Why are men committing suicide? The psychological pressure behind the silence
अर्सला खान/नई दिल्ली
पुरुषों में Suicide का सवाल सिर्फ मानसिक मजबूती या Willing Power का सवाल नहीं है। इसके पीछे कई बार ऐसा मानसिक दबाव होता है, जिसे पुरुष लंबे समय तक किसी के साथ साझा ही नहीं करते। “मर्द बनो”, “कमजोर मत पड़ो”, “अपनी परेशानी खुद संभालो” जैसी सोच उन्हें अपनी भावनाएं और परेशानियां बताने से रोक सकती है। ऐसे में Career का pressure, आर्थिक जिम्मेदारियां, relationship problems, breakup, divorce, family expectations, loneliness और social media पर लगातार comparison जैसे दबाव अंदर ही अंदर बढ़ते जाते हैं।
World Suicide Prevention Day के मौके पर हमने Psychologist Shuchi Goel से खास बातचीत की और समझने की कोशिश की कि आखिर पुरुष अपनी परेशानियों को लेकर चुप क्यों रहते हैं, किस तरह का दबाव उन्हें अंदर से तोड़ रहा है और क्यों कई पुरुष मदद मांगने के बजाय सब कुछ अकेले सहने की कोशिश करते हैं। क्या आज के पुरुषों पर जिम्मेदारियों और expectations का दबाव पहले से ज्यादा है? क्या अपनी भावनाएं व्यक्त न कर पाना उनके mental health risk को बढ़ा रहा है? और सबसे जरूरी सवाल पुरुषों को समय रहते कैसे पहचाना जाए और उन्हें मदद तक कैसे पहुंचाया जाए?
Suicide को किसी एक वजह से नहीं जोड़ा जा सकता
मानसिक परेशानी से गुजर रहा व्यक्ति हमेशा बाहर से परेशान दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है। वह सामान्य तरीके से काम कर सकता है, दोस्तों से मिल सकता है और परिवार के साथ रह सकता है, लेकिन अंदर ही अंदर किसी बड़ी परेशानी से जूझ रहा हो सकता है। इसलिए किसी की तकलीफ को सिर्फ यह कहकर नजरअंदाज करना सही नहीं है कि “यह तो जिंदगी का हिस्सा है।”
Relationship और Social Media का बढ़ता दबाव
आज की generation में relationship को लेकर भी काफी emotional pressure देखने को मिलता है। Breakup, rejection, cheating, emotional dependency या divorce के बाद कई लोग खुद को अकेला महसूस करने लगते हैं। Social media इस pressure को और बढ़ा सकता है। लोग दूसरों की खुशहाल तस्वीरें, सफल career, घूमने-फिरने और रिश्तों से जुड़ी पोस्ट देखकर अपनी जिंदगी की तुलना उनसे करने लगते हैं।
लेकिन social media पर दिखाई देने वाली जिंदगी पूरी सच्चाई नहीं होती। वहां अक्सर जिंदगी का सिर्फ अच्छा हिस्सा दिखाई देता है। दूसरों की “perfect life” देखकर अपनी जिंदगी को failure समझना व्यक्ति के लिए नकारात्मक सोच को बढ़ा सकता है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि हर व्यक्ति की जिंदगी और उसकी परिस्थितियां अलग होती हैं।
पुरुष अपनी परेशानी क्यों नहीं बताते?
Suicide और mental health की चर्चा में पुरुषों की मानसिक स्थिति पर बात करना भी बेहद जरूरी है। समाज में पुरुषों से अक्सर कहा जाता है “मर्द बनो”, “कमजोर मत पड़ो”, “घर की जिम्मेदारी तुम्हारी है” या “अपनी परेशानी खुद संभालो।” ऐसी सोच कई पुरुषों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने से रोक सकती है।
कई पुरुष रोने, डर, anxiety या emotional pain को कमजोरी समझने लगते हैं। वे मदद मांगने के बजाय अपनी परेशानी को अंदर ही अंदर दबाते रहते हैं। धीरे-धीरे यही चुप्पी मानसिक दबाव को और बढ़ा सकती है। पुरुषों के लिए यह समझना जरूरी है कि अपनी परेशानी के बारे में बात करना कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदारी है।
क्या पुरुषों की Willing Power कम हो गई है?
यह कहना सही नहीं होगा कि पुरुषों की willing power या मानसिक मजबूती कम हो गई है। असल में आज पुरुषों पर दबाव के रूप बदल गए हैं। एक तरफ career और आर्थिक जिम्मेदारियां हैं, तो दूसरी तरफ relationship और family expectations भी हैं। बदलते सामाजिक और पारिवारिक roles के बीच कई पुरुषों को अपनी भावनाओं और परेशानियों के बारे में बात करने की आदत नहीं होती।
इसी तरह इस मुद्दे को पुरुष बनाम महिला की लड़ाई के रूप में देखना भी सही नहीं है। महिलाओं ने mental health, career और personal choices को लेकर अपनी आवाज ज्यादा मजबूती से उठाई है, जो एक सकारात्मक बदलाव है। इसका मतलब यह नहीं कि पुरुष कमजोर हो गए हैं। Mental health किसी gender की competition नहीं है। पुरुष और महिलाएं अलग-अलग तरह के pressures का सामना करते हैं और दोनों को समझ, support और जरूरत पड़ने पर professional help की आवश्यकता हो सकती है।
Peer Pressure और Success का Comparison
आज के युवाओं के सामने एक बड़ा दबाव यह भी है कि “दूसरे क्या कर रहे हैं और मैं कहां हूं?” दोस्तों की salary, lifestyle, relationship status, विदेश जाना, महंगी चीजें खरीदना या career में आगे बढ़ना—इन सबकी तुलना व्यक्ति को अपने बारे में नकारात्मक सोचने पर मजबूर कर सकती है।
पुरुषों में खास तौर पर career और financial success को लेकर comparison काफी भारी पड़ सकता है। “मैं सफल नहीं हुआ तो मैं कुछ नहीं हूं” जैसी सोच धीरे-धीरे व्यक्ति के आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकती है। यह समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति की value उसकी salary, relationship status या social media profile से तय नहीं होती।
Anxiety और Stress को नजरअंदाज न करें
लगातार बेचैनी, नींद में बदलाव, किसी काम में मन न लगना, लोगों से दूर रहना, चिड़चिड़ापन, hopelessness या उन चीजों में interest खत्म होना जिन्हें व्यक्ति पहले पसंद करता था ऐसे बदलावों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हर तनाव suicide risk का संकेत नहीं होता, लेकिन अगर परेशानी लंबे समय तक बनी रहती है और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगती है, तो mental-health professional से बात करना सही कदम हो सकता है।
मानसिक परेशानी को जितनी जल्दी पहचाना जाए और मदद ली जाए, उतना बेहतर होता है। परिवार और दोस्तों की भूमिका भी इसमें महत्वपूर्ण है। कई बार किसी व्यक्ति में आए छोटे बदलावों को समझना और उससे बात करना उसे अकेलेपन से बाहर आने में मदद कर सकता है।
समस्या से भागने के बजाय मदद लेना जरूरी
Shuchi Goel के साथ बातचीत का एक महत्वपूर्ण संदेश यह रहा कि मानसिक परेशानी से भागने के बजाय उसे समझना और जरूरत पड़ने पर support लेना जरूरी है। अपनी परेशानी किसी भरोसेमंद व्यक्ति के साथ साझा करना पहला कदम हो सकता है। अगर तनाव लगातार बना हुआ है, तो psychologist या mental-health professional से बात की जा सकती है। इसके साथ नींद, भोजन और daily routine का ध्यान रखना, कुछ समय social media से दूरी बनाना और लोगों के संपर्क में रहना भी मददगार हो सकता है।
बड़ी समस्या को एक साथ हल करने के बजाय उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर हल करने की कोशिश करनी चाहिए। शराब या किसी नशे को परेशानी से निपटने का तरीका बनाना स्थिति को और खराब कर सकता है। अगर किसी व्यक्ति में suicide के विचार दिखाई दें या वह खुद को नुकसान पहुंचाने की बात करे, तो उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहिए और तुरंत professional या emergency help लेनी चाहिए।
एक बातचीत जिंदगी बदल सकती है
Suicide prevention का मतलब केवल suicide के बारे में बात करना नहीं है। इसका मतलब उन परिस्थितियों को समझना भी है, जिनमें कोई व्यक्ति खुद को अकेला, परेशान और बेबस महसूस करने लगता है। खास तौर पर पुरुषों के लिए यह संदेश बेहद जरूरी है कि अपनी परेशानी बताना कमजोरी नहीं है।
अगर आप परेशान हैं, तो हर चीज अकेले संभालना जरूरी नहीं है। किसी दोस्त से बात करना, परिवार के सामने अपनी परेशानी रखना या psychologist से मिलने का फैसला वह पहला कदम हो सकता है, जो जिंदगी को एक नई दिशा दे।
परेशानी जिंदगी का हिस्सा हो सकती है, लेकिन उसे अकेले झेलना जरूरी नहीं है। समय पर की गई एक बातचीत, एक सही सवाल और सही समय पर मिली मदद किसी की जिंदगी बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।