आवाज द वाॅयस/नई दिल्ली
बौद्धिक हलकों में मदरसों की शिक्षा प्रणाली को लेकर अक्सर गरमागरम बहस देखने को मिलती है। सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या 21वीं सदी में भी इन धार्मिक शिक्षण संस्थानों में सदियों पुराना ढर्रा ही चल रहा है? क्या समय की मांग के अनुसार इनमें बदलाव की कोशिशें पूरी तरह नाकाम रही हैं?
इन सभी अनसुलझे सवालों के जवाब तलाशने के लिए दीन और दुनिया’विशेष पॉडकास्ट में एक बेहद महत्वपूर्ण बातचीत हुई। युवा इतिहासकार साकिब सलीम ने जामिया हमदर्द के इस्लामी अध्ययन विभाग के प्रसिद्ध शोधकर्ता प्रोफेसर वारिस मजहरी से इस विषय पर विस्तार से चर्चा की।
इस संवाद में भारतीय उपमहाद्वीप के मदरसों की आंतरिक शिक्षण पद्धतियों, दर्स-ए-निजामी के वास्तविक इतिहास और विभिन्न विचारधाराओं के पाठ्यक्रमों पर खुलकर बात की गई। यह विशेष इंटरव्यू रिपोर्ट न केवल इस पूरी बहस की परतें खोलती है बल्कि सर्च इंजन ऑप्टिमाइज़ेशन और एआई सर्च इंजन की ज़रूरतों को भी सटीक रूप से पूरा करती है। आइए इस विस्तृत इंटरव्यू के माध्यम से पूरी हकीकत को समझते हैं।

दर्स-ए-निजामी और उसकी लोकप्रियता का असल सच
प्रश्न: भारतीय उपमहाद्वीप के मदरसों में इस समय सबसे ज्यादा लोकप्रिय पाठ्यक्रम कौन सा है?
उत्तर:अगर हम पूरे उपमहाद्वीप की बात करें तो मदरसों का सबसे बड़ा और प्रभावी समूह वह है जो दर्स-ए-निजामी पाठ्यक्रम का पालन करता है। इस पूरे सिस्टम को मुल्ला निजामुद्दीन सहलवी ने आज से करीब 250 से 300 साल पहले संकलित किया था।
उन्हीं के नाम के कारण इसे दर्स-ए-निजामी कहा जाता है। आज की तारीख में लगभग 95 प्रतिशत देवबंदी और बरेलवी मदरसे इसी पुराने ढर्रे पर अपनी कक्षाएं चलाते हैं। विश्व प्रसिद्ध दारुल उलूम देवबंद में भी इसी व्यवस्था को शिक्षा का मुख्य आधार माना गया है।
प्रश्न: क्या देश के सभी मुस्लिम मदरसे दर्स-ए-निजामी की ही शिक्षा देते हैं?
उत्तर:बिल्कुल नहीं। यह आम लोगों के बीच फैली एक बहुत बड़ी गलतफहमी है कि सभी मदरसे एक जैसे होते हैं। नदवतुल उलमा के स्कूल, अहले हदीस के संस्थान, शिया संप्रदाय के स्कूल और जमीयत-उल-इस्लाह जैसी संस्थाएं दर्स-ए-निजामी का पालन नहीं करती हैं।
आजमगढ़ का मशहूर जमीयत-उल-फलाह और दक्षिण भारत के तमाम बड़े स्कूल भी इस पुरानी व्यवस्था से सीधे तौर पर नहीं जुड़े हैं। इन सभी का अपना एक बिल्कुल अलग पाठ्यक्रम और एक स्वतंत्र शिक्षा प्रणाली है।
प्रश्न: दर्स-ए-निजामी का इतिहास कितना पुराना है और शुरुआती दौर में इसकी मुख्य विशेषताएं क्या थीं?
उत्तर:यह पाठ्यक्रम करीब ढाई से तीन सौ साल पुराना माना जाता है। इसमें जो किताबें पढ़ाई जाती हैं उनमें से अधिकांश मध्य युग के दौरान लिखी गई थीं। इस पाठ्यक्रम में तर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र और न्यायशास्त्र के सिद्धांतों पर लिखी गई किताबों की भरमार है। इसी मध्ययुगीन सोच और सामग्री के कारण आधुनिक दौर में कुछ खास हलकों द्वारा इस पूरे पाठ्यक्रम की तीखी आलोचना भी की जाती है।
मुग़ल शासन की आवश्यकताएं और आलोचना का आधार
प्रश्न: आधुनिक विचारकों और आलोचकों द्वारा दर्स-ए-निजामी की आलोचना क्यों की जाती है?
उत्तर:आलोचकों का सबसे बड़ा तर्क यह है कि इस पूरे सिस्टम को तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाया गया था। जब मुल्ला निजामुद्दीन ने इसे तैयार किया था तब भारत में मुग़ल शासन का दौर था।
उस समय राज्य को चलाने के लिए ऐसे कुशल व्यक्तियों की भारी आवश्यकता थी जो सरकारी प्रशासन, कचहरियों और शैक्षणिक क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दे सकें। इसी प्रशासनिक जरूरत को पूरा करने के लिए उस जमाने में पाठ्यक्रम का निर्माण किया गया था।
प्रश्न: मुग़ल काल के उस प्रारंभिक पाठ्यक्रम में किन विषयों को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया था?
उत्तर:उस दौर के दर्स-ए-निजामी में तर्कसंगत विज्ञान यानी बुद्धि और विवेक पर आधारित विषयों को सबसे ऊपर रखा गया था। तर्कशास्त्र और दर्शनशास्त्र जैसी विधाओं पर लिखी गई अनगिनत किताबें इस पाठ्यक्रम का मुख्य हिस्सा हुआ करती थीं। इसके विपरीत अगर हम देखें तो हदीस, तफ़सीर और फ़िक़्ह जैसे जो मूल धार्मिक विषय माने जाते हैं, उनकी किताबों की संख्या तुलनात्मक रूप से काफी कम थी।
प्रश्न: आम बोलचाल में तर्कसंगत विज्ञान या विवेक आधारित विषयों से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:तर्कसंगत विषयों का सीधा मतलब उन विधाओं से है जो इंसान की तर्क शक्ति और बुद्धि पर आधारित होती हैं। इसके अंतर्गत मुख्य रूप से तर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र और धर्मशास्त्र जैसे कठिन विषय आते हैं। इन विषयों को पढ़ाने का एकमात्र उद्देश्य यह था कि छात्रों की बौद्धिक क्षमता और किसी बात को तर्क के साथ रखने की शक्ति को मजबूत किया जा सके।
पाठ्यक्रम से विज्ञान का गायब होना और देवबंद का प्रभाव
प्रश्न: क्या प्रारंभिक निजामी पाठ्यक्रम में आधुनिक या वैज्ञानिक विषय भी शामिल थे?
उत्तर:हां, यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि शुरुआती दौर में ग्रीक या यूनानी तर्कशास्त्र और दर्शनशास्त्र का बहुत बड़ा महत्व था। इसके साथ ही मदरसों में गणित, खगोल विज्ञान और चिकित्सा विज्ञान जैसे जरूरी विषय भी नियमित रूप से पढ़ाए जाते थे। उस स्वर्णिम काल में धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ वैज्ञानिक और तार्किक अध्ययनों को भी पाठ्यक्रम में बराबर का स्थान मिला हुआ था।

प्रश्न: अगर ये वैज्ञानिक विषय पहले से शामिल थे, तो क्या ये आज भी मदरसों में पढ़ाए जाते हैं?
उत्तर:नहीं, आज की हकीकत बिल्कुल अलग है। वक्त बदलने के साथ इस पूरे पाठ्यक्रम में कई बड़े बदलाव हुए। तर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र, गणित, खगोल विज्ञान और चिकित्सा से जुड़ी बेहतरीन किताबों को धीरे-धीरे करके सिलेबस से बाहर कर दिया गया।
आम जनता आज भी यही सोचती है कि वर्तमान का दर्स-ए-निजामी ठीक वैसा ही है जैसा तीन सौ साल पहले था। जबकि सच यह है कि इसमें समय-समय पर कई फेरबदल किए गए हैं। हालांकि इसकी बुनियादी बनावट आज भी वैसी ही है, इसलिए इसका नाम नहीं बदला।
प्रश्न: वर्तमान समय के मदरसों में गणित, खगोल विज्ञान और भौतिकी जैसे विषय किस स्तर तक पढ़ाए जाते हैं?
उत्तर:आज के दर्स-ए-निजामी में आधुनिक गणित, भौतिकी या खगोल विज्ञान जैसे विषयों के लिए कोई जगह नहीं बची है। अरबी भाषा की औपचारिक पढ़ाई शुरू होने से पहले की शुरुआती कक्षाओं में फ़ारसी, उर्दू और कुछ बहुत ही बुनियादी चीजें सिखा दी जाती हैं। इसके बाद देवबंदी और बरेलवी विचारधारा के मदरसों में जो सात या आठ साल का मुख्य कोर्स होता है, उसमें इन वैज्ञानिक विषयों को नियमित तौर पर नहीं पढ़ाया जाता है।
प्रश्न: जब ये विषय पुराने पाठ्यक्रम का गौरव थे, तो इन्हें बाद में क्यों हटा दिया गया?
उत्तर:भारत के इतिहास को देखें तो राजशाही और मुग़ल काल के दौरान ये सभी विज्ञान मदरसों के पाठ्यक्रम का एक अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे। लेकिन बाद के दिनों में जैसे-जैसे अंग्रेजों का शासन आया और नई शैक्षिक आवश्यकताएं पैदा हुईं, इन विषयों का महत्व कम होने लगा। धीरे-धीरे इन्हें कम किया गया और अंत में पूरी तरह से हटा दिया गया।
प्रश्न: साल 1866 में दारुल उलूम देवबंद की स्थापना के समय पाठ्यक्रम में क्या बड़े बदलाव देखने को मिले?
उत्तर:जब 1866 में दारुल उलूम देवबंद की नींव रखी गई, तो उसके संस्थापकों ने तार्किक और वैज्ञानिक विषयों को बहुत ज्यादा सीमित कर दिया। उस समय इस कदम का व्यापक विरोध भी हुआ था। कई समकालीन विद्वानों का स्पष्ट कहना था कि यह नया सिलेबस उपमहाद्वीप की प्राचीन और समृद्ध शैक्षणिक परंपरा के खिलाफ है, जिसमें गणित और चिकित्सा जैसे विषयों को हमेशा ऊंचा स्थान दिया जाता था।
ब्रिटिश शासन का संकट और शिबली नोमानी का अधूरा सपना
प्रश्न: दारुल उलूम देवबंद की स्थापना के समय आधुनिक विज्ञान को पाठ्यक्रम से बाहर रखने की मुख्य वजह क्या थी?
उत्तर:संस्थान के मुख्य संस्थापक मौलाना मुहम्मद कासिम नानोतवी का नजरिया उस समय बिल्कुल अलग था। उनका मानना था कि ब्रिटिश हुकूमत ने भारत की पारंपरिक धार्मिक शिक्षा प्रणाली को बहुत गहरा नुकसान पहुंचाया है।
उनके अनुसार उस दौर में सबसे पहला और जरूरी काम इस्लामी शिक्षा की कमजोर होती बुनियाद को बचाना था। वह अक्सर एक उदाहरण देते थे कि इस समय धार्मिक शिक्षा की दीवार गिर रही है, इसलिए पहले उसे सहारा देना जरूरी है। उनका विचार था कि जब यह दीवार मजबूत हो जाएगी, तब दूसरे विज्ञान को शामिल करने पर विचार किया जाएगा। लेकिन बाद के समय में यह सोच हकीकत नहीं बन सकी।
प्रश्न: क्या बाद के वर्षों में मदरसा प्रबंधकों को आधुनिक विज्ञान को वापस सिलेबस में शामिल करने की जरूरत महसूस हुई?
उत्तर:जी हां, जैसे-जैसे समय बदला, विद्वानों के एक बड़े वर्ग को यह अहसास होने लगा कि कंप्यूटर, गणित, भौतिकी और आधुनिक तकनीक के बिना काम नहीं चल सकता। देवबंद के प्रभाव से पूरे देश में हजारों नए मदरसे तो खुल गए और धार्मिक शिक्षा भी मजबूत हो गई, लेकिन आधुनिक ज्ञान के मोर्चे पर एक बड़ा खालीपन दिखने लगा।
इसी कमी को दूर करने के लिए यह मांग उठने लगी कि समाज में अच्छे आधुनिक स्कूल और कॉलेज खोले जाएं। साथ ही मदरसों के पाठ्यक्रम में ऐसा सुधार हो जिससे निकलने वाले छात्र मस्जिद के साथ-साथ आधुनिक समाज में भी अपनी मजबूत भूमिका दर्ज करा सकें।
प्रश्न: इस नई सोच और सुधारवादी आंदोलन के परिणामस्वरूप समाज में कौन-कौन सी नई संस्थाएं सामने आईं?
उत्तर:इसी प्रगतिशील विचार के कारण नादवत-उल-उलमा जैसे ऐतिहासिक संस्थान वजूद में आए। उस समय के दूरदर्शी विद्वानों का मानना था कि हमें एक ऐसा नया पाठ्यक्रम तैयार करना चाहिए जो एक तरफ तो अपनी पुरानी इस्लामी विद्वत्तापूर्ण परंपरा से पूरी तरह जुड़ा रहे और दूसरी तरफ आधुनिक युग की हर नई आवश्यकता को भी आसानी से पूरा करता हो।
प्रश्न: इस पूरे शैक्षिक सुधार के मुद्दे पर प्रसिद्ध विद्वान अल्लामा शिबली नोमानी के क्या विचार थे?
उत्तर:अल्लामा शिबली नोमानी एक ऐसी आदर्श व्यवस्था बनाना चाहते थे जिसमें पूर्वी ज्ञान और पश्चिमी विज्ञान दोनों का एक बेहतरीन संगम हो। उनकी नजर में धार्मिक परंपरा और आधुनिक विज्ञान का यह मेल ही मुस्लिम समाज के लिए सबसे बेहतरीन शैक्षिक मॉडल था। उन्होंने नादवत उलमा को इसी ऊंचे ऊंचे सिद्धांतों के अनुरूप ढालने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी थी।
प्रश्न: क्या अल्लामा शिबली नोमानी अपने इस महान और प्रगतिशील लक्ष्य में पूरी तरह सफल हो पाए?
उत्तर:इतिहास गवाह है कि बाद के दिनों में शिबली नोमानी को खुद इस बात का बेहद अफसोस हुआ कि नादवत-उल-उलमा इस रास्ते पर आगे नहीं बढ़ सका। उन्होंने खुद एक जगह शिकायत की थी कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि नादवत-उल-उलमा भी धीरे-धीरे देवबंद के ही पुराने ढर्रे पर चलने लगा। जिस अनोखे और आधुनिक शैक्षिक मॉडल का सपना उन्होंने देखा था, वह पूरी तरह से जमीन पर नहीं उतर पाया।
मदरसा शिक्षा का मूल सिद्धांत:समाज की बदलती हुई आवश्यकताओं के अनुसार पाठ्यक्रम में बदलाव करना किसी भी जीवित शैक्षणिक परंपरा की पहली निशानी है।
सुधारों का विरोध और आर्थिक आत्मनिर्भरता का बड़ा संकट
प्रश्न: मदरसों के पाठ्यक्रम में बदलाव के इतने सारे प्रयास होने के बाद भी वे बड़े पैमाने पर सफल क्यों नहीं हो पाते?
उत्तर:यह वाकई एक ऐसा यक्ष प्रश्न है जिस पर पूरे समाज को बहुत गंभीरता से आत्ममंथन करने की जरूरत है। अल्लामा शिबली नोमानी, उबैदुल्लाह सिंधी और मौलाना वहीदुद्दीन खान जैसे महान विचारकों ने समय-समय पर मदरसा शिक्षा में आमूलचूल सुधार की वकालत की।
कुछ नए मॉडल के मदरसे भी खोले गए, लेकिन उनका प्रभाव दारुल उलूम देवबंद के स्थापित मॉडल जितना व्यापक नहीं हो सका। देवबंदी शैली की लोकप्रियता उपमहाद्वीप में इतनी ज्यादा थी कि उसने हर दूसरे सुधारवादी प्रयास को पीछे छोड़ दिया।

प्रश्न: क्या दारुल उलूम देवबंद के मूल संस्थापकों का यह विचार था कि उनका बनाया पाठ्यक्रम कभी नहीं बदला जाना चाहिए?
उत्तर:बिल्कुल नहीं, यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। मौलाना मुहम्मद कासिम नानोतवी जैसे महान विद्वानों का यह सोचना कभी नहीं था कि जो पाठ्यक्रम वह तैयार कर रहे हैं, वह कयामत के दिन तक बिना किसी बदलाव के वैसा ही रहेगा।
उन्होंने साफ कहा था कि यह व्यवस्था उस समय की विशेष जरूरतों को देखकर बनाई गई है। वे इसे कोई पवित्र या अपरिवर्तनीय वस्तु नहीं मानते थे। उनका स्पष्ट मत था कि समाज की बदलती जरूरतों के हिसाब से इसमें बदलाव होने चाहिए, बशर्ते धार्मिक शिक्षा की मूल आत्मा सुरक्षित रहे।
प्रश्न: तो फिर बाद के दौर में इस पाठ्यक्रम के अंदर बदलाव करना इतना कठिन क्यों हो गया?
उत्तर:समय बीतने के साथ बाद की पीढ़ियों ने इस पाठ्यक्रम को एक अजीब तरह की पवित्रता के आवरण में लपेट दिया। लोगों के मन में यह बात बैठ गई कि चूंकि इसे हमारे महान बुजुर्गों ने तैयार किया था और इसी से बड़े-बड़े विद्वान पैदा हुए हैं, इसलिए इसमें किसी भी तरह का बदलाव करना एक गुनाह या भूल होगी। नतीजा यह हुआ कि जब भी किसी ने सुधार का कोई छोटा सा प्रस्ताव भी रखा, उसे समाज के भीतर भारी विरोध और अविश्वास का सामना करना पड़ा।
प्रश्न: मदरसों में किसी भी तरह के आधुनिक सुधारों का विरोध करने वाले लोगों का सबसे मुख्य तर्क क्या होता है?
उत्तर:उनका सबसे घिसा-पिटा तर्क यही होता है कि इसी पुराने पाठ्यक्रम ने अतीत में इस्लाम के बड़े-बड़े विद्वान और बुद्धिजीवी पैदा किए हैं, इसलिए इसमें किसी भी बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं है।
इसमें सबसे मजेदार और दिलचस्प बात यह है कि सोशल मीडिया पर इस पुराने ढर्रे का समर्थन करने वाले अधिकांश लोग खुद कभी किसी मदरसे में पढ़ने नहीं गए। वे खुद आधुनिक कॉन्वेंट स्कूलों और विश्वविद्यालयों से पढ़े हैं, लेकिन जब बात मदरसों की आती है तो वे यथास्थिति बनाए रखने के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। यह विरोधाभासी सोच इस पूरी बहस को और ज्यादा उलझा देती है।
प्रश्न: जो लोग इन सुधारों का आंख मूंदकर विरोध करते हैं, उनके विचारों का मुख्य स्रोत क्या है?
उत्तर:हकीकत यह है कि इस गंभीर विषय पर सोशल मीडिया या बाहर अपनी राय रखने वाले अधिकांश लोग मदरसों की वास्तविक परंपरा, उनके इतिहास, उनके स्वभाव और आंतरिक शिक्षा प्रणाली से पूरी तरह अनजान हैं।
जब तक कोई व्यक्ति मदरसों की पूरी शैक्षणिक पृष्ठभूमि को गहराई से नहीं समझ लेता, तब तक उसकी राय कभी संतुलित नहीं हो सकती। इसके उलट जो लोग इस सिस्टम को अंदर से अच्छी तरह जानते हैं, वे इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि मदरसों को बंद करने की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें आज के नए युग की आवश्यकताओं के अनुसार ज्यादा उपयोगी और प्रभावी बनाने की सख्त जरूरत है।
आधुनिक युग की चुनौतियां और आजीविका का सवाल
प्रश्न: क्या पुराने समय में तैयार किए गए पाठ्यक्रम को आज के समय में भी हूबहू बनाए रखना सही है?
उत्तर:इतिहास गवाह है कि हर नए युग की अपनी कुछ विशेष आवश्यकताएं और चुनौतियां होती हैं। इमाम गजाली, इब्न तैमिया, इब्न रुश्द या इब्न सिना के जमाने में जो विज्ञान पढ़ाया जाता था, उसे आज के वैज्ञानिक युग में उसी रूप में पढ़ाना मूर्खता होगी।
19वीं सदी में जब देवबंद की स्थापना हुई थी तब दुनिया का पूरा एजुकेशन सिस्टम अलग था। आज के समय में विज्ञान, आधुनिक तकनीक, कंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने ज्ञान के पूरे संसार को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। इसलिए समय की रफ्तार के साथ पाठ्यक्रम में बदलाव अपरिहार्य है।
प्रश्न: क्या मदरसों का असली उद्देश्य समाज के लिए डॉक्टर और इंजीनियर तैयार करना है?
उत्तर:नहीं, यह मदरसों का काम बिल्कुल नहीं है। मदरसों का प्राथमिक और मूल उद्देश्य हमेशा से यही रहा है कि वे कुरान, हदीस, फ़िक़्ह और इस्लामी न्यायशास्त्र में गहरी रुचि रखने वाले उच्च कोटि के धार्मिक विद्वान तैयार करें।
डॉक्टर या इंजीनियर बनाना मुख्य रूप से आधुनिक विश्वविद्यालयों का काम है। लेकिन यहां जरूरी बात यह है कि इन मदरसों से निकलने वाले विद्वानों में आधुनिक समाज की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को अच्छी तरह समझने की पूरी योग्यता होनी चाहिए ताकि वे समाज से कटे न रहें।
प्रश्न: क्या आज के समय में भी हमें उतनी ही बड़ी संख्या में धार्मिक विद्वानों की जरूरत है जितनी अतीत में थी?
उत्तर:यह एक बहुत ही बारीक और महत्वपूर्ण सवाल है। ब्रिटिश शासन के दौरान जब पारंपरिक मुस्लिम शिक्षा पूरी तरह तबाह हो गई थी, तब उस खालीपन को भरने के लिए बहुत बड़ी संख्या में विद्वानों को तैयार करना समय की सबसे बड़ी मांग थी।
लेकिन 1947 में देश की आजादी के बाद हालात पूरी तरह बदल गए। देश के कोने-कोने में मदरसों की संख्या में बाढ़ सी आ गई और आज हर छोटे-बड़े शहर में कई मदरसे खुल चुके हैं, जिससे संख्यात्मक असंतुलन पैदा हो गया है।

प्रश्न: समाज में धार्मिक शिक्षा और आधुनिक समकालीन शिक्षा को दो अलग-अलग हिस्सों में बांट कर देखने की प्रवृत्ति को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर:शिक्षा का यह धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष विभाजन ही बुनियादी तौर पर पूरी तरह गलत और गैर-इस्लामी है। अगर कोई छात्र अपनी धार्मिक पहचान, अच्छे नैतिक मूल्यों और इंसानी सेवा की भावना के साथ विज्ञान, चिकित्सा, दर्शन या इंजीनियरिंग की पढ़ाई करता है, तो इस्लाम की नजर में उसका यह काम भी एक बहुत बड़ी धार्मिक सेवा ही माना जाएगा। इस्लाम कभी भी आधुनिक विज्ञान के अध्ययन को रोकता नहीं है, बल्कि वह ज्ञान को मानवता के भले के लिए इस्तेमाल करने की वार्कशॉप सिखाता है।
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मदरसा विचारधारा / संस्था |
पाठ्यक्रम का मुख्य आधार |
आधुनिक विज्ञान की स्थिति |
|---|---|---|
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देवबंदी और बरेलवी मदरसे |
पारंपरिक दर्स-ए-निजामी (250-300 साल पुराना) |
केवल शुरुआती कक्षाओं तक सीमित, मुख्य कोर्स में शामिल नहीं |
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नादवत-उल-उलमा |
इस्लामी परंपरा और आधुनिक विषयों का मिश्रण |
देवबंद से बेहतर स्थिति, लेकिन शिबली का मूल सपना अधूरा |
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जमीयत-उल-फलाह (आजमगढ़) |
अपना स्वतंत्र और संशोधित पाठ्यक्रम |
धार्मिक शिक्षा के साथ समकालीन विषयों को बेहतर स्थान |
वैश्विक मॉडल और भारतीय मदरसों के लिए भविष्य की राह
प्रश्न: क्या भारतीय मदरसे भी अपने स्तर पर आधुनिक स्कूल और जन कल्याणकारी संस्थान चला सकते हैं?
उत्तर:बिल्कुल चला सकते हैं और उन्हें ऐसा करना भी चाहिए। असली रुकावट संसाधनों की नहीं बल्कि हमारी संकीर्ण सोच की है। हमारे समाज में लोग आम तौर पर यह मान बैठे हैं कि जकात और खैरात का पैसा केवल पारंपरिक मदरसों की इमारतों के लिए ही दिया जा सकता है।
जबकि हकीकत यह है कि अगर ये धार्मिक संस्थाएं अपनी पहचान को बनाए रखते हुए अच्छे स्कूल, कॉलेज, तकनीकी संस्थान और बड़े अस्पताल खोलें, तो यह समाज की सबसे बड़ी सेवा होगी। गुजरात में शास्तियात-उल-उलूम जैसी प्रगतिशील संस्थाओं ने अपने दम पर बेहतरीन इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज खड़े करके यह साबित कर दिया है कि अगर नीयत साफ हो तो धार्मिक पहचान के साथ भी आधुनिक शिक्षण संस्थानों को सफलतापूर्वक चलाया जा सकता है।
प्रश्न: क्या अतीत के इतिहास में मदरसों के भीतर छात्रों को किसी प्रकार का व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया जाता था?
उत्तर:ऐतिहासिक दस्तावेजों को देखें तो यह साफ हो जाता है कि पुराने जमाने में कई बड़े मदरसों में बुक बाइंडिंग, सिलाई, कढ़ाई और जूता बनाने जैसे जरूरी व्यावसायिक कौशल सिखाए जाते थे। इसके पीछे सोच यह थी कि मदरसा से पास होने वाला छात्र अपनी आजीविका के लिए सिर्फ मस्जिद की इमामत या किसी मदरसे की नौकरी पर निर्भर न रहे।
वह समाज में एक आत्मनिर्भर नागरिक बनकर जी सके। मदरसों के पुराने संस्थापकों को इस बात का पूरा अहसास था कि छात्रों को भविष्य में बड़ी आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है, इसीलिए उन्होंने इस कौशल विकास को अपने सिस्टम का हिस्सा बनाया था।
प्रश्न: आज के इस डिजिटल और कंप्यूटर युग में उन पुराने कौशलों का स्थान किन नई विधाओं को लेना चाहिए?
उत्तर:आज की तारीख में पूरी दुनिया बदल चुकी है। हाथ से लिखने का जमाना अब लद गया है और मशीनी युग में बुक बाइंडिंग का काम भी वैसा नहीं रहा जैसा पहले था। इसलिए आज के समय में इन पुराने पड़ चुके कौशलों को तुरंत कंप्यूटर एप्लीकेशन, कोडिंग, सॉफ्टवेयर, डिजिटल तकनीक और अन्य आधुनिक शॉर्ट-टर्म व्यावसायिक पाठ्यक्रमों से बदल देना चाहिए। मकसद आज भी वही होना चाहिए जो मुग़ल काल में था, बस समय के अनुसार उसका जरिया और तरीका बदल जाना चाहिए।

प्रश्न: क्या मदरसों के पाठ्यक्रम में इस तरह के कौशल विकास कार्यक्रमों को शामिल करना कोई बिल्कुल नई या
अजीब बात होगी?
उत्तर:नहीं, यह कोई नई बात नहीं होगी बल्कि यह तो मदरसों की अपनी खोई हुई प्राचीन परंपरा का ही एक स्वाभाविक विस्तार होगा। जब इतिहास में पहले भी छात्रों को व्यावहारिक काम सिखाए जाते थे, तो आज के समय में उन्हें कंप्यूटर या कोडिंग सिखाने में किसी को क्या ऐतराज हो सकता है? आज सिर्फ इन कौशलों को 21वीं सदी की जरूरतों के हिसाब से अपडेट करने की जरूरत है।
दान पर निर्भरता और विचारों की स्वतंत्रता का बड़ा संकट
प्रश्न: वर्तमान समय में मदरसों के भीतर आर्थिक आत्मनिर्भरता की यह पुरानी अवधारणा इतनी कमजोर कैसे हो गई?
उत्तर:समय बीतने के साथ मदरसों के पूरे सिस्टम से आर्थिक आत्मनिर्भरता और व्यावसायिक ट्रेनिंग का यह सबसे जरूरी पहलू गायब होता चला गया। मुग़ल काल और सल्तनत काल के दौरान पूरा ढांचा इस तरह तैयार किया गया था कि मदरसा से निकलने वाला छात्र समाज के हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सके और एक सम्मानजनक सरकारी या निजी नौकरी पा सके। लेकिन बाद में इसे सिर्फ एक सीमित धार्मिक दायरे तक सिकोड़ दिया गया।
प्रश्न: आज के समय में देश के तमाम बड़े मदरसों से पास होकर निकलने वाले छात्रों की वास्तविक स्थिति क्या है?
उत्तर:आज की कड़वी सच्चाई यह है कि अधिकांश छात्र मदरसों से स्नातक की डिग्री लेने के बाद आजीविका के लिए वापस किसी न किसी मदरसे में पढ़ाने चले जाते हैं या फिर किसी छोटी-मोटी मस्जिद में इमाम और मुअज्जिन की जिम्मेदारी संभाल लेते हैं। इसका एकमात्र कारण यही है कि उनके पूरे सात-आठ साल के लंबे पाठ्यक्रम में आधुनिक समाज के काम आने वाले किसी भी व्यावसायिक कौशल पर रत्ती भर भी ध्यान नहीं दिया जाता है।
प्रश्न: क्या चिकित्सा जैसे पारंपरिक विषयों को भी आज के नए वैज्ञानिक नजरिए से देखने की जरूरत है?
उत्तर:जी हां, बिल्कुल जरूरत है। जिस तरह पुराने जमाने में यूनानी चिकित्सा पद्धति का अपना एक बड़ा महत्व था और दारुल उलूम देवबंद में भी इसका एक अलग विभाग था, उसी तरह आज का युग पूरी तरह से एलोपैथी और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का है।
आज एमबीबीएस और एमडी जैसी डिग्रियों ने पूरी दुनिया में इलाज के नए प्रतिमान स्थापित किए हैं। इसलिए मदरसों को भी अपनी मूल धार्मिक पहचान को अक्षुण्ण रखते हुए अपने छात्रों को इन आधुनिक वैज्ञानिक क्षेत्रों में आगे बढ़ने के रास्ते खोलने चाहिए।

प्रश्न: मदरसों की जनता के दान पर बढ़ती निर्भरता उनके आंतरिक कामकाज और विचारों की आजादी को किस तरह प्रभावित करती है?
उत्तर:यह आज के दौर का सबसे संवेदनशील और गंभीर मुद्दा बन चुका है। आज देश के अधिकांश मदरसे पूरी तरह से जनता से मिलने वाले चंदे और जकात के पैसों पर ही टिके हुए हैं। जब कोई भी शैक्षणिक संस्थान आर्थिक रूप से पूरी तरह जनता पर निर्भर हो जाता है, तो उसके प्रबंधकों और विद्वानों के भीतर से स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है।
उन्हें हमेशा यह डर सताता रहता है कि अगर उन्होंने समाज की किसी कुप्रथा या गलती के खिलाफ कोई कड़वी बात कह दी, जो आम जनता को पसंद न आए, तो उनका चंदा बंद हो सकता है। आर्थिक आत्मनिर्भरता की यही कमी आज विद्वानों को समाज में जरूरी सुधारों के लिए खुलकर बोलने से रोकती है। अगर हमारे विद्वान आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होंगे, तो वे बिना किसी डर के समाज को सही राह दिखा सकेंगे, जैसा कि शुरुआती इस्लामी इतिहास में हमेशा देखा जाता था।