वपूर्ण है. यह सिर्फ़ हॉकी नहीं, बल्कि राष्ट्र के आत्मसम्मान की लड़ाई थी.

d

बर्लिन ओलंपिक में एक और घटना बेहद खास रही  जब भारतीय टीम ने हिटलर को सलामी देने से इनकार कर दिया। उस समय लगभग सभी देशों की टीमें नाज़ी सलामी दे रही थीं, लेकिन भारत ने स्पष्ट रूप से इसे ठुकरा दिया.

यह कांग्रेस और गांधीजी के नेतृत्व में भारत के नाज़ीवाद और फासीवाद के विरोध की झलक थी. यह अवज्ञा का प्रतीक था, जो उस समय के भारतीय राष्ट्रवाद से पूरी तरह मेल खाता था.

मैच के दिन, भारतीय टीम का मनोबल ऊँचा था. एक दोस्ताना मैच में पहले भारत जर्मनी से हार चुका था, जिससे चिंता बनी हुई थी. लेकिन टीम मैनेजर पंकज गुप्ता ने उस दिन कांग्रेस का तिरंगा निकाला और खिलाड़ियों को बताया कि यह सिर्फ़ खेल नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई है.

इस प्रेरणा के साथ खिलाड़ी मैदान में उतरे. ध्यानचंद ने नंगे पैर खेलते हुए असाधारण प्रदर्शन किया और भारत ने 8-1 से जीत दर्ज की.ध्यानचंद ने सिर्फ़ गोल नहीं किए, उन्होंने भारत को पहचान दिलाई.

उनका प्रदर्शन इतना प्रभावशाली था कि जर्मन तानाशाह हिटलर ने भी उनसे मिलने की इच्छा जताई. कहा जाता है कि हिटलर ने उन्हें जर्मन सेना में उच्च पद का प्रस्ताव दिया था, जिसे ध्यानचंद ने ठुकरा दिया। उनके लिए देश सर्वोपरि था.

ध्यानचंद का जीवन इस बात का प्रतीक है कि प्रतिभा, समर्पण और राष्ट्रभक्ति के साथ कोई भी व्यक्ति इतिहास रच सकता है. वह एक साधारण सैनिक से भारत के गौरव बन गए। उन्होंने यह सिद्ध किया कि देश का नाम रोशन करने के लिए साधन नहीं, संकल्प चाहिए.

d

आज जब हम हर साल 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस मनाते हैं, तो यह सिर्फ़ एक औपचारिकता नहीं होनी चाहिए. यह उस व्यक्ति की स्मृति है, जिसने गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत को विश्व विजेता बना दिया। ध्यानचंद सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं थे  वे आशा थे, आत्मबल थे और एक संपूर्ण राष्ट्र की आवाज़ थे.

उनकी कहानी आज भी हमें प्रेरणा देती है कि जब इरादे नेक हों, तो हर हार को जीत में बदला जा सकता है  और हर खिलाड़ी, एक राष्ट्र निर्माता बन सकता है.