ईद-उल-अज़हा पर गाइडलाइन जारी: उलेमा ने की शांति और भाईचारे की अपील

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 28-05-2026
Guidelines Issued for Eid-ul-Adha: Ulema Appeal for Peace and Brotherhood
Guidelines Issued for Eid-ul-Adha: Ulema Appeal for Peace and Brotherhood

 

मंसूरूद्दीन फरीदी/नई दिल्ली

देश के कोने-कोने में ईद-उल-अज़हा यानी बकरीद के पाक त्योहार को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में हैं। इस बार इस मुकद्दस मौके पर भारत के तमाम शीर्ष मुस्लिम उलेमा, मुफ्ती और इस्लामी बुद्धिजीवियों ने कौम के नाम एक बेहद जरूरी और संजीदा संदेश जारी किया है। 'आवाज़ दी वॉयस' के माध्यम से सामने आई इस साझी अपील में देश के प्रमुख धार्मिक नेताओं ने मुसलमानों से पुरजोर गुजारिश की है कि वे कुर्बानी के इस पावन पर्व को मनाते समय अपनी मजहबी जिम्मेदारियों के साथ-साथ सामाजिक संवेदनशीलता और देश के कानून का पूरी कड़ाई से पालन करें।

उलेमा का साफ कहना है कि इस्लाम हमें हर हाल में शांति, इंसानियत और देश के नियमों का आदर करना सिखाता है, इसलिए इबादत के इस पावन सफर में किसी भी दूसरे समुदाय के नागरिक की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए।

प्रशासन की ओर से त्योहार को लेकर समय-समय पर जो दिशा-निर्देश या गाइडलाइंस जारी की जाती हैं, उनका अक्षरशः पालन करना हर नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है। उलेमा ने स्पष्ट किया कि कुर्बानी के दौरान केवल उन्हीं जानवरों का चयन किया जाना चाहिए जिनकी देश का कानून बिना किसी संशय के इजाज़त देता है।

इसके साथ ही आज के डिजिटल युग को देखते हुए इस बात पर खास तौर पर चिंता व्यक्त की गई है कि लोग अक्सर दिखावे की वजह से या अनजाने में सोशल मीडिया पर तस्वीरें पोस्ट कर देते हैं। इस बार उलेमा ने नौजवानों से सख्त हिदायत के साथ कहा है कि वे कुर्बानी के जानवरों या ज़बह से जुड़े किसी भी प्रकार के फोटो और वीडियो फेसबुक, इंस्टाग्राम या व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म्स पर बिल्कुल भी शेयर न करें।

ऐसी तस्वीरें समाज के कुछ संवेदनशील वर्गों को आहत कर सकती हैं और इसका सीधा फायदा उठाकर कुछ शरारती तत्व आपसी भाईचारे के ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं।केरल के कालीकट में स्थित प्रसिद्ध इस्लामी संस्थान मरकज़ुस्सकाफ़तुस्सुन्निया के मुख्य परिसर से देश के मुसलमानों को संबोधित करते हुए ग्रैंड मुफ्ती ऑफ इंडिया शेख अबू बकर अहमद ने पूरे देशवासियों को ईद-उल-अज़हा की अग्रिम मुबारकबाद दी।

उन्होंने अपने संदेश में कहा कि यह पवित्र त्योहार मूल रूप से हमें आत्मोत्सर्ग, परम त्याग, आपसी मोहब्बत, अटूट भाईचारे और बिना किसी भेदभाव के इंसानियत की खिदमत करने की बड़ी सीख देता है। इतिहास के पन्नों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम द्वारा अल्लाह की राह में दी गई महान कुर्बानी पूरी इंसानियत के लिए धैर्य, अटूट निष्ठा और सच्चे ईमान की एक ऐसी रोशन मिसाल है जो कयामत तक सबको रास्ता दिखाती रहेगी। उन्होंने युवाओं को नसीहत दी कि वे जोश में आकर होश न खोएं।

 

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शेख अबू बकर अहमद ने अपने बयान में कहा कि कुर्बानी जैसे मुकद्दस फर्ज़ को अंजाम देते समय जितनी हो सके उतनी सावधानी बरती जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अक्सर देखा जाता है कि लोग उत्साह में आकर वीडियो बना लेते हैं, लेकिन इस डिजिटल दौर में यह बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।

किसी भी तरह की अफवाह पर कान न धरें और न ही ऐसी किसी बात को आगे बढ़ाएं जिससे समाज का माहौल बिगड़ने का अंदेशा हो। एक छोटी सी भी गलतफहमी असामाजिक तत्वों को माहौल को सांप्रदायिक रंग देने का बड़ा मौका मुहैया करा देती है।

उन्होंने जमीनी स्तर पर साफ-सफाई बनाए रखने की बात करते हुए कहा कि कुर्बानी के बाद निकलने वाला खून, अवशेष या अन्य अपशिष्ट पदार्थ (आलाइशें) खुले रास्तों, सड़कों या सार्वजनिक नालियों में न बहाए जाएं। इन्हें बहुत ही सलीके और इज्जत के साथ किसी खाली और उचित स्थान पर मिट्टी में दफन कर देना चाहिए।

इसके साथ ही ग्रैंड मुफ्ती ने स्थानीय प्रशासन और सरकारों से भी यह मांग की कि त्योहार के इन तीन दिनों के दौरान हर इलाके में मुकम्मल साफ-सफाई, निर्बाध बिजली आपूर्ति और स्वच्छ पानी की व्यवस्था को पुख्ता किया जाए।

इसी कड़ी में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के सुप्रसिद्ध असिस्टेंट प्रोफेसर रेहान अख्तर कासमी ने इस पूरे मामले को देश के सामाजिक और कानूनी परिप्रेक्ष्य में पेश किया। प्रोफेसर कासमी ने दोटूक शब्दों में कहा कि हिंदुस्तान के भीतर आज कहीं भी कोई मुस्लिम नागरिक गाय की कुर्बानी नहीं देता है और न ही आने वाले समय में ऐसा कभी होना चाहिए।

उन्होंने पुरअसर अंदाज में कहा कि जिन भी चीजों या जानवरों पर सरकार और अदालतों ने प्रतिबंध लगाया है, उन तमाम कानूनों और नियमों का पूरी तरह से सम्मान करते हुए ही हमें अपनी खुशियों को मनाना चाहिए। कासमी ने समाज के उस तबके को भी जवाब दिया जो अक्सर गाय के मुद्दे को लेकर मुसलमानों पर बेवजह उंगलियां उठाते हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसी बातें सिर्फ और सिर्फ अधूरी जानकारी और असल जमीनी हकीकत से वाकिफ न होने के कारण फैलाई जाती हैं। आज के समय में भारत का आम मुसलमान भी गाय को पूरी श्रद्धा और सम्मान की निगाह से देखता है। इसका सीधा और बड़ा कारण यह है कि इस देश की एक बहुत बड़ी बहुसंख्यक आबादी गाय को अपनी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का एक बेहद पावन प्रतीक मानती है।

प्रोफेसर रेहान कासमी ने आगे कहा कि मुसलमानों को अपने त्योहार की मर्यादा बनाए रखने के लिए हमेशा उन जानवरों का चुनाव करना चाहिए जिनकी अनुमति राज्य और केंद्र सरकारों की गाइडलाइंस में स्पष्ट रूप से दर्ज हो।

चूंकि कुर्बानी एक बेहद अहम और रूहानी इबादत है, इसलिए इसमें किसी भी तरह की कानूनी अड़चन या विवाद के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। कानून व्यवस्था की गरिमा और सामाजिक सौहार्द का संतुलन बनाए रखना ही इस देश की असली खूबसूरती है और हमें हर हाल में इसका मान रखना होगा।

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पुरानी दिल्ली की ऐतिहासिक फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुफ्ती मुकर्रम अहमद ने भी इस विमर्श को आगे बढ़ाते हुए कहा कि देश का मुसलमान कभी भी गाय की कुर्बानी का हिमायती नहीं रहा है। उन्होंने साफ किया कि मुसलमानों की गाय से कोई निजी दुश्मनी नहीं है और न ही किसी भी मुस्लिम को गाय के ज़बह से कोई दिली शौक या लगाव होता है।

इतिहास गवाह है कि मुसलमान हमेशा से ही अपने पड़ोसी समुदायों की धार्मिक भावनाओं और आस्थाओं का दिल से सम्मान करते आए हैं। चूंकि बहुसंख्यक समाज के लिए गाय एक पूजनीय और धार्मिक प्रतीक है, इसलिए मुसलमान भी उसकी मर्यादा का पूरा ख्याल रखते हैं।

मुफ्ती मुकर्रम ने इस बात पर जोर दिया कि इस्लाम धर्म के भीतर कुर्बानी की रस्म को पूरा करने के लिए केवल एक ही विकल्प नहीं है, बल्कि अल्लाह ने इंसानों की सहूलियत के लिए बकरा, भेड़, दुम्बा और भैंस जैसे कई दूसरे हलाल जानवरों के विकल्प दिए हैं, जिनकी कुर्बानी पर सरकार को भी कोई आपत्ति नहीं है। ऐसे में कानून के दायरे में रहकर आसानी से अपनी धार्मिक परंपरा निभाई जा सकती है।

मुफ्ती मुकर्रम अहमद ने एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ साझा करते हुए बताया कि काफी लंबे समय से हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों के बुद्धिजीवियों की तरफ से गाय को भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग उठती रही है। उन्होंने मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश का भी विशेष उल्लेख किया जिन्होंने देश में गो-वध पर पूर्ण प्रतिबंध और गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की मांग का पुरजोर समर्थन किया था।

इसके साथ ही उन्होंने देश के कुछ हिस्सों में गो-रक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा, मॉब लिंचिंग और कानून को हाथ में लेने की घटनाओं पर गहरा अफसोस जाहिर किया।

उन्होंने मोहम्मद अखलाक और पहलू खान जैसे दर्दनाक मामलों का हवाला देते हुए कहा कि खुद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार मंचों से उन शरारती तत्वों की तीखी आलोचना कर चुके हैं जो गो-रक्षा की आड़ में सरेआम गुंडागर्दी और हिंसा फैलाते हैं। उन्होंने देश की कानून व्यवस्था पर पूरा भरोसा जताते हुए कहा कि अगर सरकार इस संबंध में कोई भी नया और सख्त कानून बनाती है, तो देश का मुसलमान हमेशा की तरह उसका पूरा सम्मान करेगा।

मुंबई के जाने-माने शिया आलिम और इस्लामिक विद्वान मौलाना ज़हीर अब्बास रिज़वी ने भी मायानगरी मुंबई और महाराष्ट्र के तमाम मुसलमानों से बेहद संजीदगी से काम लेने की अपील की है। उन्होंने कहा कि ईद-उल-अज़हा का यह मौका हमारे लिए आत्ममंथन का समय है।

एक तरफ जहां हमें दूसरे समाजों की भावनाओं का ख्याल रखना है, वहीं दूसरी तरफ हमें पैगंबर मोहम्मद साहब की उस मशहूर हदीस को भी याद रखना होगा जिसमें उन्होंने साफ कहा है कि 'सफाई आधा ईमान है'।

मौलाना रिज़वी ने कहा कि कुर्बानी के पावन काम के साथ-साथ हमें अपने घरों के अंदर, अपनी छतों पर और अपने आसपास के समूचे मोहल्ले में स्वच्छता का एक मिसाल कायम करने वाला माहौल बनाना चाहिए, क्योंकि पाकीज़गी और साफ-सफाई ही हमारे दीन की असली पहचान है।

मौलाना ज़हीर अब्बास रिज़वी ने कहा कि जानवरों के लाने-ले जाने और उनकी कुर्बानी को लेकर स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी हर एक छोटी-बड़ी गाइडलाइन का पालन किया जाना चाहिए। जिन जानवरों के इस्तेमाल पर किसी भी तरह की कानूनी रोक है, उन्हें भूलकर भी कुर्बानी के लिए न खरीदा जाए।

उन्होंने कौम को नसीहत दी कि हमें अपने उम्दा व्यवहार, मीठी जुबान और अच्छे आचरण से लोगों के दिलों को जीतना चाहिए। कुर्बानी का एक गहरा रूहानी और दार्शनिकसंदेश है, इसे केवल धन-दौलत के दिखावे या शान-शौकत का जरिया नहीं बनाना चाहिए। इस इबादत के पीछे अल्लाह ताला के प्रति बेपनाह मोहब्बत, मुकम्मल समर्पण और त्याग का जज्बा छिपा होता है, इसलिए हमारी तरफ से ऐसा कोई भी कदम नहीं उठना चाहिए जिससे इस्लाम की शांतिप्रिय छवि या उसकी पवित्र शिक्षाओं पर कोई उंगली उठा सके।

इस विमर्श में अपना अहम योगदान देते हुए मुफ्ती मंजूर ज़ियाई ने अपने बयान में देश के नागरिकों से अपील की कि कुर्बानी के जानवर को खरीदते समय न केवल सरकारी नियमों का बल्कि अपनी स्थानीय रिहायशी सोसायटियों के आंतरिक नियमों का भी पूरा ध्यान रखा जाए।

आप जिस भी इलाके, कॉलोनी या सोसाइटी में रहते हैं, वहां का सामाजिक माहौल शांतिपूर्ण बना रहे और वहां रहने वाले अन्य लोगों की भावनाओं को ठेस न पहुंचे, यह हर एक सच्चे और जिम्मेदार नागरिक की बुनियादी जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा कि हमारे किसी भी काम या हमारे जानवरों की वजह से किसी भी पड़ोसी या राहगीर को जरा सी भी तकलीफ या मानसिक परेशानी नहीं होनी चाहिए। किसी खास जानवर को ही कुर्बान करने की जिद पकड़ने के बजाय मुसलमानों को उन जानवरों को प्राथमिकता देनी चाहिए जिनकी इजाज़त शरीयत और देश का कानून, दोनों एक साथ देते हैं।

मुफ्ती मंजूर ज़ियाई ने कहा कि सरकारों और स्थानीय निकायों द्वारा दी जाने वाली हिदायतों का पालन करना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है क्योंकि मुल्क के भीतर अमन-चैन, कौमी एकता, भाईचारा और कानून व्यवस्था को सुचारू रूप से बनाए रखना हर देशभक्त नागरिक का पहला फर्ज है।

कुर्बानी का असल मकसद अल्लाह की रज़ा और उसकी प्रसन्नता हासिल करना है, न कि समाज में अपनी दौलत का प्रदर्शन करना या किसी के दिल को दुखाना। उन्होंने नौजवानों को एक बहुत ही व्यावहारिक सलाह देते हुए कहा कि कुर्बानी की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद अक्सर लोग खून से सने कपड़ों या हाथ में छुरियां लेकर सड़कों, बाज़ारों और चौराहों पर निकल आते हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए।

हमें रास्ते पर चलते समय सफाई, तहज़ीब और शालीनता का पूरा मुजाहिरा करना चाहिए ताकि समाज में इस्लाम की एक बेहद खूबसूरत और अनुशासित छवि पेश हो। अपने संदेश के आखिर में उन्होंने बारगाहे इलाही में दुआ की कि अल्लाह तमाम मुसलमानों की इस इबादत और कुर्बानियों को अपनी बारगाह में कबूल फरमाए और हमारे प्यारे वतन हिंदुस्तान में मोहब्बत, अमन, शांति और अटूट भाईचारे के चमन को हमेशा हरा-भरा रखे।

इसी सिलसिले में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के वरिष्ठ सदस्य और इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया के चेयरमैन मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने ईद-उल-अज़हा के इस पावन मौके पर देशभर के मुसलमानों के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और व्यापक 12 सूत्रीय एडवाइजरी यानी दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

मौलाना फरंगी महली ने पुरअसर अंदाज में अपील की कि इस बार की बकरीद को पूरी तरह से शांतिपूर्ण, कानूनी, स्वच्छ और अनुशासित तरीके से मनाया जाना चाहिए। उन्होंने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए देशवासियों को याद दिलाया कि लखनऊ के फरंगी महल के उलेमा और मुफ्ती साहिबान ने आज से करीब एक सदी पहले, यानी साल 1920 में ही गाय के ज़बह के खिलाफ एक ऐतिहासिक फतवा जारी किया था, जिसमें गाय की कुर्बानी को पूरी तरह से नाजायज और देश के सामाजिक ताने-बाने के खिलाफ बताया गया था।

मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने अपनी 12 सूत्रीय एडवाइजरी में इस बात पर विशेष जोर दिया है कि ईद-उल-अज़हा की नमाज़ किसी भी हाल में सड़कों, चौराहों या सार्वजनिक रास्तों पर अदा न की जाए। नमाज़-ए-ईद के लिए केवल ईदगाहों और मस्जिदों के अंदरूनी परिसरों का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए ताकि आम यातायात व्यवस्था प्रभावित न हो और राहगीरों को कोई दिक्कत न आए।

इसके साथ ही उन्होंने ताकीद की कि कुर्बानी के दौरान जनस्वास्थ्य, पर्यावरण की सुरक्षा और स्वच्छता से जुड़े हर एक सरकारी नियम का पूरी निष्ठा से पालन हो। जानवरों के अपशिष्टों और आलाइशों को खुले मैदानों या रास्तों पर फेंकने के बजाय नगर निगम, नगरपालिका या स्थानीय ग्राम पंचायतों द्वारा तय की गई डंपिंग व्यवस्था के अनुसार ही उनका सही और वैज्ञानिक तरीके से निपटारा किया जाए।

कुर्बानी के इस मुकद्दस काम को सिर्फ और सिर्फ निर्धारित किए गए स्थानों या अपने निजी बंद अहातों में ही अंजाम दिया जाए ताकि किसी भी गैर-मुस्लिम भाई को देखने में या वहां से गुजरने में कोई संकोच या असुविधा न हो।

मौलाना ने अपने संदेश के अंत में कौम से यह भी अपील की कि ईद-उल-अज़हा की नमाज़ के बाद मस्जिदों और ईदगाहों में देश की सलामती, उसकी चहुंमुखी तरक्की, आर्थिक समृद्धि और आपसी खुशहाली के लिए विशेष रूप से हाथ उठाकर दुआएं मांगी जाएं। इसके साथ ही वर्तमान में चल रही भीषण गर्मी और लू (हीटवेव) के प्रकोप से आम इंसानों और बेजुबान जानवरों को जल्द से जल्द राहत मिलने तथा देश को हर प्रकार के आर्थिक संकट से निजात दिलाने के लिए भी सामूहिक प्रार्थनाओं का विशेष आयोजन किया जाए।