औरत की मेहनत पर टिकी दुनिया, पर हक़ कहाँ है ?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 31-08-2025
The world rests on the hard work of women, but where are their rights?
The world rests on the hard work of women, but where are their rights?

 

 

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नाज़िया

इतिहास की किताबें अक्सर राजाओं, योद्धाओं और क्रांतिकारियों का बखान करती हैं, जिनमें अधिकतर पुरुषों का ही जिक्र होता है.लेकिन अगर गौर से देखा जाए, तो समाज की असली रीढ़ वे स्त्रियाँ रही हैं, जिन्होंने चुपचाप, बिना प्रशंसा की अपेक्षा किए, दुनिया को आगे बढ़ाया.वे औरतें जिन्होंने रसोई, खेत, कारखाने और परिवार के बोझ को अपने कंधों पर उठाया, लेकिन इतिहास ने उनके योगदान को कभी दर्ज करने की ज़रूरत नहीं समझी.

उनके श्रम को "स्वाभाविक" मान लिया गया और उनके संघर्ष को कहानी कहकर भुला दिया गया.जबकि आज भी उनकी लड़ाई जारी है – अधिकारों की, बराबरी की, और पहचान की.

राजस्थान के बीकानेर जिले के लूंकरणसर ब्लॉक के छोटे से गांव नाथवाना की किरण देवी की कहानी, उन लाखों भारतीय महिलाओं की कहानी है जो हर दिन अपने हिस्से की दुनिया बनाती हैं.

एक साधारण, गरीब परिवार में जन्मी किरण देवी को बचपन में ही किताबों से जुदा कर दिया गया.महज़ 15साल की उम्र में उनका विवाह कर दिया गया.पढ़ने की उम्र में उन्हें बर्तन और चूल्हे की ज़िम्मेदारी दे दी गई.

शादी के कुछ वर्षों बाद उनकी जिंदगी तब बिखर गई, जब 22साल की उम्र में उनके पति की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई.उस समय उनका एक बेटा सात साल का था और वह खुद छह महीने की गर्भवती थीं.दर्द की असली शुरुआत तो तब हुई जब ससुराल वालों ने उन्हें घर से निकाल दिया.एक टूटी-फूटी झोपड़ी में उन्होंने बच्चों के साथ नया जीवन शुरू किया—बिना किसी सहारे के, बिना किसी सुरक्षा के.

किरण देवी ने मजदूरी करके अपने बच्चों को पालने की ठानी, लेकिन वहां भी उन्हें पुरुषों के बराबर सम्मान या अवसर नहीं मिला.मनरेगा जैसी योजनाओं में भी पुरुषों को प्राथमिकता मिलती रही, जबकि महिलाएं पीछे छूटती गईं.यही नहीं, मजदूरी का काम भी उन्हें देर से और कम ही मिलता.यह लिंग आधारित भेदभाव की उस गहरी सच्चाई को सामने लाता है, जो हमारे देश में आज भी व्यापक रूप से मौजूद है.

भारत में महिलाओं द्वारा किया गया घरेलू और अनपेड श्रम राष्ट्रीय GDP के 26%से 36%तक का मूल्य रखता है (2022–23के आंकड़ों के अनुसार).औसतन महिलाएं प्रतिदिन 4.6घंटे घरेलू कार्यों में लगाती हैं, जबकि पुरुष केवल 2.2घंटे.फिर भी यह मेहनत कभी आर्थिक गिनती में शामिल नहीं होती, और न ही समाज इसके लिए उन्हें सम्मान देता है.

पति की मृत्यु के बाद मिलने वाला मुआवज़ा भी किरण देवी को अधूरा ही मिला.वह कहती हैं, “मैं शिक्षित नहीं थी, इस वजह से अपने अधिकारों की पूरी लड़ाई नहीं लड़ सकी.किसी ने मेरा साथ नहीं दिया.” यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जो जरूरतमंद औरतों को कानूनन सहायता देने के बजाय उन्हें और उलझनों में डाल देती है.

इसका असर उनके बच्चों की जिंदगी पर भी पड़ा.बेटों को पांचवीं के बाद पढ़ाई छोड़कर काम करना पड़ा, बेटियों की शिक्षा भी छूट गई.यही वह चक्र है जो औरतों की एक पूरी पीढ़ी को उनके हक़ और सपनों से दूर कर देता है.

हालांकि, इस अंधेरे में उम्मीद की एक रोशनी भी दिखती है.किरण देवी की बड़ी बेटी सीमा, जो अब 27साल की है, फिर से पढ़ाई शुरू कर चुकी है और ओपन बोर्ड से दसवीं की परीक्षा देने जा रही है.सीमा कहती है, “मैंने माँ को जीवनभर संघर्ष करते देखा है.अब मैं पढ़-लिखकर एक सफल व्यवसायी बनना चाहती हूँ.” सीमा की यह उम्मीद किरण देवी के संघर्ष का सबसे खूबसूरत परिणाम है.

किरण देवी की आंखों में अब संतोष है.वह बताती हैं कि हालात के साथ-साथ लोगों का रवैया भी बदल गया है.वही लोग जो उनके कठिन समय में चुप रहे, अब उनकी मिसाल देते हैं.लेकिन यही तो समाज का दोहरा चेहरा है,जब तक औरत टूटती है, तब तक कोई नहीं देखता; लेकिन जब वह जीतती है, तो तालियाँ बजने लगती हैं.

आज, लगभग 60 वर्ष की उम्र में भी किरण देवी का जज्बा कायम है.वे अपनी बेटियों के साथ खड़ी हैं, उनके सपनों को अपनी आंखों से देखती हैं.उनका संघर्ष केवल एक माँ या मजदूर औरत का नहीं, बल्कि पूरे समाज में महिलाओं की स्थिति का आइना है.

किरण देवी की कहानी सिर्फ नाथवाना गांव की एक औरत की नहीं, बल्कि पूरे भारत की उन करोड़ों महिलाओं की कहानी है, जिन्हें न समाज पूरा मानता है, न इतिहास जगह देता है.हम हर बार राजाओं की गाथाएं पढ़ते हैं, लेकिन इन रानियों के बिना समाज कैसे चला—इस पर कोई सवाल नहीं करता.

अगर इतिहास को सच में पूरा बनाना है, तो उसमें किरण देवी जैसी महिलाओं की कहानियाँ भी दर्ज करनी होंगी.औरत का संघर्ष सिर्फ किसी कोने में दर्ज एक पीड़ा नहीं, बल्कि परिवर्तन की सबसे मजबूत नींव है.

जब तक समाज और व्यवस्था उसे बराबरी से नहीं देखेंगे, तब तक यह दुनिया अधूरी रहेगी,क्योंकि दुनिया औरत की मेहनत पर टिकी है, लेकिन हक़ की कुर्सी पर अब भी कोई और बैठा है.

(यह लेखिका के निजी विचार हैं.)