ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
महरारा, एटा, उत्तर प्रदेश, इस छोटे से कस्बे में एक ऐसी कहानी है, जो हर किसी के दिल को छू जाती है। यह कहानी है चमन मियां नाम के 75 साल के बुजुर्ग की। चमन मियां का जीवन साधारण नहीं था, बल्कि वह प्यार, अपनापन और परिवार की मिसाल था। चमन मियां ने अपना पूरा जीवन शारदा सक्सेना परिवार के साथ बिताया। दस साल की उम्र से ही वह शारदा सक्सेना के घर में थे। उस समय कोई नहीं सोच सकता था कि यह बच्चा धीरे-धीरे इस परिवार का हिस्सा बन जाएगा। शारदा सक्सेना ने उसे अपने बच्चों की तरह बड़ा किया। उसने अपने घर का हर सुख-दुख चमन मियां के साथ बांटा। इस तरह चमन मियां सिर्फ एक नौकर या परिचारक नहीं रहे, बल्कि परिवार का अभिन्न हिस्सा बन गए।
जब शारदा सक्सेना का इस दुनिया से जाना हुआ, तो उनके पुत्र डॉ. विमलचंद्र सक्सेना ने भी चमन मियां को उसी सम्मान और अपनापन से रखा। डॉ. विमलचंद्र के लिए चमन मियां सिर्फ एक घर का सदस्य नहीं थे, बल्कि परिवार के बड़े सदस्य की तरह उन्हें देखा गया।
यह अपनापन और सम्मान ही वह चीज थी, जिसने चमन मियां के जीवन को पूरा किया। साल 2018 में डॉ. विमलचंद्र सक्सेना के चले जाने के बाद यह जिम्मेदारी शारदा सक्सेना के पोते, डॉ. सुभोध सक्सेना पर आई। डॉ. सुभोध ने भी अपने दादा और पिता की परंपरा को कायम रखा। उन्होंने चमन मियां को परिवार के बड़े सदस्य के रूप में सम्मान दिया। इस रिश्ते में कोई संतान-सेवा का दायित्व नहीं था, बल्कि केवल मानवता और सच्चे प्रेम की परिभाषा थी।
हाल ही में बुधवार को चमन मियां ने इस दुनिया को अलविदा कहा। वह परिवार जिसमें उन्होंने 66 साल बिताए, उनके अंतिम संस्कार का हर कर्तव्य निभाने के लिए तैयार था। लेकिन चमन मियां का धर्म मुसलमान था, इसलिए उनका अंतिम संस्कार उनके धर्म के अनुसार होना था। सक्सेना परिवार ने यह जिम्मेदारी बिना किसी हिचकिचाहट के पूरी की। आंखों में आंसू और दिल में भावनाओं के साथ, उन्होंने चमन मियां को अंतिम विदाई दी। जुहर की नमाज के बाद चमन मियां का जनाजा पढ़ा गया।
इसमें सिर्फ सक्सेना परिवार के सदस्य ही नहीं, बल्कि आसपास के अन्य समुदायों के लोग भी शामिल हुए। यह दृश्य समाज के लिए एक संदेश था कि मानवता और अपनापन धर्म, जाति और समुदाय से ऊपर है। डॉ. सुभोध सक्सेना, अमित सक्सेना और सुमित सक्सेना ने पूरी श्रद्धा और भावनाओं के साथ चमन मियां को अंतिम विदाई दी।
जनाजा के बाद सक्सेना परिवार ने चमन मियां की शवयात्रा अपने कंधों पर उठाई और कब्रिस्तान तक पहुंचाया। यह दृश्य भावनाओं से भरा था। लोग चुपचाप चल रहे थे, कुछ की आंखों में आंसू थे, कुछ के होंठ नम थे। डॉ. सुभोध सक्सेना ने बड़े बेटे की तरह पहली बार मिट्टी डाली।
फिर बाकी लोग, चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान, सबने मिलकर मिट्टी डाली। यह सिर्फ अंतिम संस्कार नहीं था, यह एक संदेश था. मानवता का संदेश। शवयात्रा में सैकड़ों हिन्दू और मुसलमान शामिल हुए। यह कोई राजनीतिक कार्यक्रम या दिखावे का हिस्सा नहीं था। यह पूरी तरह से मानवता और प्रेम का प्रदर्शन था। सक्सेना परिवार ने यह साबित कर दिया कि जब इंसानियत की बात आती है, तो धर्म या जाति की सीमाएं मायने नहीं रखतीं।
चमन मियां का जीवन और उनकी अंतिम विदाई हमें याद दिलाती है कि समाज में प्रेम, अपनापन और इंसानियत कितनी महत्वपूर्ण है। सक्सेना परिवार ने यह दिखाया कि असली शक्ति न केवल संपत्ति या पद में होती है, बल्कि मानवता, सच्चे प्यार और रिश्तों में होती है। इस कहानी से एक बड़ा संदेश निकलता है।
राजनीति चाहे समाज में डर और अलगाव फैलाए, अलग-अलग धर्मों और समुदायों के बीच दीवार खड़ी करने की कोशिश करे, लेकिन समाज में ऐसे लोग और परिवार मौजूद हैं जो मानवता को जीवित रखते हैं। ऐसे परिवार और लोग ही देश को एक सुंदर बगीचे की तरह बनाते हैं, जहां प्रेम, अपनापन और भाईचारा हमेशा खिला रहे।
66 सालों तक चमन मियां ने सक्सेना परिवार के साथ जीवन बिताया। इस परिवार ने न केवल अपने कर्तव्य को निभाया, बल्कि मानवता और भाईचारे की मिसाल पेश की। यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं है, यह पूरे समाज और देश के लिए प्रेरणा है। इस कहानी में कोई राजनीति, कोई स्वार्थ या दिखावा नहीं है।
इसमें सिर्फ इंसानियत है, अपनापन है, और वह भावना है जो हमें एक-दूसरे के करीब लाती है। जब हम चमन मियां और सक्सेना परिवार की यह कहानी पढ़ते हैं, तो महसूस होता है कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। आज के समय में, जब समाज में कट्टरता और नफरत बढ़ रही है, ऐसी कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि प्यार, अपनापन और भाईचारा कभी पुराना नहीं होता। सक्सेना परिवार ने हमें यह सिखाया कि इंसानियत की राह पर चलना सबसे बड़ा धर्म है।