आवाज द वाॅयस/ नई दिल्ली/पुणे
देश के नौजवानों में यदि जुनून हो, कल्पनाशीलता हो और उसे साकार करने का साहस हो, तो वे अंतरिक्ष में भी अपनी छाप छोड़ सकते हैं. पुणे के पुणे इंस्टिट्यूट ऑफ कंप्यूटर टेक्नोलॉजी (PICT) के नौ होनहार छात्रों की एक टीम ने यही कर दिखाया है. ISRO के यू. आर. राव सैटेलाइट सेंटर द्वारा आयोजित ‘रोबोटिक्स चैलेंज 2025’, जिसकी थीम थी ‘Fly Me to Mars’ — में इस टीम ने देश की सैकड़ों प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों को पीछे छोड़ते हुए जीत हासिल की और दस लाख रुपये की इनामी राशि अपने नाम की.
यह चुनौती साधारण नहीं थी. इसमें छात्रों को एक ऐसा ऑटोनॉमस ड्रोन तैयार करना था, जो मंगल ग्रह जैसे वातावरण में बिना GPS, बिना कंपास और बिना किसी बाहरी नेविगेशन सहायता के स्वतः उड़ान भर सके, रास्ता पहचान सके, लैंडिंग ज़ोन खोज सके और फिर सुरक्षित लौट सके.
इस कठिन कार्य को PICT के छात्रों की टीम ‘Galactic Gearheads’ ने मात्र ₹50-60 हजार की लागत में पूरा कर दिखाया.इस विजेता टीम में आर्यन शुक्ला, तोशित वार्क, भाविका पनपालिया, अथर्व जोशी, धवल तलेले, नंदिनी देशमुख, कौशल चौधरी, हृषिकेश पटवर्धन और टीम लीडर निमिष सातव शामिल थे.
टीम को इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टेलीकम्युनिकेशन डिपार्टमेंट के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संदीप गायकवाड़ का मार्गदर्शन प्राप्त था. छात्रों ने इस प्रोजेक्ट पर अपने दूसरे वर्ष से ही काम शुरू कर दिया था और लगातार प्रयोग, परीक्षण और संशोधन करते रहे.
यह प्रतियोगिता देशभर के 510 तकनीकी संस्थानों के बीच थी, जिनमें IITs और NITs जैसी अग्रणी संस्थाएं भी शामिल थीं. लेकिन इन नौ छात्रों ने सीमित संसाधनों और ज़बरदस्त रचनात्मकता के बल पर एक ऐसा हल्का ड्रोन तैयार किया, जिसका वजन सिर्फ 1.7 किलोग्राम था, जो ISRO द्वारा निर्धारित सीमा (2 किलो) के भीतर था.
इसरो की इस चुनौती का सबसे बड़ा पहलू यह था कि इसे मंगल ग्रह के वातावरण के अनुरूप डिज़ाइन किया गया था. वहां GPS जैसी पारंपरिक नेविगेशन तकनीकें काम नहीं करतीं.
न वहां चुंबकीय क्षेत्र है, न संचार की सामान्य सुविधाएं। छात्रों को एक ऐसा सिस्टम बनाना था जो खुद सोच सके, खुद निर्णय ले सके और सटीक नेविगेशन कर सके. PICT की टीम ने इस कार्य के लिए LiDAR (Light Detection and Ranging), Depth Mapping, Gradient Analysis, Computer Vision और Optical Flow Algorithms जैसे उन्नत तकनीकी तरीकों का इस्तेमाल किया.
टीम लीडर निमिष सातव बताते हैं कि उन्होंने 2D LiDAR को 3D में बदलने का सस्ता और प्रभावी समाधान खोजा, जिससे ड्रोन को पूरे वातावरण का बेहतर दृश्य प्राप्त हो सके.
इसके अलावा, टीम ने अपने कॉलेज परिसर में 9x12 मीटर का एक 'मार्टियन सिम्युलेशन एरिया' तैयार किया, जिसमें मंगल जैसे पथरीले और असमान परिदृश्य तैयार कर ड्रोन की क्षमता का परीक्षण किया गया.
यह सिर्फ तकनीकी उपलब्धि नहीं थी, बल्कि भारत के युवाओं के सपनों को साकार करने की दिशा में एक सशक्त कदम था. ISRO द्वारा निर्धारित परीक्षणों में इस ड्रोन ने टेकऑफ, हवा में होवर करना, सुरक्षित लैंडिंग और बेस पर लौटने जैसी सभी क्षमताएं बिना किसी बाहरी मदद के खुद से पूरी कीं.
इस परियोजना की खास बात यह भी रही कि जहां कई टीमों ने महंगे कैमरे और सेंसर पर भारी खर्च किया, वहीं पुणे की टीम ने सीमित बजट में एक उच्च क्षमता वाला सिस्टम तैयार किया, जो नवाचार और संसाधनों के प्रभावी उपयोग की मिसाल बन गया. उनके ड्रोन की हर गतिविधि और नेविगेशन निर्णय एक स्वायत्त प्रणाली द्वारा लिए जा रहे थे, जो मंगल जैसे निर्जन ग्रह के लिए बेहद आवश्यक है.
यह सफलता एक ऐसे समय में आई है जब भारत अंतरिक्ष की दुनिया में लगातार नई ऊंचाइयां छू रहा है. ISRO पहले ही मंगल मिशन 'मंगलयान' की सफलता के बाद दूसरे मिशनों की योजना बना रहा है, जिनमें सॉफ्ट लैंडिंग और हवाई अन्वेषण भी शामिल हैं. इन योजनाओं में यदि छात्र-स्तर पर विकसित हुई तकनीकें काम आती हैं, तो न केवल देश का आत्मनिर्भरता लक्ष्य साकार होगा, बल्कि छात्रों को भी सीधे अंतरिक्ष अभियानों में भागीदारी का अवसर मिलेगा.
इस टीम की प्रेरणा भी कम खास नहीं है. मंगल पर उड़ान भरने वाला पहला हेलीकॉप्टर , NASA का Ingenuity , एक भारतीय मूल के वैज्ञानिक डॉ. बॉब बलराम की देन था.
उनके काम ने न केवल भारत बल्कि पूरी मानवता को अंतरग्रहीय हवाई अन्वेषण की दिशा में अग्रसर किया. अब उनके पदचिह्नों पर चलते हुए PICT की यह युवा टीम भविष्य में ISRO की परियोजनाओं में अपना योगदान देना चाहती है. उनका सपना है कि एक दिन उनका बनाया ड्रोन सच में मंगल की सतह पर उड़ान भरे.
ISRO ने इसरो रोबोटिक चैलेंज 2025 के परिणाम 23 अगस्त को घोषित किए, जिसमें Galactic Gearheads की सफलता को भरपूर सराहना मिली. इस आयोजन ने एक बार फिर यह साबित किया कि भारत की युवा पीढ़ी तकनीकी कौशल और नवाचार में किसी से पीछे नहीं है.पुरस्कार समारोह में स्ट्रोनाॅट शुभमन शुक्ला भी मौजूद थे.
इस चुनौती ने न केवल छात्रों को वैज्ञानिक सोच और व्यावहारिक इंजीनियरिंग की दिशा में आगे बढ़ाया, बल्कि यह भी दिखाया कि कैसे सीमित संसाधनों के बावजूद असाधारण परिणाम हासिल किए जा सकते हैं.
जैसे-जैसे भारत अंतरिक्ष में अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहा है, वैसे-वैसे कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर ऐसी प्रतियोगिताएं छात्रों को प्रेरणा देने का माध्यम बन रही हैं. ISRO की इस पहल ने छात्र समुदाय को न केवल चुनौती दी, बल्कि उन्हें एक मिशन का हिस्सा बनने का अवसर भी दिया.
आज जब देश आत्मनिर्भर भारत की ओर अग्रसर है, तब ऐसे नवाचार और वैज्ञानिक उपलब्धियां भारत को वैश्विक मंच पर अग्रणी बनाने में अहम भूमिका निभा रही हैं. और इस पूरी यात्रा की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह शुरुआत एक कॉलेज लैब से हुई थी, एक छोटे से विचार से, जो अब अंतरिक्ष में उड़ान भरने को तैयार है.
PICT की इस उपलब्धि ने यह भी साबित कर दिया है कि भारत के छात्र सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि तकनीकी इतिहास रचने के लिए भी तैयार हैं. इस टीम की कहानी हर युवा को यह संदेश देती है कि सपना चाहे जितना बड़ा हो, अगर मेहनत और लगन हो तो वह ज़रूर साकार होता है.