भारत की सांस्कृतिक विरासत सदियों से विविधताओं, भाषाओं, धर्मों और लोक परंपराओं के अद्भुत संगम के रूप में दुनिया के सामने प्रस्तुत होती रही है। इस विरासत को जीवित रखने में देश के विभिन्न समुदायों का अमूल्य योगदान रहा है। इसी साझा सांस्कृतिक परंपरा का गौरवपूर्ण उदाहरण उस समय देखने को मिला जब भारत की राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित भव्य समारोह में तीन प्रतिष्ठित मुस्लिम विभूतियों — Meer Haji Kasam, Prof. Shafi Shauq और Gaffaruddin Mewati Jogi — को पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया। यह सम्मान केवल तीन व्यक्तियों की उपलब्धियों का उत्सव नहीं था, बल्कि यह भारत की समावेशी संस्कृति, साझा विरासत और मुस्लिम समाज के रचनात्मक योगदान का राष्ट्रीय सम्मान भी था।
गुजरात, कश्मीर और राजस्थान जैसे तीन अलग-अलग सांस्कृतिक क्षेत्रों से आने वाले इन तीनों मुस्लिम कलाकारों और विद्वानों ने अपने जीवन को भारतीय लोककला, साहित्य, भाषा और मौखिक परंपराओं के संरक्षण के लिए समर्पित किया। इनकी साधना यह प्रमाणित करती है कि भारतीय मुसलमान केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि भारत की जीवित सांस्कृतिक आत्मा के महत्वपूर्ण संवाहक भी हैं।
गुजरात के जूनागढ़ से आने वाले मीर हाजी कासम, जिन्हें पूरा गुजरात “हाजी रामक्डू” के नाम से जानता है, भारतीय लोक संगीत की दुनिया का अत्यंत प्रतिष्ठित नाम हैं। 27 जनवरी 1951 को जन्मे कासम ने मात्र दस वर्ष की आयु में संगीत की साधना प्रारंभ कर दी थी। औपचारिक शिक्षा न होने के बावजूद उन्होंने अपनी जन्मजात प्रतिभा, कठोर अभ्यास और लोकधुनों के प्रति समर्पण के बल पर वह स्थान प्राप्त किया जिसे हासिल करना किसी बड़े संस्थागत प्रशिक्षण के बिना लगभग असंभव माना जाता है।
उनकी ढोलक वादन शैली इतनी विशिष्ट और आत्मीय मानी जाती है कि लोग कहते हैं कि वे अपने वाद्य यंत्र के साथ एकाकार हो जाते थे। यही कारण है कि उन्हें “रामक्डू” जैसा लोकप्रिय और प्रेमपूर्ण नाम मिला। छह दशक से अधिक लंबे संगीत जीवन में उन्होंने गुजराती लोक संगीत को केवल मंचों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जनमानस की धड़कन बनाए रखा।

मीर हाजी कासम ने गुजरात के ग्रामीण लोकगीतों और पारंपरिक संगीत को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान और अनेक देशों में प्रदर्शन कर भारतीय लोक संगीत की वैश्विक पहचान बनाई। हजारों सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी प्रस्तुतियों ने प्रवासी भारतीयों को अपनी मिट्टी और संस्कृति से जोड़े रखा।
उन्होंने गुजराती फिल्मों के कलाकारों, रेडियो मंचों और अनेक लोक कलाकारों के साथ कार्य किया। उनकी कला ने पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संवाद का पुल तैयार किया। उन्होंने केवल प्रदर्शन नहीं किए, बल्कि नई पीढ़ी के कलाकारों को प्रशिक्षण देकर लोक संगीत की मौखिक परंपरा को संस्थागत स्वरूप प्रदान किया। आज उनके अनेक शिष्य पेशेवर लोक कलाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
मीर हाजी कासम का जीवन केवल कला तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने गौशालाओं और सामाजिक सेवा के लिए 35,000 से अधिक धर्मार्थ कार्यक्रम आयोजित किए। जूनागढ़ और आसपास के क्षेत्रों में गरीब परिवारों की सहायता, विवाह सहयोग और समाजहित में संगीत कार्यक्रमों का संचालन उनके मानवीय व्यक्तित्व को दर्शाता है। सत्तर वर्ष की आयु के बाद भी वे बच्चों और युवा कलाकारों को निःशुल्क लोक संगीत सिखा रहे हैं।
उन्हें गुजरात गौरव पुरस्कार, गुजरात राज्य संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, गुजरात लोक कला राष्ट्रीय पुरस्कार, मुख्यमंत्री सम्मान पत्र और अनेक सांस्कृतिक सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। पद्मश्री सम्मान ने उनके दशकों लंबे योगदान को राष्ट्रीय पहचान प्रदान की।
इसी प्रकार कश्मीर घाटी के शोपियां जिले के कापरिन गांव में जन्मे प्रोफेसर शफी शौक भारतीय साहित्य और अकादमिक जगत की अत्यंत महत्वपूर्ण मुस्लिम हस्तियों में गिने जाते हैं। 18 मार्च 1950 को जन्मे प्रो. शौक ने शिक्षा और साहित्य दोनों क्षेत्रों में अद्वितीय योगदान दिया। उन्होंने कश्मीर विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अंग्रेजी साहित्य में एमए, एमफिल और पीएचडी की उपाधियां प्राप्त कीं।

उन्होंने 33 वर्षों तक विश्वविद्यालय में अध्यापन किया और विभागाध्यक्ष, डीन फैकल्टी ऑफ आर्ट्स तथा डीन फैकल्टी ऑफ ओरिएंटल लर्निंग जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। उनकी विद्वता केवल विश्वविद्यालय की सीमाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने भारतीय साहित्य, भाषा और अनुवाद की दुनिया में एक स्थायी पहचान बनाई।
प्रो. शफी शौक ने कश्मीरी, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी — इन चार भाषाओं में 106 से अधिक पुस्तकों का लेखन, संपादन और अनुवाद किया। यह उपलब्धि भारतीय साहित्यिक इतिहास में अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है। उन्होंने कश्मीरी साहित्य को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई।
उनकी महत्वपूर्ण कृतियों में “केशुर लुघाट”, “ज़बान ति अदब”, “कैश्री अदाबुक तवारिख”, “केशुर व्याकरण” और “याद आसमानन हिंज” विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उन्होंने भारतीय साहित्य की अनेक महान कृतियों का अंग्रेजी और हिंदी में अनुवाद कर भाषाई दूरी को समाप्त करने का कार्य किया।
प्रो. शौक भारतीय साहित्य के विश्वकोश, मध्यकालीन भारतीय साहित्य और “ऑक्सफोर्ड कंपेनियन टू इंडियन थिएटर” जैसी राष्ट्रीय परियोजनाओं से भी जुड़े रहे। उन्होंने टीवी धारावाहिकों और फिल्मों के लिए पटकथाएं लिखीं और भारतीय सांस्कृतिक विमर्श को लोकप्रिय माध्यमों तक पहुंचाया।
साहित्यिक प्रतिनिधिमंडलों के सदस्य के रूप में उन्होंने चीन, जर्मनी, लंदन और ब्राजील सहित कई देशों की यात्राएं कीं। उनके कार्यों ने कश्मीरी भाषा और साहित्य को वैश्विक पहचान दिलाई। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, अनुवाद पुरस्कार, जम्मू-कश्मीर कला संस्कृति एवं भाषा अकादमी सम्मान और सीआईआईएल मैसूर के भाषा सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।
राजस्थान के डीग जिले के बछगांव गांव से आने वाले गफरुद्दीन मेवाती जोगी भारतीय लोक परंपराओं के ऐसे साधक हैं जिन्होंने सदियों पुरानी मौखिक विरासत को जीवित रखने का ऐतिहासिक कार्य किया है। 26 सितंबर 1962 को जन्मे गफरुद्दीन मेवाती जोगी समुदाय से आते हैं और बचपन से ही अपने दादा उस्ताद से मौखिक परंपराओं, गीत-प्रवचन और लोकगायन की शिक्षा प्राप्त करते रहे।
उन्होंने लोक रामायण, महाभारत, हर कथा और भगवान श्रीकृष्ण लीला से जुड़ी “अली बक्स परंपरा” जैसी दुर्लभ मौखिक परंपराओं को संरक्षित किया। लगभग 2500 वर्षों पुरानी इन कथात्मक परंपराओं को उन्होंने गांवों की चौपालों से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया।

गफरुद्दीन ने वर्षों तक दान-दक्षिणा और लोक समर्थन के आधार पर अपनी कला साधना जारी रखी। उन्होंने भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र और अनेक प्रतिष्ठित संस्थानों के मंचों पर प्रदर्शन किए।
उन्होंने वर्ष 2007 में जोगरा मेवात सोसाइटी लोक कला संस्थान की स्थापना की, जो राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और अन्य क्षेत्रों में लोक कलाओं के संरक्षण के लिए सक्रिय है। उनकी साधना केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने लोक और वैदिक परंपराओं पर अकादमिक शोध को भी नई दिशा दी।
उन्होंने अपने पुत्र शाहिद खान मेवाती जोगी, पोते दानिश जोगी और अनेक शिष्यों को प्रशिक्षित कर लोक परंपराओं को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाया। उनके योगदान के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, राजस्थान राज्य सम्मान, गुर्जर लोक कला सम्मान, सुर सम्मान और अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।
राष्ट्रपति भवन में इन तीनों मुस्लिम विभूतियों को पद्मश्री से सम्मानित किया जाना भारतीय लोकतंत्र और सांस्कृतिक समावेशिता का अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश है। गुजरात के लोक संगीत से लेकर कश्मीर के साहित्य और राजस्थान की मौखिक परंपराओं तक, इन तीनों हस्तियों ने यह सिद्ध किया कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध करने में मुस्लिम समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक रही है।
यह सम्मान केवल तीन व्यक्तियों को दिया गया पुरस्कार नहीं, बल्कि उन लाखों कलाकारों, साहित्यकारों और लोक परंपरा के संरक्षकों को समर्पित सम्मान है जो बिना किसी प्रचार के अपनी कला के माध्यम से भारत की आत्मा को जीवित रखे हुए हैं। राष्ट्रपति Droupadi Murmu द्वारा इन तीनों मुस्लिम विभूतियों को पद्मश्री प्रदान किया जाना भारतीय गणराज्य की उस महान भावना का प्रतीक है जिसमें प्रतिभा, सेवा, संस्कृति और समर्पण को धर्म से ऊपर उठकर सम्मान दिया जाता है।