Padma Shri awardee Kazi Masoom Akhtar: A teacher, social reformer, and a fearless voice for change.
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
भारत में ऐसे शिक्षकों की संख्या बहुत कम है, जिन्होंने शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रखकर उसे सामाजिक बदलाव का माध्यम बनाया हो। पद्म श्री पुरस्कार विजेता काज़ी मसूम अख्तर ऐसे ही एक शिक्षाविद, लेखक और समाज सुधारक हैं, जिन्होंने अपने विचारों और कार्यों से कई स्थापित मान्यताओं को चुनौती दी।
काज़ी मसूम अख्तर का जीवन संघर्ष, साहस और सुधार की सोच का उदाहरण है। उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि समाज को जागरूक बनाना और लोगों को सही-गलत में अंतर समझने की क्षमता देना है।
वर्ष 2020 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया। यह सम्मान उन्हें साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए दिया गया। हालांकि, यह सम्मान मिलने से पहले उनका जीवन लंबे संघर्षों, विरोधों और चुनौतियों से भरा रहा।
बचपन से ही सवाल पूछने की आदत
काज़ी मसूम अख्तर जब हाई स्कूल के छात्र थे, तभी उन्हें महसूस हुआ कि वह किसी भी परंपरा या नियम को केवल इसलिए स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि वह लंबे समय से चला आ रहा है। उन्होंने उन प्रथाओं और मान्यताओं पर सवाल उठाना शुरू किया, जिन्हें वह धर्म की मूल भावना का हिस्सा नहीं मानते थे।
यही सोच उन्हें इस्लाम को गहराई से समझने की यात्रा पर ले गई। धीरे-धीरे उन्होंने खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में स्थापित किया, जो समाज में सुधार और जागरूकता लाने के लिए काम करना चाहता था। हालांकि, इस रास्ते पर उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। कई बार उनकी जान को खतरा भी पैदा हुआ, लेकिन उन्होंने अपने विचारों और उद्देश्यों से समझौता नहीं किया।
शिक्षा को बनाया सामाजिक बदलाव का हथियार
काज़ी मसूम अख्तर का मानना है कि शिक्षक समाज में सबसे प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है। उनका कहना है कि शिक्षक के पास सम्मान, मंच और लोगों को दिशा देने की क्षमता होती है, इसलिए उसे समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने कहा था: “हम शिक्षक समाज में बहुत सम्मानित होते हैं। हमारे पास बोलने और मार्गदर्शन करने का मंच होता है। इसलिए हमें समाज में कम से कम एक सुधार लाने की कोशिश करनी चाहिए।”
करीब 21 वर्ष पहले उन्होंने दक्षिण 24 परगना के लक्ष्मीकांतपुर के एक दूरदराज गांव में शिक्षक के रूप में अपना करियर शुरू किया था। वहां उन्होंने महिलाओं की मदद से पुरुषों में शराब सेवन के खिलाफ अभियान चलाया। उनका कहना था कि शराब की वजह से कई परिवार आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से जूझ रहे थे। पुरुषों की शराब की आदत का असर परिवार की महिलाओं और बच्चों पर पड़ रहा था। इस अभियान को सफलता मिली और कई परिवारों की स्थिति में सुधार आया।
मदरसा शिक्षा में आधुनिक सोच के समर्थक
काज़ी मसूम अख्तर लंबे समय से मदरसा शिक्षा में सुधार की वकालत करते रहे हैं। उनका मानना है कि धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान, तकनीक, तार्किक सोच, भारतीय संस्कृति और संवैधानिक मूल्यों की जानकारी भी छात्रों को मिलनी चाहिए।उनका कहना है कि विद्यार्थियों को केवल धार्मिक ज्ञान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें देश और समाज की वास्तविकताओं को भी समझना चाहिए। उन्होंने अपने स्कूल में स्वामी विवेकानंद जयंती और रवींद्र जयंती जैसे कार्यक्रम शुरू किए। इसके अलावा उन्होंने सुबह की प्रार्थना सभा में छात्रों से राष्ट्रगान गवाना शुरू किया।
उन्होंने कहा: “एक बंगाली मुस्लिम होने के नाते मेरा मानना है कि मदरसे के छात्रों को बंगाली संस्कृति की पर्याप्त जानकारी होनी चाहिए और देश के प्रति सम्मान रखना चाहिए। एक शिक्षक के रूप में मेरा कर्तव्य है कि मैं उन्हें सही रास्ता दिखाऊं।”
राष्ट्रगान विवाद और हमला
वर्ष 2015 में काज़ी मसूम अख्तर तब राष्ट्रीय चर्चा में आए, जब उन्होंने दक्षिण कोलकाता के एक मदरसे में गणतंत्र दिवस के अवसर पर छात्रों से राष्ट्रगान गवाया। उनके इस कदम का कुछ मौलानाओं और समूहों ने विरोध किया। इसके बाद उन पर हमला किया गया। हमलावरों ने कथित तौर पर लाठी और लोहे की छड़ों से हमला किया, जिसमें उनके सिर पर गंभीर चोट आई। उन्हें लंबे समय तक अस्पताल में इलाज कराना पड़ा।
हमले के बाद उन्हें स्कूल जाने से भी रोक दिया गया और कुछ समय तक उन्होंने जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) के कार्यालय में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। अख्तर का कहना है कि यह हमला केवल राष्ट्रगान के कारण नहीं हुआ था। उन्होंने कहा: “मैंने स्कूल का माहौल सख्ती से नियंत्रित किया था। मेरे आने से पहले स्थानीय अपराधी, जो आर्थिक रूप से मजबूत थे, अक्सर स्कूल परिसर में आकर लड़कियों को परेशान करते थे। मैंने कई अभिभावकों को अपनी नाबालिग बेटियों की शादी करने से भी रोका। ये कई कारणों में से कुछ थे, जिन्होंने इन लोगों को मेरे खिलाफ भड़काया। मुझे अंदाजा था कि ऐसा हो सकता है और मैं मानसिक रूप से तैयार था।”
भारतीय पहचान और राष्ट्र के प्रति सम्मान
काज़ी मसूम अख्तर का मानना है कि भारत में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, सबसे पहले भारतीय है। उनके अनुसार, भारतीय संस्कृति और देश के प्रति सम्मान व्यक्त करना किसी अन्य देश या धर्म का अपमान नहीं है। उन्होंने कहा कि भारतीय मुसलमानों को देश की संस्कृति और संविधान को समझना चाहिए और खुद को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना चाहिए।
अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अभियान
इतिहास के विद्यार्थी रहे काज़ी मसूम अख्तर भारतीय संस्कृति और समाज का गहरा अध्ययन करते रहे हैं। उनका जन्म हावड़ा जिले के बसंतपुर गांव में एक संपन्न परिवार में हुआ। गांव में रहते हुए उन्होंने देखा कि कई गरीब और अशिक्षित लोग चमत्कारों की उम्मीद में स्वयंभू गुरुओं और पीरों का अंधानुकरण करते हैं।
उन्होंने कहा: “मैंने अपनी असहमति और विरोध व्यक्त करने के लिए लिखना शुरू किया। लेकिन जल्द ही मुझे एहसास हुआ कि केवल लिखना पर्याप्त नहीं है; लोगों के अंदर पीर-बाबाओं और धार्मिक गुरुओं के प्रति अंधविश्वास को खत्म करने के लिए मुझे जमीन पर काम करना होगा।” अख्तर का कहना है कि उनका उद्देश्य वास्तविक धार्मिक मूल्यों और सामाजिक विकास को बढ़ावा देना है।
उन्होंने कहा: “मुझे गर्व है कि मैं वास्तविक इस्लाम और मुस्लिम समाज के विकास के लिए काम करना चाहता हूं। लोगों को यह समझना चाहिए कि 72 वर्षों में केवल दो बंगाली मुसलमानों को पद्म पुरस्कार क्यों मिले। वे तथ्यों और आंकड़ों से इतने अनजान क्यों हैं?”
धर्म, सुधार और विवादों पर खुलकर विचार
काज़ी मसूम अख्तर खुद एक मुस्लिम पीर परिवार से आते हैं, लेकिन वह धार्मिक अंधविश्वासों के आलोचक रहे हैं। उन्होंने कहा: “मैं खुद एक मुस्लिम पीर परिवार से आता हूं, लेकिन मैं जानता हूं कि सच्चा इस्लाम किसी इंसान की पूजा की अनुमति नहीं देता, केवल अल्लाह की इबादत की जाती है। फिर भी लोग दरगाहों पर चादर चढ़ाते हैं और पीरों की मजारों पर पैसे चढ़ाते हैं, जबकि यह उचित नहीं है। लोगों को सामान्य इंसानों को पूजने के लिए मानसिक रूप से तैयार कर दिया गया है। वे अंधविश्वास में जी रहे हैं।”
उन्होंने मुस्लिम समाज में सुधार, तीन तलाक और वोट बैंक की राजनीति जैसे मुद्दों पर भी अपनी राय रखी। तीन तलाक के खिलाफ उन्होंने एक लाख हस्ताक्षर जुटाकर भारत के राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजा था।
धमकियां, विरोध और संघर्ष
काज़ी मसूम अख्तर का कहना है कि पिछले कई वर्षों से कुछ इस्लामी समूहों ने उन्हें निशाना बनाया और उनके खिलाफ फतवे जारी किए। उन्होंने कहा: “पिछले कुछ वर्षों से कई इस्लामी समूहों के निशाने पर हूं, जिन्होंने मेरे खिलाफ फतवे जारी किए हैं। लेकिन मैं उनसे डरता नहीं हूं। धमकियां अब मुझे नहीं डरातीं। मैं अपना काम जारी रखना चाहता हूं—इस्लाम को उन झूठी समानांतर धार्मिक प्रथाओं से मुक्त करने का काम।”
उन्होंने यह भी बताया कि कुछ लोगों ने उनकी दाढ़ी न रखने पर आपत्ति जताई और उन्हें दाढ़ी बढ़ाने के लिए कहा गया। यहां तक कि उनसे समय-समय पर चेहरे की तस्वीर भेजने को भी कहा गया ताकि यह देखा जा सके कि वह दाढ़ी बढ़ा रहे हैं या नहीं।
CAA और राजनीतिक मुद्दों पर बेबाक राय
काज़ी मसूम अख्तर ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का समर्थन किया। उनका कहना था कि भारतीय मुसलमानों को इससे डरने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा: “यह कानून संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ है। राज्यसभा में भाजपा के पास बहुमत नहीं था, फिर भी गैर-भाजपा दलों ने इसका समर्थन किया। अब वही दल अपने राजनीतिक हितों के लिए विरोध और अशांति को बढ़ावा दे रहे हैं।”
उन्होंने आगे कहा: “भारतीय मुसलमानों को CAA से डरने की जरूरत नहीं है। कई विकसित देशों में नागरिकता कार्ड की व्यवस्था है और मैं इसकी सराहना करता हूं। कानून में यदि कोई भेदभावपूर्ण प्रावधान है तो उसके लिए न्यायपालिका का रास्ता अपनाना चाहिए, न कि सड़कों को रोककर विरोध करना चाहिए।”
पद्म श्री सम्मान और आगे का सफर
वर्ष 2020 में काज़ी मसूम अख्तर को भारत सरकार ने पद्म श्री से सम्मानित किया। इससे पहले वर्ष 2017 में ममता बनर्जी सरकार ने उन्हें ‘श्रेष्ठ शिक्षक’ पुरस्कार से सम्मानित किया था। वर्तमान में वह कत्जू नगर स्वर्णमयी हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक हैं। उनके लिए पुरस्कार अंतिम लक्ष्य नहीं हैं। उनका कहना है कि उनका वास्तविक उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना और छात्रों के बेहतर भविष्य का निर्माण करना है।
उन्होंने कहा: “पुरस्कार पाना मेरा अंतिम लक्ष्य नहीं है। मेरा उद्देश्य लगातार सुधार की प्रक्रिया और अपने छात्रों का बेहतर भविष्य बनाना है। मैं यहीं नहीं रुकूंगा। तमाम मुश्किलों और हमलों के बावजूद मैं अपना काम जारी रखूंगा।”
एक शिक्षक जिसने बदलाव का रास्ता चुना
काज़ी मसूम अख्तर की कहानी केवल एक पद्म श्री पुरस्कार विजेता शिक्षक की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस व्यक्ति की कहानी है जिसने अपने विचारों, साहस और शिक्षा के प्रति विश्वास के साथ समाज में बदलाव लाने का प्रयास किया। विरोध, धमकियों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा, सुधार और जागरूकता के अपने अभियान को जारी रखा। उनका जीवन यह संदेश देता है कि एक शिक्षक केवल किताबों का ज्ञान नहीं देता, बल्कि समाज की सोच को भी दिशा दे सकता है।