नई दिल्ली
माओत्से तुंग को आधुनिक चीन के संस्थापकों में प्रमुख स्थान दिया जाता है। लेकिन दुनिया के सबसे बड़े कम्युनिस्ट नेताओं में शामिल होने से पहले उनका जीवन बिल्कुल अलग था। एक समय वह पेकिंग विश्वविद्यालय में साधारण पुस्तकालय सहायक के तौर पर काम करते थे। यहीं से शुरू हुई उनकी वैचारिक यात्रा आगे चलकर चीन की राजनीति को पूरी तरह बदलने वाली क्रांति में बदल गई।
माओत्से तुंग का जन्म 26 दिसंबर 1893 को मध्य चीन के हुनान प्रांत के शाओशान इलाके में एक किसान परिवार में हुआ था। उस समय चीन पर किंग राजवंश का शासन था। देश गरीबी, राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक संकट से गुजर रहा था।
1911 में चीनी राजशाही का अंत हुआ और देश गणराज्य बना। लेकिन मजबूत केंद्रीय सत्ता के अभाव और क्षेत्रीय संघर्षों ने चीन को राजनीतिक विभाजन की ओर धकेल दिया। इसी उथल-पुथल के दौर में युवा माओ राजनीति की ओर आकर्षित हुए।
माओ का परिवार आसपास के कई परिवारों की तुलना में आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में था। इसके बावजूद बचपन और युवावस्था में उन्होंने अपने आसपास गरीबी, अकाल और सामाजिक असमानता को करीब से देखा।
हुनान में अकाल से परेशान लोगों के प्रदर्शन और उनके दमन की घटनाओं ने माओ पर गहरा प्रभाव डाला। बाद के वर्षों में चीन की भयावह परिस्थितियों ने उनकी राजनीतिक सोच को आकार दिया।
उस दौर में देश बार-बार बाढ़, अकाल और संघर्षों से प्रभावित हो रहा था। लाखों लोग भोजन और सुरक्षा की तलाश में अपने घर छोड़ने को मजबूर थे। भुखमरी और बीमारी का संकट इतना गहरा था कि कई परिवार अपने बच्चों तक को बेचने के लिए मजबूर हो गए थे।
माओ ने 25 वर्ष की उम्र में प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक का प्रशिक्षण पूरा किया। लेकिन उनका झुकाव धीरे-धीरे शिक्षा से राजनीति और सामाजिक बदलाव की ओर बढ़ता गया।
1917 की रूसी क्रांति ने भी उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद माओ का रुझान साम्यवाद की ओर बढ़ा और उन्होंने किसानों को संगठित करने को क्रांतिकारी संघर्ष का महत्वपूर्ण आधार माना।
1920 के दशक की शुरुआत में पेकिंग विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में काम करते हुए माओ की मुलाकात वहां के मुख्य पुस्तकालयाध्यक्ष ली दाझाओ और विश्वविद्यालय के डीन चंदू शिल से हुई। इन लोगों के संपर्क में आने के बाद माओ मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित हुए।
पुस्तकों और यूरोपीय समाजवाद के अध्ययन ने उनकी राजनीतिक सोच को नई दिशा दी। आगे चलकर मार्क्सवाद और लेनिनवाद उनके राजनीतिक जीवन के प्रमुख आधार बन गए।
माओ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के शुरुआती नेताओं में शामिल हुए। उस समय पार्टी की राजनीतिक ताकत बहुत सीमित थी। उन्होंने हुनान में किसानों के बीच संगठन खड़ा करने और गुरिल्ला संघर्ष का रास्ता अपनाया।
धीरे-धीरे उन्होंने चीन के दूरदराज इलाकों में कम्युनिस्ट ठिकाने स्थापित किए।
1923 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और कुओमिनतांग के बीच गठबंधन हुआ। दोनों का साझा लक्ष्य राष्ट्रवादी ताकतों को मजबूत करना था। लेकिन यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चल सका।
1927 में कुओमिनतांग नेता च्यांग काई-शेक के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी सरकार ने कम्युनिस्टों के खिलाफ बड़े पैमाने पर दमन अभियान शुरू कर दिया। हजारों कम्युनिस्ट कार्यकर्ता मारे गए। माओ की पत्नी और बहन भी इस हिंसक दौर की शिकार हुईं।
माओ और दूसरे कम्युनिस्ट नेताओं को दक्षिण-पूर्वी चीन के इलाकों में शरण लेनी पड़ी। इसी दौर में कम्युनिस्टों ने सशस्त्र संघर्ष को और संगठित किया।
अगस्त 1927 में लाल सेना के गठन के बाद माओ ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया।
1934 में कुओमिनतांग की सेना ने कम्युनिस्ट ठिकानों पर फिर बड़े हमले शुरू किए। इसके बाद माओ और उनके साथियों ने ऐतिहासिक ‘लॉन्ग मार्च’ शुरू किया।
कम्युनिस्ट लड़ाकों को बर्फीले पहाड़ों, दलदलों और रेगिस्तानी इलाकों से होकर लंबी दूरी तय करनी पड़ी। यह यात्रा बेहद कठिन थी। उत्तर-पश्चिमी चीन के यानान पहुंचने तक शुरुआती दल के बहुत कम सदस्य जीवित बचे थे।
यानान में माओ ने कम्युनिस्ट आंदोलन का नया आधार तैयार किया। उस समय ऐसा लग रहा था कि कम्युनिस्ट आंदोलन शायद खत्म हो जाएगा। लेकिन इतिहास ने जल्द ही नया मोड़ लिया।
1937 में जापान ने चीन पर बड़े पैमाने पर हमला कर दिया। जापानी सेना का लक्ष्य चीन के बड़े हिस्से पर कब्जा करना था। दिसंबर 1937 में नानजिंग पर हुए हमले में भारी संख्या में लोग मारे गए।
जापानी आक्रमण के सामने कम्युनिस्ट पार्टी और कुओमिनतांग ने अपने आपसी संघर्ष को कुछ समय के लिए पीछे रखकर जापान के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बनाया।
इस युद्ध ने चीन के समाज और राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। बड़ी संख्या में लोग अपने ही देश में विस्थापित हुए। लाखों नागरिकों और सैनिकों की जान गई।
इसी दौर में माओ यानान में रहते थे। पश्चिमी पत्रकार और विदेशी पर्यवेक्षक उनसे मिलने पहुंचते थे। कई लोगों ने उन्हें सहज, बुद्धिमान और प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला नेता बताया।
1945 में द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी और कुओमिनतांग के बीच फिर संघर्ष शुरू हो गया। चीन में गृहयुद्ध छिड़ गया।
कुओमिनतांग को अमेरिका और पश्चिमी देशों से समर्थन हासिल था, जबकि कम्युनिस्टों को सोवियत संघ का सहयोग मिला। हथियारों और संसाधनों के मामले में कम्युनिस्ट शुरुआत में कमजोर थे। लेकिन ग्रामीण इलाकों में उनके भूमि सुधार कार्यक्रम ने उन्हें व्यापक समर्थन दिलाया।
लंबे संघर्ष के बाद माओ के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने गृहयुद्ध में जीत हासिल की।
1 अक्टूबर 1949 को माओत्से तुंग ने तियानमेन गेट से पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना की घोषणा की।
कुओमिनतांग नेता च्यांग काई-शेक ताइवान चले गए। चीन में एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत हुई।
माओ की राजनीतिक विचारधारा को आगे चलकर माओवाद के नाम से जाना गया। यह मार्क्सवाद-लेनिनवाद का ऐसा रूप था जिसे माओ ने कृषि प्रधान चीनी समाज की परिस्थितियों के अनुरूप ढालने की कोशिश की।
कम्युनिस्ट सत्ता ने उद्योगों को राज्य के नियंत्रण में लिया और किसानों को सामूहिक खेती की व्यवस्था में शामिल किया। राजनीतिक विरोध को कठोरता से दबाया गया।
लेकिन माओ के शासनकाल की सबसे विवादित नीतियों में से एक ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ रही।
1958 में शुरू की गई इस नीति का उद्देश्य कृषि और औद्योगिक उत्पादन को तेजी से बढ़ाना था। इसके तहत बड़े पैमाने पर लोगों को संगठित करके उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की गई। लेकिन नीति बुरी तरह विफल रही।
कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आई और देश भीषण अकाल की चपेट में आ गया। इस अकाल में तीन करोड़ से अधिक लोगों की मौत होने का दावा किया गया है।
इस आपदा के बाद माओ की राजनीतिक स्थिति कमजोर हुई।
सत्ता पर अपना प्रभाव दोबारा मजबूत करने के लिए माओ ने 16 मई 1966 को सांस्कृतिक क्रांति शुरू करने का आह्वान किया।
माओ का मानना था कि चीन के समाज में पुरानी सोच, आदतों और विचारों का प्रभाव खत्म करना जरूरी है। उनका उद्देश्य क्रांतिकारी विचारधारा को फिर मजबूत करना था।
इस अभियान को लाखों युवाओं का समर्थन मिला। रेड गार्ड नाम से युवा समूहों का गठन हुआ। उन्होंने चीन की पारंपरिक संस्कृति और पुराने सामाजिक ढांचे के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया।
लेकिन धीरे-धीरे यह अभियान हिंसा और अराजकता में बदल गया।
जमींदार, शिक्षक, बुद्धिजीवी, स्थानीय अधिकारी और राजनीतिक विरोधी निशाने पर आ गए। सार्वजनिक रूप से लोगों का अपमान किया गया। कई लोगों को शारीरिक प्रताड़ना दी गई और अनेक लोगों की जान चली गई।
शिक्षकों को भी विशेष रूप से निशाना बनाया गया। कई जगह छात्रों ने अपने शिक्षकों को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया और उनके साथ हिंसा की।
सांस्कृतिक क्रांति के दौरान माओ की प्रसिद्ध ‘लिटिल रेड बुक’ को व्यापक रूप से पढ़ना अनिवार्य जैसा बना दिया गया था।
शुरुआत में सांस्कृतिक क्रांति माओ के लिए राजनीतिक जीत जैसी दिखाई दी, लेकिन जल्द ही हालात उनके नियंत्रण से बाहर होने लगे। रेड गार्ड के अभियान ने चीन के सामाजिक ढांचे और सांस्कृतिक विरासत को भारी नुकसान पहुंचाया।
आखिरकार जब कई शहरों में स्थिति अराजकता के करीब पहुंच गई तो माओ ने सेना को हस्तक्षेप करने का आदेश दिया।
इस दौर में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और चीन की सांस्कृतिक विरासत का भी भारी नुकसान हुआ।
माओ की पत्नी और उनके सहयोगियों ने बाद में ‘गैंग ऑफ फोर’ के नाम से प्रभावशाली समूह बनाया। इस समूह ने पार्टी के भीतर वामपंथी एजेंडे को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जीवन के अंतिम वर्षों में माओ ने चीन के अमेरिका, जापान और यूरोपीय देशों के साथ संबंध बेहतर करने की कोशिश की।
1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन चीन पहुंचे और उन्होंने माओत्से तुंग से मुलाकात की। यह मुलाकात चीन और अमेरिका के संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ मानी गई।
माओत्से तुंग का निधन 9 सितंबर 1976 को हुआ।
एक साधारण किसान परिवार से निकलकर पेकिंग विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में काम करने वाले माओ ने चीन की राजनीति में ऐसा प्रभाव स्थापित किया जिसने 20वीं सदी के इतिहास को गहराई से बदल दिया। उनके नेतृत्व में चीन में एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत हुई, लेकिन उनके शासन की नीतियों से जुड़ी भारी मानवीय कीमत और सांस्कृतिक विनाश आज भी इतिहास की सबसे गंभीर बहसों में शामिल हैं।