मलिक असगर हाशमी
देश के विकास में हर वर्ग की हिस्सेदारी बहुत जरूरी है। लेकिन कई बार आर्थिक तंगी के कारण कुछ समुदायों के बच्चे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं। ऐसे बच्चों के पास न तो कोई बड़ी डिग्री होती है और न ही रोजगार के लिए जरूरी कोई खास हुनर। खासकर अल्पसंख्यक समुदायों के गरीब परिवारों में यह समस्या काफी ज्यादा देखी गई है। इसी जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने एक बेहद खास पहल की शुरुआत की है।
इस पहल का नाम है प्रधानमंत्री’नई मंजिल’योजना। यह योजना उन युवाओं के लिए उम्मीद की एक नई किरण बनकर आई है जो किसी वजह से स्कूल नहीं जा पाए या जिन्होंने बीच में ही स्कूल छोड़ दिया था।
अगर देश की आबादी के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति काफी स्पष्ट हो जाती है। वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक भारत की कुल आबादी लगभग 102.8 करोड़ थी। इसमें अल्पसंख्यक समुदायों की आबादी करीब 20 प्रतिशत है।
इस अल्पसंख्यक आबादी में सबसे ज्यादा संख्या मुस्लिम समुदाय की है जो लगभग 13.4 प्रतिशत है। इसके बाद ईसाई 2.3 प्रतिशत, सिख 1.9 प्रतिशत, बौद्ध 0.8 प्रतिशत, जैन 0.4 प्रतिशत और पारसी समुदाय की आबादी सबसे कम है।
इस पूरी आबादी में एक चिंताजनक बात यह सामने आई कि अल्पसंख्यक छात्रों के स्कूल छोड़ने की दर काफी अधिक है। प्राथमिक स्तर पर करीब 2 प्रतिशत और माध्यमिक स्तर पर लगभग 3 प्रतिशत अल्पसंख्यक बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा किए गए एक सर्वे के अनुसार प्राथमिक स्तर पर पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों में मुस्लिम समुदाय के बच्चों का अनुपात सबसे ज्यादा है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में भी यह बात साफ कही गई थी कि प्राथमिक शिक्षा पूरी न कर पाने की वजह से मुस्लिम समाज में गरीबी और हुनर की कमी सबसे ज्यादा दिखाई देती है। इसी कमी को दूर करने के लिए नई मंजिल योजना को तैयार किया गया है।
यह योजना मुख्य रूप से अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं को औपचारिक शिक्षा और बाजार की मांग के अनुसार कौशल प्रशिक्षण प्रदान करती है। इसका सीधा मकसद युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें रोजगार के बेहतर अवसर देना है। इस योजना के तहत सरकार द्वारा आसान शर्तों पर वित्तीय सहायता भी दी जाती है ताकि युवा अपना खुद का कोई काम या व्यवसाय शुरू कर सकें।
योजना के मुख्य उद्देश्यों को कुछ इस तरह समझा जा सकता है:
इस योजना का लाभ उठाने के लिए सरकार ने कुछ पात्रता शर्तें तय की हैं। यह कार्यक्रम देश के सभी क्षेत्रों में लागू है। लाभ लेने के लिए आवेदक का केंद्रीय रूप से अधिसूचित छह अल्पसंख्यक समुदायों (मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी) से होना जरूरी है।

इसके अलावा जिन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में वहां की सरकारों द्वारा अन्य अल्पसंख्यक समुदाय अधिसूचित किए गए हैं, वे भी इसके पात्र होंगे। हालांकि ऐसे स्थानीय समुदायों के लिए कुल सीटों में से अधिकतम 5 प्रतिशत की सीमा तय की गई है।
आवेदक की उम्र 17 से 35 वर्ष के बीच होनी चाहिए। यह योजना ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के गरीबी रेखा से नीचे (BPL) जीवन यापन करने वाले परिवारों के लिए है। अगर किसी गैर-अल्पसंख्यक बहुल जिले या शहर में भी अल्पसंख्यक आबादी रहती है, तो वहां के युवा भी इस योजना का लाभ ले सकते हैं।
शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो आठवीं कक्षा के कोर्स के लिए आवेदक के पास पांचवीं पास का सर्टिफिकेट होना चाहिए या फिर उसे अपनी क्षमता का एक स्व-घोषणा पत्र देना होगा। ठीक इसी तरह दसवीं कक्षा के कोर्स के लिए आठवीं पास का सर्टिफिकेट या स्व-घोषणा पत्र जरूरी है। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए योजना में 30 प्रतिशत सीटें उनके लिए आरक्षित रखी गई हैं। इसके अलावा 5 प्रतिशत सीटें विकलांग अल्पसंख्यक युवाओं के लिए तय की गई हैं।
यह एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है जिसे पूरी तरह केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित किया जाता है। अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा चुनी गई संस्थाएं इसे जमीन पर लागू करती हैं। परियोजना की 100 प्रतिशत लागत सरकार खुद उठाती है।
इस बजट का उपयोग युवाओं को इकट्ठा करने, उनकी काउंसिलिंग करने, ओपन स्कूल की फीस भरने, शिक्षकों के वेतन, कौशल प्रशिक्षण के लिए जरूरी सामान और बुनियादी ढांचे पर किया जाता है। इसके अलावा युवाओं को नौकरी दिलाने और उसके बाद एक साल तक उनकी स्थिति पर नजर रखने के लिए भी इसी फंड का इस्तेमाल होता है।
सरकार इस योजना के तहत फंड को तीन अलग-अलग किश्तों में जारी करती है। पहली किश्त योजना की मंजूरी और संस्था के साथ समझौता होने पर मिलती है। दूसरी किश्त तब दी जाती है जब पहली किश्त का 70 प्रतिशत हिस्सा सही तरीके से खर्च हो जाता है और कम से कम 70 प्रतिशत छात्र अपनी ट्रेनिंग जारी रखते हैं।
तीसरी और आखिरी किश्त पूरी परियोजना के खत्म होने पर रिपोर्ट जमा करने के बाद दी जाती है। इस पूरी प्रक्रिया को पूरा होने में लगभग दो साल से ज्यादा का समय लगता है।योजना में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सरकार ने एक ऑनलाइन आवेदन प्रणाली भी बनाई है।
युवा खुद या कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) के माध्यम से इसके पोर्टल पर जाकर अपना पंजीकरण करा सकते हैं। पूरी व्यवस्था पर नजर रखने के लिए सरकार के पास निरीक्षण के विशेष अधिकार हैं और स्वतंत्र एजेंसियों के जरिए भी इसकी निगरानी की जाती है।
अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की पूर्व मंत्री स्मृति जूबिन ईरानी ने लोकसभा में एक लिखित जवाब में बताया था कि इस योजना को विश्व बैंक के सहयोग से शुरू किया गया था। सरकार ने एक लाख युवाओं को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा था। इसमें से 98,712 युवाओं को सफलतापूर्वक ट्रेनिंग दी जा चुकी है और इस पर अब तक 456.19 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
यह योजना उन सभी माता-पिता के लिए एक बहुत बड़ा अवसर है जो पैसों की कमी के कारण अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहे थे। इसके जरिए बच्चे न सिर्फ अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी कर सकते हैं बल्कि एक अच्छा हुनर सीखकर अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं।