भक्ति चालक
गणेशोत्सव सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और एकता का संगम है.पूरे देश में दस दिनों तक धूम-धाम से मनाए जाने वाले इस गणेशोत्सव की नींव महाराष्ट्र में ही रखी गई थी.इस साल राज्य सरकार ने इस उत्सव को 'राज्य महोत्सव' घोषित किया है, जिससे इसे सरकारी स्तर पर अनुदान और मदद मिलेगी.जन-भागीदारी, डिजिटल प्रसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता और पर्यावरण के अनुकूल पहलों के कारण, यह उत्सव सिर्फ धार्मिक न रहकर समाज को एक साथ लाने वाला एक सांस्कृतिक पर्व बन गया है.
इस उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण हैं मुंबई के लालबाग के राजा.लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र यह गणपति, राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में दुनिया भर में जाने जाते हैं.आज लालबाग उत्सव का 92वां साल है.'मन्नत पूरी करने वाले गणपति' के रूप में प्रसिद्ध, यह भगवान न केवल इच्छाओं को पूरा करने के, बल्कि सामाजिक एकता के भी प्रतीक हैं.
लालबाग के राजा उत्सव मंडल के एक कदम ने दुनिया को हिंदू-मुस्लिम सामाजिक एकता का दर्शन कराया है.आइए, आज के इस विशेष लेख में जानते हैं कि यह कैसे हुआ.
एकता की बुनाई वाला मखमली पर्दा
इस साल लालबाग के राजा की सजावट तिरुपति बालाजी की स्वर्ण थीम पर आधारित है.राजा की भव्य मूर्ति गहरे लाल रंग के पीतांबर में एक स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान है.बाएं हाथ में चक्र, दाएं हाथ में शंख और सिर पर एक भव्य मुकुट धारण किए गणपति का यह रूप भक्तों को मंत्रमुग्ध कर रहा है.
गणपति के चारों ओर चमकती लाइटें, सोने की सजावट और प्रवेश द्वार पर खड़े हाथियों ने पंडाल को एक शाही महल का रूप दे दिया है.इन सबके बावजूद, इस साल की सजावट की सबसे खास बात है पंडाल के सामने लगा 50फुट ऊंचा मखमली पर्दा.
इस साल तिरुपति बालाजी का भव्य मुकुट बनाए जाने के कारण पंडाल की ऊंचाई भी 50फुट तक बढ़ानी पड़ी.इसलिए, पंडाल के सामने एक विशाल और खूबसूरत मखमली पर्दा तैयार करना एक बहुत बड़ी चुनौती थी.
काफी कोशिशों के बाद भी कुशल कारीगर मिलना मुश्किल हो रहा था.मंडल ने इसके लिए देश भर में कारीगरों की तलाश शुरू की और अंत में इसका समाधान उत्तर प्रदेश के एक मुस्लिम व्यक्ति के पास मिला.लखनऊ के पास एक गांव के मोहम्मद रईस खान ने अपने साथियों के साथ इस पर्दे को बनाने की चुनौती स्वीकार की.मंडल द्वारा सौंपे गए इस काम को उन्होंने पूरी लगन से पूरा किया और अपनी कला का बेहतरीन प्रदर्शन किया.
50फुट ऊंचे मखमली पर्दे की खासियत
पंडाल के सामने लगाया गया यह पर्दा 50फुट ऊंचा और चौड़ा है.इसकी चुन्नटों का घेरा ही लगभग आठ फुट का है.लखनऊ से आए मोहम्मद रईस खान और उनकी टीम ने पांच-छह दिनों से ज़्यादा समय तक इस पर्दे के लिए मशीनों पर दिन-रात मेहनत की.
मखमल और ज़री के काम वाले इस पर्दे ने लालबाग के राजा की इस साल की सजावट को और भी भव्य बना दिया है.यह पर्दा सिर्फ सजावट का एक हिस्सा नहीं, बल्कि एकता, आस्था और कला का संगम बन गया है.
मुस्लिम कारीगरों की प्रतिक्रिया
प्रसिद्ध लालबाग के राजा की सजावट का काम करने का सौभाग्य मिलने पर रईस खान ने खुशी जाहिर की.बीबीसी को अपनी प्रतिक्रिया देते हुए वे कहते हैं, "गणेशोत्सव हमारा भी त्योहार है.हमें पैसे से कोई लेना-देना नहीं है.लखनऊ में भी हमें ज़्यादा पैसे मिल रहे थे। लेकिन हमें यहां आकर काम करना था और सिर्फ बप्पा को खुश करना था.हमने सजावट का यह काम बहुत दिल से किया है."
भावुक होकर वे आगे कहते हैं, "मुझे हिंदू-मुस्लिम में भेद नहीं करना है, बल्कि सबको साथ लेकर चलना है.राजनीति हमारा काम नहीं, हिंदू-मुस्लिम का भेद नेताओं को ही करने दीजिए.हम सबका ईश्वर एक ही है, बस सबकी आस्था अलग-अलग है."
लालबाग के राजा की मूर्ति के चरणों के नीचे रखी मुलायम गद्दी महमूद अली शेख ने बनाई है.बीबीसी को प्रतिक्रिया देते हुए महमूद ने कहा, "पिछले 10सालों से मैं अपनी कला के ज़रिए लालबाग के राजा की सेवा कर रहा हूं.
हम धार्मिक भेदभाव किए बिना जितना एक साथ रहेंगे, उतना ही अच्छा है.इससे सामाजिक माहौल भी अच्छा रहेगा। देश की तरक्की के लिए हमारी एकता बहुत ज़रूरी है, क्योंकि एक हाथ की ताकत से दस हाथों की ताकत में ज़्यादा बल होता है."
लालबाग के राजा गणेशोत्सव मंडल के अध्यक्ष बालासाहेब कांबले ने इस पर कहा, "यहां कई जातियों, धर्मों और भाषाओं के लोग एक छत के नीचे मिलकर काम करते हैं.
यहां मुस्लिम भाई भी कई तरह के काम कर रहे हैं.पिछले पांच-छह दिनों से उन्होंने बड़ी मेहनत से पर्दा बनाने का काम किया है.लालबाग का राजा मंडल हमेशा एकता का संदेश देता है, इसलिए यहां किसी भी तरह के भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है."
गणेशोत्सव शुरू होने से पहले, समाज में धार्मिक सद्भाव बनाने के इरादे से महाराष्ट्र के एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरने एक वीडियो बनाया था.लेकिन इस वीडियो से कई लोगों की 'भावनाएं' आहत हो गईं.
उस वीडियो में एक मुस्लिम मूर्तिकार से मूर्ति खरीदने पर विवाद खड़ा हो गया था.ऐसे समय में जब समाज में नफरत भरे विचार हावी हो रहे हैं, महाराष्ट्र के सबसे लोकप्रिय गणपति, लालबाग के राजा उत्सव मंडल ने सद्भाव की एक मज़बूत मिसाल पेश की है.
उनके इस कदम ने हिंदू-मुस्लिम सद्भाव का विरोध करने वालों को एक करारा जवाब दिया है और सार्वजनिक गणेश उत्सव की सच्ची परंपरा को और भी मज़बूती से पेश किया है.