आवाज द वॉयस ब्यूरो /नई दिल्ली
भारत के प्रशासनिक गलियारों, डिप्लोमैटिक मिशनों, यूनिवर्सिटीज और सामाजिक कल्याण विभागों में एक बड़ा बदलाव दिख रहा है। मुस्लिम महिलाओं की एक नई पीढ़ी अपनी काबिलियत के दम पर लीडरशिप की नई परिभाषा गढ़ रही है। इन महिलाओं ने मुश्किलों का सामना किया है। पढ़ाई को अपना हथियार बनाया और समाज को बदलने का बीड़ा उठाया। ग्रामीण इलाकों और साधारण घरों से निकलकर इन महिलाओं ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।
इन्होंने रूढ़ियों को तोड़ा है। प्रशासनिक बाधाओं को पार किया है। आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नया रास्ता तैयार किया है। इनकी कहानियां सिर्फ व्यक्तिगत सफलता की नहीं हैं। यह कहानियां देश के गवर्नेंस, शिक्षा, डिप्लोमेसी और सोशल जस्टिस को बदलने की हैं।

अदीबा अनम अशफाक अहमद शेख: यवतमाल से आईएएस तक का सफर
महाराष्ट्र के यवतमाल की रहने वाली अदीबा अनम अशफाक अहमद शेख की कहानी कमाल की है। वह महाराष्ट्र की पहली मुस्लिम महिला आईएएस अधिकारी बनी हैं। अदीबा के पिता एक ऑटो रिक्शा चालक हैं। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी।
उन्हें कई बार असफलताओं का सामना करना पड़ा। समाज के तानों को भी सहना पड़ा। इसके बावजूद अदीबा ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने यूपीएससी 2024की परीक्षा में ऑल इंडिया 142वीं रैंक हासिल की। उनकी यह सफलता ग्रामीण और पिछड़े वर्ग की लड़कियों के लिए उम्मीद की एक नई किरण है। अदीबा ने साबित कर दिया कि मेहनत और शिक्षा से किस्मत को बदला जा सकता है।

डॉ. अदीला अब्दुल्ला: केरल में संवेदनशीलता और सुशासन की मिसाल
डॉ. अदीला अब्दुल्ला केरल में प्रशासनिक सुधारों का एक जाना-माना नाम हैं। वह मालाबार इलाके से आईएएस बनने वाली शुरुआती मुस्लिम महिलाओं में से एक हैं। उन्होंने केरल के सामाजिक कल्याण सिस्टम और शहरी गवर्नेंस को मजबूत करने में बड़ा योगदान दिया है।
केरल के सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्रोजेक्ट में उनका काम बेहतरीन रहा है। सामाजिक न्याय विभाग में विशेष सचिव के रूप में उन्होंने समाज के कमजोर वर्गों के लिए काम किया। उनकी लीडरशिप में सहानुभूति और जिम्मेदारी साफ दिखती है। वह इंसानी गरिमा को सबसे ऊपर रखती हैं।

डॉ. चबीना हसन: असम की विरासत को सहेजने वाली ताकत
असम में डॉ. चबीना हसन ने इतिहास और पुरातत्व के क्षेत्र में बड़ा काम किया है। वह असम के पुरातत्व निदेशालय में डिप्टी डायरेक्टर हैं। उन्होंने चराइदेव मैदाम को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने में मुख्य भूमिका निभाई।
इसके अलावा उन्होंने दिमा हसाओ इलाके में कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक खोजें भी की हैं। चबीना एक मां, शोधकर्ता और फील्ड ऑफिसर के तौर पर अपनी सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाती हैं। उन्होंने पुरातत्व विभाग को आम लोगों और संस्कृति से जोड़ने का काम किया है। वह युवाओं को इतिहास के संरक्षण के लिए प्रेरित कर रही हैं।

डॉ. सैयद सेहरिश असगर: सिविल सेवा में बदलाव की नई सोच
डॉ. सैयद सेहरिश असगर का करियर युवाओं के लिए प्रेरणा है। वह पेशे से डॉक्टर हैं। उन्होंने साल 2010में जम्मू-कश्मीर प्रशासनिक सेवा परीक्षा में टॉप किया था। इसके बाद उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा पास की और 118वीं रैंक हासिल की।
वह बडगाम की पहली महिला डिप्टी कमिश्नर बनीं। उन्होंने वहां 'साथ' नाम का एक विशेष प्रोग्राम शुरू किया। इस पहल के जरिए उन्होंने स्वयं सहायता समूहों की मदद से पांच लाख से ज्यादा ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया। उनके इस बेहतरीन काम के लिए उन्हें सिविल सेवा में उत्कृष्टता का प्रधानमंत्री पुरस्कार भी मिल चुका है।

निगहत तबस्सुम अबरू: पारिवारिक जिम्मेदारियों के बाद हासिल किया मुकाम
निगहत तबस्सुम अबरू की कहानी सिखाती है कि सपने देखने की कोई उम्र नहीं होती। शादी और बच्चों के कारण उनकी पढ़ाई में पूरे दस साल का गैप आ गया था। इसके बावजूद उन्होंने किताबों से नाता नहीं तोड़ा। उन्होंने केपीएससी की परीक्षा में तीसरा स्थान हासिल किया।
वह कर्नाटक की शुरुआती मुस्लिम महिला आईएएस अधिकारियों में शामिल हैं। उन्होंने महिला कल्याण, स्वच्छता, स्वास्थ्य और ई-गवर्नेंस के क्षेत्र में शानदार काम किया। बेंगलुरु वन और खजाने II जैसे प्रोजेक्ट्स के जरिए उन्होंने साबित किया कि नई तकनीक से आम जनता की जिंदगी को कैसे आसान बनाया जा सकता है।

नग्मा मोहम्मद मल्लिक: दुनिया के मंच पर भारत की बुलंद आवाज
नग्मा मोहम्मद मल्लिक ने भारतीय विदेश सेवा में एक नया इतिहास रचा है। वह देश की पहली मुस्लिम महिला आईएफएस अधिकारी हैं। उन्होंने अपने लंबे राजनयिक करियर में भारत का मान बढ़ाया है। वर्तमान में वह जापान और मार्शल आइलैंड्स में भारत की राजदूत के रूप में सेवाएं दे रही हैं।
उन्होंने कई देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीति, तकनीक और आर्थिक सहयोग को मजबूत किया है। वह दुनिया के सामने लोकतंत्र, बातचीत और अहिंसा के भारतीय मूल्यों को बड़ी शालीनता से रखती हैं।
नाहिदा जम जम: जमीन से जुड़ी एक निडर प्रशासक
कर्नाटक की नाहिदा जम जम को लोग उनकी निडरता और सीधे जुड़ाव के लिए जानते हैं। वह अपने भाषणों और जमीनी काम के जरिए हमेशा महिला सशक्तिकरण की बात करती हैं। वह शिक्षा और वैचारिक आजादी की बड़ी समर्थक हैं।
कोरोना महामारी के मुश्किल दौर में उन्होंने गर्भवती होने के बावजूद फील्ड में रहकर काम किया। उनके इस जज्बे ने आम जनता का दिल जीत लिया। वह छात्रों, महिलाओं और समाज के पिछड़े तबकों के बीच जाकर रूढ़िवादी सोच को चुनौती देती हैं। वह लोगों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करती हैं।
सईदा सैय्यदैन हमीद: मानवाधिकार और शांति की मजबूत पैरोकार
सईदा सैय्यदैन हमीद भारत में महिला अधिकारों और सामाजिक न्याय का एक बड़ा चेहरा हैं। वह एक मशहूर लेखिका और शिक्षाविद् हैं। वह योजना आयोग और राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य भी रह चुकी हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन मानवाधिकारों की रक्षा और सामाजिक सद्भाव के लिए समर्पित कर दिया।

उन्होंने 'मुस्लिम वीमेन्स फोरम' और 'विमेंस इनिशिएटिव फॉर पीस इन साउथ एशिया' की स्थापना की। उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच शांति बहाली के लिए लगातार प्रयास किए। वह दिखाती हैं कि सार्वजनिक जीवन में साहस और करुणा दोनों जरूरी हैं।
प्रोफेसर शबीना निशात उमर: शिक्षा और डिजिटल साक्षरता की नई रोशनी
प्रोफेसर शबीना निशात उमर पश्चिम बंगाल में अकादमिक लीडरशिप का एक बड़ा नाम हैं। शिक्षा और प्रशासन के क्षेत्र में उनका 25साल से ज्यादा का अनुभव है। उन्होंने कई शिक्षण संस्थानों की सूरत बदली है। वह समावेशी शिक्षा, डिजिटल साक्षरता और जेंडर अवेयरनेस की वकालत करती हैं।
एक शिक्षिका और एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में वह युवाओं को लगातार गाइड कर रही हैं। उनका मानना है कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का जरिया नहीं है। शिक्षा समाज को बदलने और आत्मनिर्भर बनने का सबसे बड़ा माध्यम है।
ज़ैनब सैयद: दृढ़ संकल्प से हासिल की बड़ी कामयाबी
ज़ैनब सैयद की कहानी कड़ी मेहनत और खुद पर भरोसे की मिसाल है। सिविल सेवा परीक्षा में लगातार असफलताओं के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी जिद और लगन के दम पर उन्होंने यूपीएससी में ऑल इंडिया 107वीं रैंक हासिल की।
वर्तमान में वह ट्राइफेड में कार्यरत हैं। वहां वह पूर्वी भारत के आदिवासी कारीगरों और स्वयं सहायता समूहों की आजीविका को मजबूत करने का काम कर रही हैं। वह उनके उत्पादों को बड़ा बाजार दिलाने में जुटी हैं। ज़ैनब की कहानी बताती है कि अगर इरादे मजबूत हों तो हर असफलता को कामयाबी में बदला जा सकता है।

आधुनिक भारत की एक नई तस्वीर
यह सभी महिलाएं आधुनिक भारत के बदलते स्वरूप की गवाह हैं। इनका कार्यक्षेत्र भले ही अलग हो, कोई प्रशासन में है, कोई डिप्लोमेसी में, तो कोई शिक्षा और समाज सेवा में सक्रिय है। लेकिन इन सबका मकसद एक ही है। यह सभी शिक्षा और सेवा के जरिए समाज को मजबूत करना चाहती हैं। इन्होंने समाज की बनाई दीवारों को तोड़ा है। अपने लिए खुद जगह बनाई है। यह महिलाएं न केवल व्यवस्था को सुधार रही हैं, बल्कि देश में महिला लीडरशिप की एक नई और मजबूत तस्वीर भी पेश कर रही हैं।