जश्न-ए-रेख़्ता का आयोजन पूरा हुआ, दिल्ली की गुलाबी ठंड में उर्दू घुल गई. गुनगुने माहौल में अदबी बातें हुई, गाना बजाना भी हुआ, लेकिन मूल प्रश्न अपनी जगह खड़ा रह गया. सवाल है कि क्या उर्दू क ज़बान के तौर पर मर रही है या उसका अवसान हो रहा है!
जश्न-ए-रेख़्ता का आयोजन मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में हुआ था और करीब एक पखवाड़े के भीतर इसी स्टेडियम के परिसर में दो बड़े ब्रांड साहित्यिक आयोजन हुए थे. एक एक मीडिया हाउस का आयोजन था, और उसकी मूल भाषा हिंदी थी जबकि जश्न-ए-रेख़्ता उर्दू अदब की बात कर रही थी.
जश्न-ए-रेख़्ता में बेशक संगीत और मुशायरे, फिल्म और साहित्य का ठीक-ठाक मेल था लेकिन धूम उन सत्रों की रही जिनमें कोई बड़ी हस्ती फिल्मी संगीत या पॉपुलर म्युजिक के जरिए समां बांध रहे थे. कुछ दिनों पहले हुए निजी मीडिया हाउस के साहित्य उत्सव में साहित्य थोड़ा हाशिए पर ही था.
सवाल है कि साहित्य के बारे में बात करने के उत्सवों में फिल्मी हस्तियों का बुलाना कितना महत्वपूर्ण है और क्या यह भीड़ जुटाने की कवायद भर है? फिर भी, रेख्ता आयोजन में उर्दू साहित्य और उसकी पोएड्री के विभिन्न रूप चर्चा के केंद्र में थे. इस आयोजन को एक हद तक साहित्य में आम आदमी को केंद्र में रखने वाले आयोजनों की श्रेणी में रखा जा सकता है.
लेकिन, उस उर्दू का क्या हुआ जिसके केंद्र में यह आयोजन है?
उर्दू का इतिहास और इतिहास की उर्दू
आखिर, इतिहास साम्राज्यों और राजवंशों के बनने और बिखरने का किस्सा ही हो है. इनके साथ ही, कई बार इतिहासकार संस्कृति और भाषा की बात भी करते ही हैं.
अमूमन, भाषा किसी भी शासक की संस्कृति और शासन और रोजमर्रा के जीवन और प्रशासन में इसकी पहुंच का प्रतीक होती है. सत्ता परिवर्तन और नए शासक भाषायी इस्तेमाल में भी बदलाव लाते हैं. लेकिन किसी भाषा का समय के साथ छीजते जाना अलग ही मामला है और इसकी मिसाल है उर्दू.
निजामों के शासन में दक्कन में उर्दू खूब फूली और फली लेकिन आज वहां भी उर्दू के कद्रदान कम होते जा रहे हैं. निजामों के दौर में उर्दू आधिकारिक भाषा थी और अब उन इलाकों में भी उर्दू दूसरी भाषा बन गई है.
बिलाशक, उर्दू लंबे वक्त तक आमजनों की भाषा रही है लेकिन दक्कन में 19वीं सदी में सालारजंग द्वितीय मीर लाइक़ अली खान के दौर में इसको आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल हुआ था. सालारजंग द्वितीय ने फारसी की जगह पर खतो-किताबत की भाषा के रूप में उर्दू को प्रतिष्ठा दी थी.
उर्दू को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने का पहला प्रस्ताव—कम से कम अदालतों और कचहरियों में इस्तेमाल के लिए—साल 1871 में बशीर-उद्द-दौला ने पेश किया था. बशीर-उद्द-दौला सालार जंग प्रथम, मीर तुर अली खान के शासन में सद्र-उल-महम यानी अदालत मंत्री थे. लेकिन, सालारजंग प्रथम ने इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति नही थी क्योंकि वह फारसी को अधिक अहम मानते थे.
साल 1206 से ही बहमनी और आदिलशाही शासक फारसी को आधिकारिक भाषा के रूप में इस्तेमाल करते आ रहे थे और सालार जंग प्रथम इस परंपरा के उलट जाना नहीं चाहते थे.
बशीर-उद-दौला कम से कम अदालती मामलों में सुधार लागू करने के इच्छुक थे ताकि बयानों को स्वीकार करने और विभिन्न पक्षों द्वारा आसानी से समझे जाने वाले आदेश देने में उर्दू का इस्तेमाल किया जा सके. लेकिन प्रस्ताव को 1884 तक आधिकारिक सहमति नहीं मिली.
1884 में लईक़ अली खान के दौर में उर्दू को अदालती कार्यवाही की भाषा के रूप में पेश किया गया था और 1886 में यह भाषा राज्य की आधिकारिक भाषा बन गई. जल्दी ही, यह राजस्व और बाकी के महकमों में भी इस्तेमाल होने लगी और आखिर में इसको मुतमदीन यानी राज्य केसचिवालय में इस्तेमाल होने वाली भाषा भी बन गई.
आधिकारिक भाषा
निज़ाम को सौंपे गए एक अर्ज दश्त (ज्ञापन) को 1886 में उनकी सहमति मिली, जिससे उर्दू को आधिकारिक भाषा बना दिया गया. उर्दू को आधिकारिक भाषा बनाने के आदेश मोहसिन-उल-मुल्क, तत्कालीन सचिव, वित्त और राजनीतिक मामलों द्वारा जारी किए गए थे, जिससे स्थानीय भाषा को इसका गौरव प्राप्त हुआ.
1917 में शुरू हुई उस्मानिया विश्वविद्यालय में शिक्षा का माध्यम बनने के बाद उर्दू भाषा अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच हई थी. 1948 में हैदराबाद राज्य के भारतीय संघ में विलय तक उर्दू में अधिकांश संचार जारी रहा, इसके पतन की शुरुआत हुई.
आजादी के बाद से इस इलाके में भी अंग्रेजी को प्रमुखता मिलने लगी और उर्दू को तगड़ा झटका लगा. 1951 तक उर्दू में राजपत्र जारी किए जाने के उदाहरण थे, लेकिन रिकॉर्ड बताते हैं कि दिसंबर 1951 में उर्दू में आधिकारिक राजपत्र जारी करना पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया था. हालांकि सातवें निज़ाम, मीर उस्मान अली खान को राज प्रमुख बनाया गया था, लेकिन निज़ाम राज्य के भारतीय संघ में विलय के बाद, उर्दू के गौरव को बहाल करने में मदद नहीं कर सके.
1956 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद उर्दू की स्थिति और भी कमजोर होती चली गई क्योंकि आंध्र प्रदेश का गठन ही बाष (तेलुगू) के आधार पर हुआ था. अब उर्दू राज्य में एक दर्जन से भी कम जिलों में बोली जाने वाली दूसरी भाषा के पायदान पर खिसक गई.
अब क्या है उर्दू की स्थिति
देश की आजादी की जंग में अहम भूमिका निभाने वाली उर्दू पत्रकारिता का भी अब वक्त अच्छा नहीं है. देश के बंटवारे और उर्दू पर मुसलमानों की भाषा होने के आरोपों की वजह से भी उर्दू को बुरे हालात का सामना करना पड़ रहा है.
प्रमुख उर्दू पत्रकार जीडी चंदन ने भारत सरकार के शोध संस्थान नेशनल डॉक्यूमेंटेशन सेंटर ऑन मास कम्युनिकेशन के लिए तैयार की गई रिपोर्ट में लिखा हैः
“आजादी के बाद प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद उर्दू अखबारों की संख्या में चार गुना वृद्धि हुई और 50 वर्षों के दौरान यानी नब्बे के दशक के अंत तक उनके प्रकाशन में लगभग सात गुना वृद्धि हुई.1997 को उर्दू पत्रकारिता के पतन के साल के रूप में देखा जा सकता है.”
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उर्दू अखबारों का प्रकाशन वर्ष 2001 में घटकर 51,6,182 रह गया जबकि 2000 में यह 61,20,317 था.
उत्तर भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश को हमेशा उर्दू भाषा का गढ़ माना गया है.भाषाओं पर 2011 की जनगणना के आंकड़ों से पता चला है कि उर्दू को अपनी मातृभाषा बताने वाले लोगों की संख्या में गिरावट आई है. हालांकि जनगणना के आंकड़े कुछ साल पहले जारी किए गए थे, लेकिन भाषाओं और मातृभाषा के आंकड़े हाल ही में जारी किए गए हैं.
1 करोड़ से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं में केवल उर्दू में गिरावट आई है. जबकि समग्र जनसंख्या में काफी वृद्धि हुई है, उर्दू बोलने वालों की संख्या 4.2% से नीचे गिर गई है. कोंकणी के अलावा, उर्दू एकमात्र भाषा है जिसने बोलने वालों की संख्या में गिरावट दर्ज की है.
2001 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार उर्दू छठी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा थी, लेकिन 2011की जनगणना में यह सातवीं (गुजराती इससे आगे निकल गई) हो गई.आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि 2001 और 2011 के बीच हिंदीभाषी लोगों की संख्या में लगभग 10 करोड़ लोग जुड़ गए हैं.
भाषाएं धर्मों से जुड़ी नहीं हैं और यह भी मानी हुई बात है कि उर्दू को अपनी मातृभाषा के रूप में दर्ज कराने वाले लोगों की तुलना में कहीं अधिक लोग इसे समझते और बोलते हैं. लेकिन, आमतौर पर मुस्लिम समुदाय के लोग ही उर्दू को अपनी मातृभाषा बताते हैं.
अग सिर्फ मुसलमान ही उर्दू बोलते हैं तो भी उत्तर भारत में उर्दू का अवसान हो रहा है. और यह आंकड़ों में दिखता है. उत्तर प्रदेश में 3.85 करोड़ मुसलमान रहते हैं, लेकिन राज्य के दस्तावेजों में दर्ज ह कि इनमें से सिर्फ 1.08 करोड़ लोग उर्दू बोलते हैं. यानी इस लिहाज से भी कि सिर्फ मुसलमान ही अपनी मातृभाषा उर्दू बताते हैं तो उत्तर प्रदेश के सिर्फ 28 फीसद मुसलमान ही उर्दू को अपनी मातृभाषा बताते हैं.
लेकिन दक्षिण का मामला अलग है
उत्तर भारत में उर्दू की दुखद स्थिति के उलट आज के दौर में दक्षिण भारत में उर्दू का विकास उम्मीद जगाने वाला है. न सिर्फ आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में उर्दू बोलने वालों की संख्या बढ़ी है बल्कि महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी यह वृद्धि देखी जा रही है.
महाराष्ट्र में 75 लाख से अधिक लोग उर्दू बोलते हैं. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना, दोनों राज्यों को मिलाकर 75 लाख उर्दू बोलने वाले हैं और कर्नाटक में 66.18 लाख लोगों ने उर्दू को अपनी मातृभाषा बताया है.
यानी इन चार राज्यों को जोड़ लिया जाए तो दक्षिण भारत में 2.15 करोड़ लोग उर्दू बोलने वाले हैं और उत्तर प्रदेश में उर्दू बोलने वालों की संख्या के मुकाबले यह कोई दोगुनी संख्या है.
मध्य प्रदेश और राजस्थान में उर्दू बोलने वालों की संख्या 9.16 लाख और 6.64 लाख है. हालांकि, बिहार में 87.7 लाख उर्दू बोलने वाले हैं.
इसके अलावा विभिन्न राज्यों में लाखों बोलनेवालों के साथ उर्दू एक अखिल भारतीय भाषा बनी हुई है. झारखंड (19.6 लाख), पश्चिम बंगाल (16.6 लाख) और तमिलनाडु (12.6 लाख) जैसे राज्यों में भी उर्दूभाषी आबादी अच्छी खासी है.
आंकड़े का विश्लेषण बताता है कि उर्दू का उत्तर भारतीय गढ़ ढह रहा है. लेकिन दक्षिण भारत में, दक्कन यानी औरंगाबाद से गुलबर्गा और हैदराबाद से वेल्लोर तक का इलाका आज भी उर्दू के फलन-फूलने की उम्मीदों को जिंदा रखे हुए है.
लेकिन इसके साथ ही, इस बात का ख्याल भी रखना होगा कि अगर उर्दू को फिर से उसकी प्रतिष्ठा पानी है, तो इसको बदलती तकनीक के साथ चलना होगा. प्रकाशित यानी छपी हुई किताबों को दौर शायद गुजरा वक्त होने वाला है, और विभिन्न भाषाओं का साहित्य अब तकनीक के रथ पर सवार है. ऐस में उर्दू को भी तकनीक को अपनाना होगा.
उर्दू नर्म-ओ-नाजुक, शायर ओ कलाम की भाषा है इसको ज्ञान, विज्ञान, और दर्शन की भाषा में बदलना होगा.