पश्चिम बंगाल : नई राह दिखाते मुस्लिम चेहरे

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 31-08-2025
West Bengal: Muslim faces showing a new path
West Bengal: Muslim faces showing a new path

 

आवाज द वाॅयस बांग्ला ब्यूरो

पश्चिम बंगाल अपनी गहरी बौद्धिक परंपरा, साहित्य, संगीत, रंगमंच और बहस के लिए जाना जाता है. यहां के लोग कविता, सिनेमा, पेंटिंग और सामाजिक सरोकारों के लिए मशहूर रहे हैं. इसी विरासत में अब मुस्लिम समाज से निकले कुछ चेहरे भी नया अध्याय जोड़ रहे हैं. यह वे लोग हैं जिन्होंने समाज की बेहतरी के लिए खुद को समर्पित कर दिया और जिनकी मेहनत व समर्पण ने हजारों-लाखों ज़िंदगियों को छुआ है.

यहां हम ऐसे ही चेंजमेकर्स की कहानियां साझा कर रहे हैं, जो न केवल बंगाल बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत बन चुके हैं.

sहलीमा खातून : महिलाओं की ‘दबंग’ साथी

सुदूर सुंदरबन से आई हलीमा खातून ने अपने जीवन को हाशिये पर जी रही महिलाओं के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया है. उन्होंने मछुआरा बस्तियों में जाकर महिलाओं की समस्याओं को सुना और उनके साथ खड़ी रहीं. उनका सबसे बड़ा योगदान यह है कि उनकी संस्था की मदद से 700 से अधिक बीड़ी मज़दूर महिलाओं को सरकारी पहचान पत्र मिला.

अक्सर ग़रीबी से जूझते परिवार नाबालिग बेटियों की शादी कर देते हैं. हलीमा इस प्रवृत्ति के खिलाफ डटी रहीं। उन्होंने अब तक दर्जनों बाल विवाह रुकवाए हैं, कई बार पुलिस को साथ लेकर मौके पर पहुंचीं. उनकी निडरता ने उन्हें गांव-गांव में “दबंग दीदी” का दर्जा दिलाया है.

sअब्दुस सत्तार : ‘सत्तार मास्टर’ की शिक्षा यात्रा

जाहलोंगी ब्लॉक के साधारण से गांव से निकले अब्दुस सत्तार को लोग स्नेह से “सत्तार मास्टर” कहते हैं. उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी शिक्षा को समर्पित कर दी. शांतिपुर, डोमकल और इस्लामपुर जैसे इलाकों में वे एक आदर्श शिक्षक के रूप में जाने जाते हैं.

उनकी पहचान केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे शिक्षा को जीवन सुधार का औज़ार मानते हैं. अपने सहज स्वभाव और अथाह दया-भाव के कारण आज वे पूरे इलाके में एक मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत बन चुके हैं.

dइमरान नाहर : खोई हुई लोककथाओं के रक्षक

हुगली जिले के पांडुआ से ताल्लुक रखने वाले इमरान नाहर ने बंगाल की लोक-संस्कृति को बचाने का बीड़ा उठाया है. उन्होंने अकेले ही 500 से अधिक परियों की कहानियों को दस्तावेज़ों में उतारा है.

तेज़ी से बदलते समाज में लोक-कथाएं और कहावतें विलुप्त हो रही थीं. नाहर ने तीन हज़ार से अधिक प्राचीन बंगाली कहावतों को संकलित कर फिर से जीवित कर दिया. यह काम सिर्फ शोध नहीं बल्कि सांस्कृतिक स्मृति को बचाने का प्रयास है.

sहफिज़ुर रहमान : इंसानियत के दूत

हफिज़ुर रहमान का जीवन सेवा और मानवीयता की मिसाल है. उनकी संस्था ने हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों की लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रशिक्षण दिया है. सिलाई मशीनें देकर उन्होंने ग़रीब परिवारों की बेटियों को रोज़गार से जोड़ा.

हर महीने के आखिरी रविवार को उनकी संस्था मुफ़्त स्वास्थ्य शिविर लगाती है, जिसमें डॉक्टर्स, नेत्र-विशेषज्ञ और दवाइयां उपलब्ध कराई जाती हैं. इसके अलावा वे स्थानीय स्तर पर रोज़गार के अवसर पैदा करते हैं ताकि ग़रीब लोग दूर-दराज़ जाकर मज़दूरी करने को मजबूर न हों.

sशेख बहारुल इस्लाम : सजग मंच के संवाहक

सोशल संगठन ‘सजग मंच’ के संस्थापक शेख बहारुल इस्लाम ने सेवा को ही अपना धर्म बना लिया है. उनका मानना है – “ज्यादातर एनजीओ अपने अस्तित्व की जद्दोजहद में उलझ जाते हैं, लेकिन हमने अपनी निजी पूंजी लगाकर शिक्षा पर काम करने की ठानी..”

आज सजग मंच शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में एक विश्वसनीय नाम बन चुका है. बहारुल इस्लाम की निःस्वार्थ सोच और तेज़ गति से काम करने की प्रतिबद्धता ने संगठन को आगे बढ़ने की ताक़त दी है.

sग़ुलाम फ़ारूक : समाज सेवा से कोलकाता को नई पहचान

ग़ुलाम फ़ारूक की संस्था ‘राइट्स फ़ॉर ऑल’ ने कोलकाता को साफ़-सुथरा बनाने का अभियान चलाया. नशामुक्ति अभियान में उन्होंने कोलकाता पुलिस के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय नशा-निरोध दिवस पर रैलियां कीं.

वे ग़रीब बच्चों को शिक्षा यात्राओं पर ले जाते हैं ताकि उनमें आत्मविश्वास और जागरूकता बढ़े. उनकी संस्था न्याय, समानता और गरिमा की आवाज़ बुलंद करती है.

sमोहम्मद नुरुल इस्लाम : शिक्षा के अनजान रास्तों पर

मोहम्मद नुरुल इस्लाम के नेतृत्व में एक टीम ने कठिन रास्ता चुना – हाशिये पर खड़े अल्पसंख्यक समुदायों तक शिक्षा पहुंचाने का. उनका सपना है कि पिछड़े समाज के बच्चे भी आत्मविश्वासी और शिक्षित नागरिक बनें.

वे शिक्षा में गुणवत्ता और निष्पक्षता पर ज़ोर देते हैं. प्रतिभाशाली लेकिन ग़रीब बच्चों को निरंतर सहयोग देना उनकी प्राथमिकता है. निष्पक्षता और पारदर्शिता उनके मिशन की पहचान है.

sजहांग़ीर मलिक : ग़रीबी से उठकर मज़बूत कारोबारी

बर्दवान के बुलबुलीतला गांव के रहने वाले जहांग़ीर मलिक ने 2006 में शांतिपुर के घोष मार्केट में छोटी-सी साड़ी की दुकान से शुरुआत की. आज वे जे.एम. बाज़ार के मालिक हैं, जहां से हज़ारों लोग रोज़गार पाते हैं.

उनकी ईमानदारी और मेहनत ने उन्हें 40 साल की उम्र में एक सफल व्यापारी बना दिया. लेकिन वे अपनी जड़ों को नहीं भूले. रिक्शा चालकों और ग़रीब परिवारों को लगातार सहयोग देकर उन्होंने सामाजिक जिम्मेदारी निभाई है.

wमतीउर रहमान : ‘आर्टिफ़िशियल लीफ़’ से जलवायु संकट की चुनौती

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक मतीउर रहमान ने शुवाजी भट्टाचार्य के साथ मिलकर ‘आर्टिफ़िशियल लीफ़’ विकसित किया है. यह पत्ता सूर्य की रोशनी, पानी और कार्बन डाइऑक्साइड से तरल ईंधन और ऑक्सीजन बनाता है.

यह खोज Nature Energy जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित हुई. इसका महत्व यह है कि अतिरिक्त CO₂ को ईंधन में बदलकर वातावरण को स्वच्छ बनाया जा सकता है. यह तकनीक जलवायु परिवर्तन से जूझती दुनिया को नई राह दिखा सकती है.

sमुस्ताक़ हुसैन : शिक्षा और परोपकार के अगुआ

पश्चिम बंगाल के जाने-माने उद्योगपति मुस्ताक़ हुसैन न केवल कारोबारी हैं, बल्कि शिक्षा और दान के क्षेत्र में भी मिसाल बने हैं. उन्होंने अपने गांव को देश के नक्शे पर पहचान दिलाई.

उनकी प्राथमिकता शिक्षा है  और वह भी बिना किसी भेदभाव के. पचास से अधिक आवासीय स्कूलों के ज़रिए उन्होंने शिक्षा को हर वर्ग तक पहुंचाया है. उनका विश्वास है कि शिक्षा केवल किताबें नहीं, बल्कि नैतिक विकास और सामाजिक जिम्मेदारी भी सिखाए.

ये दस चेहरे सिर्फ नाम नहीं, बल्कि प्रेरणा हैं.हलीमा खातून ने बाल विवाह के खिलाफ मोर्चा खोला, सत्तार मास्टर ने शिक्षा का दीप जलाया, इमरान नाहर ने लोक-संस्कृति बचाई, हाफिज़ुर रहमान ने इंसानियत की सेवा की,

शेख बहारुल ने सजग मंच खड़ा किया, ग़ुलाम फ़ारूक ने कोलकाता को साफ़ करने का बीड़ा उठाया, नुरुल इस्लाम ने हाशिये के बच्चों को पढ़ाया, जहांग़ीर मलिक ने रोज़गार की दुनिया बनाई, मतीअर रहमान ने जलवायु संकट का हल सुझाया और मुस्ताक़ हुसैन ने शिक्षा के दीप जलाए.

पश्चिम बंगाल के ये मुस्लिम चेंजमेकर्स यह साबित करते हैं कि बदलाव केवल नारों से नहीं आता, बल्कि लगातार संघर्ष, साहस और निःस्वार्थ सेवा से आता है।