
साकिब सलीम
भारतीय मीडिया में पिछले कुछ हफ्तों से एक नई बहस चल रही है। यह बहस हड़प्पा और सिंधु घाटी सभ्यता पर पाकिस्तान के दावों को लेकर है। भारत में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जैसे पाकिस्तान की नीति में अचानक कोई बड़ा बदलाव आया है। लोगों को लग रहा है कि साल 1947 में बना यह देश अब भारत के विरोध पर टिकी अपनी पहचान को छोड़ रहा है।
इतिहासकार साकिब सलीम के अनुसार यह धारणा पूरी तरह गलत है। पाकिस्तान की यह रणनीति न तो नई है और न ही उसकी राज्य नीति में वैदिक हिंदू सभ्यता के प्रति कोई सम्मान जागा है। किसी भी नए राष्ट्र को अपनी वैधता साबित करने के लिए एक साझा इतिहास और संस्कृति की जरूरत होती है। इसी के दम पर वह अपनी अलग पहचान का दावा करता है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया में केवल दो ही ऐसे देश बने जिन्होंने धर्म के आधार पर अपनी पहचान बनाई। ये देश पाकिस्तान और इजराइल हैं। इजराइल ने अपनी जमीन पर दावा ठोकने के लिए तोराह की कहानियों का सहारा लिया। पाकिस्तान को भी एक ऐसे साझा इतिहास की तलाश थी जो उसके नागरिकों को एक सूत्र में बांध सके।
पाकिस्तान के लिए यह काम बहुत मुश्किल था। उसके हिस्से का इतिहास वास्तव में भारत का ही इतिहास था। यह मुख्य रूप से हिंदुओं और वैदिक संस्कृति का इतिहास था। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग ही हिंदू संस्कृति के विरोध और हिंदू राज के डर पर की थी। इसके बावजूद पाकिस्तान ने जन्म लेते ही प्राचीन सभ्यता पर अपना दावा ठोकना शुरू कर दिया था।

मोर्टिमर व्हीलर और प्रोपेगैंडा की शुरुआत
साल 1948 में भारत सरकार ने ब्रिटिश पुरातत्वविद मोर्टिमर व्हीलर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक पद से मुक्त कर दिया था। इसके तुरंत बाद पाकिस्तान ने उन्हें अपना पुरातत्व सलाहकार नियुक्त कर लिया। पाकिस्तान सरकार ने उन्हें एक खास काम सौंपा था। काम यह था कि सिंधु घाटी सभ्यता को पाकिस्तान का साबित किया जाए और इसे हिंदू संस्कृति से अलग दिखाया जाए।
मोर्टिमर व्हीलर ने इस एजेंडे के तहत साल 1950 में एक किताब लिखी। इस किताब का नाम था फाइव थाउजेंड इयर्स ऑफ पाकिस्तान। एक अन्य ब्रिटिश पुरातत्वविद स्टुअर्ट पिगोट ने बाद में लिखा कि व्हीलर की यह किताब पूरी तरह से एक राजनीतिक प्रोपेगैंडा थी। इस किताब की प्रस्तावना खुद पाकिस्तान के तत्कालीन शिक्षा मंत्री फजलुर रहमान ने लिखी थी।
व्हीलर ने अपनी किताब में लिखा कि पाकिस्तान एक नया इस्लामिक देश है। लेकिन यह अपने पुराने पड़ोसियों की तरह ही उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है जिसमें इस्लाम सबसे नया मोड़ है। पाकिस्तान सरकार के इशारे पर लिखी गई इस किताब ने तर्क दिया कि देश की पहचान इस्लाम के आगमन से नहीं बल्कि उसके प्राचीन इतिहास से तय होगी।
इस रणनीति के सामने एक बड़ा विरोधाभास था। प्राचीन इतिहास को हिंदू धर्म से अलग कैसे किया जाए क्योंकि पाकिस्तान की बुनियाद ही हिंदू विरोध पर टिकी थी। इस उलझन को सुलझाने के लिए व्हीलर ने एक अजीब तर्क दिया। उन्होंने लिखा कि गंगा घाटी के मौर्य और गुप्त राजाओं ने पश्चिम की तरफ कदम बढ़ाए थे। इसके कारण गंगा घाटी का धर्म यानी हिंदू धर्म इस क्षेत्र में फैला।
व्हीलर का दावा था कि इन मैदानी इलाकों के राजाओं ने पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों को ज्यादा परेशान नहीं किया। उन्होंने लिखा कि पश्चिमी पाकिस्तान को हमेशा उत्तर और पश्चिम की दिशाओं से यानी फारस और इराक से प्रभाव मिला। इसी ऐतिहासिक तथ्य में पाकिस्तान की राजनीतिक पहचान छिपी है।
इस तरह व्हीलर ने यह साबित करने की कोशिश की कि सिंध, बलूचिस्तान और पंजाब का संबंध गंगा के मैदानी इलाकों से नहीं बल्कि मध्य एशिया और अरब से था। उन्होंने पाकिस्तान को एक प्राकृतिक भौगोलिक इकाई के रूप में पेश किया। इसके लिए उन्होंने अरब सागर, बलूचिस्तान की पहाड़ियों, हिमालय और थार मरुस्थल को पाकिस्तान की स्वाभाविक सीमा बताया।

इतिहास को मिटाने और बदलने का दौर
साल 1950 के दशक के मध्य में पाकिस्तान में सैन्य शासन आ गया। इसके बाद देश में इस्लामीकरण की प्रक्रिया तेज हो गई। जमात ए इस्लामी जैसे संगठनों के प्रभाव में आकर सरकार ने इस्लाम से पहले के पूरे इतिहास को स्कूली किताबों से गायब कर दिया। पाकिस्तान के इतिहास की शुरुआत आठवीं शताब्दी के अरब हमलावर मोहम्मद बिन कासिम से की जाने लगी।
स्कूलों में पढ़ाया जाने लगा कि पाकिस्तान का इतिहास कासिम की सिंध फतह से शुरू होता है। इसके बाद यह सीधे मोहम्मद अली जिन्ना पर आकर खत्म होता है जिन्होंने हिंदुओं से लड़कर यह देश जीता।
पाकिस्तानी मानवविज्ञानी हारून खालिद ने साल 2018 में इस पर विस्तार से लिखा था। उनके अनुसार पाकिस्तान में इतिहास को इस तरह दिखाया गया जैसे भारत एक अपवित्र और असभ्य भूमि थी जहां ज्ञान का उजाला सिर्फ मुसलमानों के आने के बाद हुआ। साल 1970 के दशक में जुल्फिकार अली भुट्टो के शासनकाल में यह स्थिति और खराब हो गई।
भुट्टो की सरकार ने एक नया प्रयोग किया। स्कूलों से इतिहास विषय को ही खत्म कर दिया गया। प्राचीन राजाओं जैसे राम, बुद्ध, अशोक और कनिष्क की कहानियां किताबों से हटा दी गईं। उनके स्थान पर पाकिस्तान स्टडीज नाम का एक नया विषय लाया गया। इसका एकमात्र उद्देश्य बच्चों के भीतर एक कृत्रिम पाकिस्तानी पहचान भरना था।
इसी दौर में पाकिस्तान ने एक बार फिर सिंधु घाटी सभ्यता की तरफ रुख किया। इस बार मकसद अपने लोगों को इतिहास बताना नहीं था। मकसद था एक ऐसा इतिहास खड़ा करना जो भारत के हिंदू अतीत का मुकाबला कर सके। हारून खालिद लिखते हैं कि इस नई व्यवस्था में सिंधु घाटी सभ्यता को एक खास महत्व मिला। इसके पीछे कारण यह था कि यह सभ्यता उतनी हिंदू नहीं लगती थी जितनी अन्य ऐतिहासिक इमारतें थीं।
पाकिस्तानी विचारकों का मानना था कि सिंधु घाटी सभ्यता के समय ब्राह्मणवाद या हिंदू धर्म का उदय नहीं हुआ था। हिंदू प्रभाव से मुक्त होने के कारण यह सभ्यता पाकिस्तान के शासकों के लिए स्वीकार्य हो गई। इसलिए हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे शहरों की खुदाई जारी रखी गई और वहां के संग्रहालयों को भी बंद नहीं किया गया।
'सिंधु नागरिक' की नई पहचान और उसके खतरे
जुल्फिकार अली भुट्टो के पोते बिलावल भुट्टो ने हाल के वर्षों में इसी सिंधु घाटी सभ्यता के इतिहास का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया है। साल 2014 में उन्होंने मोहनजोदड़ो के ऐतिहासिक स्थल पर सिंध फेस्टिवल का आयोजन किया था। तब से वह लगातार खुद को सिंधु घाटी सभ्यता का असली वारिस बताते आ रहे हैं।
मोर्टिमर व्हीलर के बाद इस विषय पर सबसे प्रभावशाली राजनीतिक प्रोपेगैंडा राजनेता ऐतजाज अहसन ने लिखा। भुट्टो की पार्टी के वरिष्ठ नेता अहसन ने साल 1996 में एक किताब प्रकाशित की। इस किताब का नाम द सिंधु सागा एंड द मेकिंग ऑफ पाकिस्तान था। इस किताब ने पाकिस्तानी समाज की सोच पर गहरा असर डाला।
ऐतजाज अहसन के मुख्य तर्क इस प्रकार थे।
अहसन ने खुद स्वीकार किया था कि यह किताब उन्होंने पाकिस्तानियों के पहचान के संकट को दूर करने के लिए लिखी है। उन्होंने साफ कहा कि वे कोई पेशेवर इतिहासकार नहीं हैं और इतिहासकार उनकी इस कोशिश की आलोचना कर सकते हैं।
अहसन की किताब का सबसे बड़ा योगदान इंडस पर्सन यानी सिंधु नागरिक की नई अवधारणा थी। उन्होंने पाकिस्तानी नागरिक की परिभाषा जिन्ना के पुराने धार्मिक नारे से अलग हटकर तय की। उन्होंने कहा कि सिंधु नागरिक वही है जिसकी जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी हैं। उनके अनुसार यह संस्कृति पिछले तीन हजार सालों से हिंदू संस्कृति के समानांतर जीवित रही है।
अहसन ने लिखा कि सिंधु क्षेत्र ने हमेशा अपनी अलग पहचान बनाए रखी है। उनके अनुसार पाकिस्तान कोई हालिया कूटनीतिक दुर्घटना या अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति का नतीजा नहीं है। यह प्रागैतिहासिक काल से मौजूद एक स्वाभाविक देश है जो हमेशा रहेगा। आज भी कई पाकिस्तानी इसी विचार को सच मानते हैं।

ऐतिहासिक तथ्य और मुहाजिरों का भविष्य
मशहूर इतिहासकार रोमिला थापर ने इस सिद्धांत को पूरी तरह खारिज किया है कि किसी आर्य आक्रमण ने सिंधु घाटी के शहरों को नष्ट किया था। उन्होंने लिखा है कि अगर आर्यों ने शहरों को नष्ट किया होता तो इसके पुरातात्विक सबूत जरूर मिलते। सिंधु शहरों के पतन का असली कारण बड़े पर्यावरणीय और जलवायु परिवर्तन थे।
अब वैज्ञानिक तौर पर यह साबित हो चुका है कि सिंधु सभ्यता और वैदिक संस्कृति के बीच कोई बड़ा अंतर नहीं था। सिंधु सभ्यता को ही प्रारंभिक भारतीय संस्कृति का आधार माना जाता है। आर्य आक्रमण की थ्योरी अब पूरी तरह से खारिज हो चुकी है।
इसके अलावा ऐतजाज अहसन का यह दावा भी गलत है कि सिंधु सभ्यता केवल पाकिस्तान तक सीमित थी। इस सभ्यता के कई बड़े शहर भारत के मैदानी इलाकों में मिले हैं। हरियाणा का राखीगढ़ी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसकी खुदाई भारत में हुई है।
पाकिस्तान अपने हिंदू अतीत को छिपाकर इतिहास के साथ नाइंसाफी कर रहा है। यह नीति खुद उसके अपने समाज के लिए एक बड़ा खतरा बन रही है। यह विमर्श विशेष रूप से मुहाजिर समुदाय के लिए घातक है। मुहाजिर वे मुसलमान हैं जो साल 1947 में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और हैदराबाद से पलायन करके पाकिस्तान गए थे।
अगर पाकिस्तान एक विशिष्ट सिंधु पहचान को ही देश की नागरिकता का आधार बनाता है तो वे सभी लोग इस दायरे से बाहर हो जाएंगे जो भारत के अन्य राज्यों से वहां गए थे। जिन लोगों ने धर्म के नाम पर पाकिस्तान को चुना था वे इस नई परिभाषा में फिट नहीं बैठते हैं। भारत और हिंदू धर्म के प्रति नफरत में अंधा होकर पाकिस्तान एक आत्मघाती कदम उठा रहा है।