कौन थीं हजरत हाजरा, जिनसे जुड़ी है हज की रस्में

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 29-05-2026
Who Was Hazrat Hajar, With Whom the Rituals of Hajj Are Associated?
Who Was Hazrat Hajar, With Whom the Rituals of Hajj Are Associated?

 

ईमान सकीना

हर साल जब दुनिया भर के मुसलमान ईद उल अजहा मनाते हैं और लाखों लोग हज के लिए मक्का पहुंचते हैं, तब एक ऐसी शख्सियत की कहानी फिर से जिंदा हो उठती है, जिसे अक्सर इतिहास में कम याद किया जाता है। यह कहानी है हजरत हाजरा अलैहिस्सलाम की। एक मां की। एक ऐसी औरत की जिसने अकेलेपन, प्यास और डर के बीच भरोसे का ऐसा उदाहरण पेश किया कि उसकी याद आज भी हज के हर अहम अमल में शामिल है।

हज की रस्मों को देखने वाले ज्यादातर लोग हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम की कुर्बानी की बात करते हैं। लेकिन बहुत कम लोग इस बात पर गौर करते हैं कि इस पूरी कहानी के पीछे एक मां की खामोश कुर्बानी भी थी। यही वजह है कि इस्लामी इतिहास में हजरत हाजरा को कई लोग “हज की औरत” कहते हैं।हज का सफर सिर्फ इबादत नहीं है। यह सब्र, भरोसे और कुर्बानी की याद भी है। और इन तीनों का सबसे मजबूत चेहरा हजरत हाजरा की जिंदगी में दिखाई देता है।

कहानी उस वक्त शुरू होती है जब अल्लाह के हुक्म पर हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपनी पत्नी हाजरा और छोटे बेटे हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम को मक्का की सूनी और बंजर वादी में छोड़ने पहुंचे। उस दौर का मक्का आज की तरह आबाद नहीं था। वहां न पानी था। न पेड़ थे। न कोई बस्ती। चारों तरफ सिर्फ रेत और खामोशी थी।

एक मां के लिए यह पल कितना मुश्किल रहा होगा, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं। जब हजरत इब्राहीम लौटने लगे तो हाजरा ने उनसे पूछा, “क्या अल्लाह ने आपको ऐसा करने का हुक्म दिया है?” जब जवाब “हां” में मिला तो उन्होंने जो कहा, वह आज भी ईमान और भरोसे की मिसाल माना जाता है। उन्होंने कहा, “अगर यह अल्लाह का हुक्म है, तो वह हमें कभी अकेला नहीं छोड़ेगा।”
 

यहीं से शुरू होती है उस औरत की कहानी, जिसकी दौड़ आज हज का अहम हिस्सा है।कुछ वक्त बाद जब छोटे इस्माईल को प्यास लगी तो हालात और मुश्किल हो गए। रेगिस्तान में पानी का कोई निशान नहीं था। बच्चे की प्यास और रोने की आवाज एक मां के दिल को बेचैन कर रही थी। ऐसे में हाजरा ने हार नहीं मानी। वह पानी की तलाश में सफा पहाड़ी की तरफ दौड़ीं। वहां कुछ नहीं मिला। फिर मरवा पहाड़ी की तरफ गईं। दूर तक नजर दौड़ाई। लेकिन कहीं राहत नजर नहीं आई।

उन्होंने यह सफर एक या दो बार नहीं, बल्कि सात बार तय किया। यह सिर्फ एक दौड़ नहीं थी। यह उम्मीद की तलाश थी। यह एक मां का संघर्ष था। यह भरोसे और सब्र की मिसाल थी।आज भी हज के दौरान दुनिया भर से आने वाले लाखों जायरीन सफा और मरवा के बीच सात चक्कर लगाते हैं। इस रस्म को सई कहा जाता है। यह अमल किसी बादशाह, योद्धा या ताकतवर शख्स की याद में नहीं है। यह एक मां की कोशिश, उसके सब्र और उसके ईमान की याद में है।

जब हाजरा की कोशिश जारी थी, तभी अल्लाह की रहमत सामने आई। छोटे इस्माईल के पैरों के पास जमीन से पानी निकलना शुरू हुआ। यही पानी आगे चलकर आब ए जमजम बना। वही जमजम, जिसका पानी आज भी दुनिया भर के मुसलमान बरकत और शिफा मानकर पीते हैं।

इस घटना ने सिर्फ एक प्यासे बच्चे की जान नहीं बचाई। इसने मक्का की सूनी वादी को जिंदगी दी। धीरे धीरे लोग वहां बसने लगे। कारोबार शुरू हुआ। और यही जगह बाद में इस्लाम की सबसे अहम धरती बन गई।

ईद उल अजहा की कहानी को अक्सर सिर्फ हजरत इब्राहीम की कुर्बानी से जोड़कर देखा जाता है। यह सच भी है कि बेटे की कुर्बानी देने की तैयारी इंसानी इतिहास के सबसे बड़े इम्तिहानों में शामिल है। लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है। वह है हजरत हाजरा का सब्र।

उन्होंने पहले ही अपनी जिंदगी में बहुत कुछ कुर्बान कर दिया था। अपना आराम छोड़ा। सुरक्षित जिंदगी छोड़ी। अकेलेपन को सहा। बच्चे की प्यास देखी। फिर भी शिकायत नहीं की। यही वजह है कि ईद उल अजहा का असली पैगाम सिर्फ जानवर की कुर्बानी नहीं, बल्कि भरोसा, सब्र और अल्लाह पर यकीन भी है।

आज के दौर में जब महिलाओं की रूहानी भूमिका को कई बार कम करके देखा जाता है, तब हजरत हाजरा की कहानी एक मजबूत जवाब देती है। इस्लामी इतिहास में उनकी जगह सिर्फ एक मां या पत्नी की नहीं, बल्कि एक ऐसी शख्सियत की है जिनकी याद को इबादत का हिस्सा बना दिया गया।

उनकी कहानी बताती है कि ईमान सिर्फ बड़े भाषणों या नेतृत्व में नहीं होता। कभी कभी ईमान एक मां की बेचैनी में होता है। कभी बच्चे के लिए रेगिस्तान में दौड़ने में होता है। कभी ऐसे रास्ते पर भरोसा करने में होता है, जहां आगे कुछ दिखाई नहीं देता।

यही वजह है कि हर साल जब हज शुरू होता है और दुनिया भर से लोग मक्का पहुंचते हैं, तब हजरत हाजरा की कहानी फिर से जिंदा हो जाती है। उनके कदम इबादत बन जाते हैं। उनकी कोशिश रस्म बन जाती है। उनका सब्र इतिहास बन जाता है।

ईद उल अजहा और हज की यह छिपी हुई कहानी सिर्फ मजहबी नहीं, इंसानी भी है। यह हमें याद दिलाती है कि बड़ी कुर्बानियों के पीछे अक्सर खामोश संघर्ष होते हैं। और कई बार इतिहास उन लोगों को कम याद करता है, जिन्होंने सबसे ज्यादा सहा होता है।

हजरत हाजरा की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि मुश्किल वक्त में उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। रास्ता भले नजर न आए, लेकिन भरोसा इंसान को आगे बढ़ाता है। शायद इसी वजह से सदियों बाद भी मक्का की वादियों में एक मां की दौड़ गूंजती है और हर मुसलमान के दिल में उसका एहतराम जिंदा रहता है।