महाराष्ट्र में हिंदू-मुस्लिमों ने मिलकर पेश की अनोखी 'कुर्बानी' की मिसाल

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 31-05-2026
In Maharashtra, Hindus and Muslims together set a unique example of 'Qurbani'.
In Maharashtra, Hindus and Muslims together set a unique example of 'Qurbani'.

 

भक्ति चालक

बकरी ईद यानी ईद-उल-अज़हा, मुस्लिम समाज का एक बहुत ही अहम त्योहार है। यह त्योहार मुख्य रूप से त्याग, रहम, भलाई और अल्लाह की राह में सब कुछ कुर्बान कर देने का प्रतीक माना जाता है। इस साल दुनिया भर में बकरी ईद बड़े ही जोश और खुशी के साथ मनाई गई। 

बदलते वक्त के साथ ऐसे मज़हबी त्योहार लोगों के और करीब आएं और उनसे समाज का भला हो, इसके लिए कुछ संस्थाएं पूरी ईमानदारी से काम कर रही हैं। इसी कड़ी में, इस बार पुणे में एक ऐसा शानदार काम हुआ है जिसकी चर्चा अब हर तरफ हो रही है। महाराष्ट्र की एक तंज़ीम ने त्योहार के दौरान समाज की भलाई का एक बहुत ही अनमोल पैगाम दिया है।

खून का दान दुनिया का सबसे बड़ा और बेहतरीन दान यानी 'जीवनदान' माना जाता है। मेडिकल साइंस के मुताबिक, आपका दिया हुआ सिर्फ एक यूनिट खून कम से कम तीन लोगों की जान बचा सकता है। आजकल अस्पतालों में खून की कमी एक बहुत ही गंभीर परेशानी बन गई है। एक्सिडेंट, बड़ी सर्जरी, कैंसर के इलाज या डिलीवरी के वक्त खून की बहुत ज़्यादा ज़रूरत पड़ती है। ऐसे मुश्किल वक्त में खून की एक बोतल के लिए भी मरीज़ के रिश्तेदारों को दर-दर भटकना पड़ता है।

इसी बात पर गहराई से विचार करते हुए, हाल ही में गुज़रे त्योहार के दौरान पुणे में 'मुस्लिम सत्यशोधक मंडल' की तरफ से एक ब्लड डोनेशन कैंप लगाया गया था। इस प्रोग्राम के ज़रिए मुस्लिम समाज ने 'कुर्बानी' के असल जज़्बे को एक बड़ा और नया मतलब दिया है। इस पहल के ज़रिए यह बताया गया कि समाज के लिए खुद को अर्पण करना और अपना खून देना ही अल्लाह की सच्ची इबादत है।

सोलह सालों की लगातार खिदमत

मुस्लिम सत्यशोधक मंडल ने इस त्योहार को समाज की ज़िम्मेदारी के साथ जोड़ा है। खास बात यह रही कि इस प्रोग्राम में सिर्फ मुस्लिम समाज ही नहीं, बल्कि सभी जातियों और मज़हबों के लोगों ने बड़े जोश के साथ हिस्सा लिया। 

समाज में मज़हबी भाईचारा, साइंटिफिक सोच और इंसानियत को बढ़ावा देना ही इसका सबसे बड़ा मकसद है। यह मंडल पिछले 16 सालों से लगातार ऐसे ब्लड डोनेशन कैंप कामयाबी के साथ लगा रहा है।इस नए कॉन्सेप्ट के बारे में बताते हुए मुस्लिम सत्यशोधक मंडल के अध्यक्ष शमसुद्दीन तांबोली ने अपनी बात रखी। वह कहते हैं, "ब्लड डोनेशन करने का यह फैसला 2011 में लिया गया था और वहीं से इस सफर की शुरुआत हुई। उस वक्त डॉ. बाबा आढाव, डॉ. नरेंद्र दाभोलकर और कई बड़े लोग हमारे साथ खड़े थे।"

वह आगे बताते हैं, "कोरोना के खौफनाक दौर में भी हमने कदम पीछे नहीं खींचे। उस मुश्किल वक्त में हमने ब्लड डोनेशन के साथ-साथ प्लाज्मा डोनेट करने का भी बड़ा काम अपने हाथ में लिया। इसी तरह, जब भी राज्य में कोई तूफान आया या बाढ़ जैसे हालात बने, हमने वहां मदद पहुँचाई। मंडल के ज़रिए हमने नेत्रहीन लोगों को भी आर्थिक मदद दी है। और ऐसे कई प्रोग्राम हम आने वाले वक्त में भी करेंगे।"

इस मुहिम की कामयाबी पर शमसुद्दीन तांबोली बताते हैं, "आज इस प्रोग्राम को 15 साल पूरे हो गए हैं। हमारे साथ 'महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति' और संविधान को मानने वाले कई दूसरे संगठन कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं। 

पिछले कुछ सालों से हम ब्लड डोनेशन के साथ-साथ मरने के बाद अंगदान और देहदान का कॉन्सेप्ट भी समाज में फैला रहे हैं। इसके लिए बेदारी पैदा करना और लोगों से संकल्प पत्र भरवाना, यह काम हम लगातार करते रहते हैं।"

आज के बदलते सामाजिक हालात में इस काम की अहमियत और भी बढ़ गई है, इस तरफ भी तांबोली ने ध्यान खींचा। कुर्बानी के बदलते तौर-तरीकों पर बात करते हुए उन्होंने कहा, "जब हम 'कुर्बानी' कहते हैं, तो उसमें त्याग और खुद को अर्पण करने का जज़्बा होता है।अगर सच में त्याग करना है, तो वह चीज़ अपनी मेहनत की कमाई या हलाल की होनी चाहिए। इसलिए अपना खून देकर किसी की जान बचाना सबसे बड़ी कुर्बानी है।"

वह आगे कहते हैं, "आज कई शहरों में पर्यावरण को लेकर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। अलग-अलग सोसायटियों में जानवरों की कुर्बानी को लेकर नाराज़गी देखने को मिलती है। इससे बेवजह मज़हबी तनाव बढ़ता है। यह सब समाज को बांटने की तरफ ले जा रहा है और इससे मुस्लिम समाज की छवि खराब हो रही है।

इसलिए त्याग और दान-पुण्य के इस जज़्बे को हमें नए रूप में लोगों के सामने लाना चाहिए। मुस्लिम सत्यशोधक मंडल की यह एक छोटी सी कोशिश है इसे समाज और इंसानियत के फायदे के लिए इस्तेमाल करने की।"

हमीद दलवाई के विचारों की विरासत

इस मुहिम के पक्के समर्थक और महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक अशोक धिवरे ने भी इस काम की खुलकर तारीफ की है। इस आंदोलन के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, "मुस्लिम सत्यशोधक मंडल और धर्म की चिकित्सा का बहुत पुराना और गहरा नाता है। हमीद दलवई के ज़माने से ही धर्म को तार्किक नज़रों से देखना इस आंदोलन का एक अटूट हिस्सा रहा है। उसी के एक हिस्से के तौर पर, जानवरों की कुर्बानी की जगह, इंसान को जो चीज़ सबसे ज़्यादा प्यारी है, उसका दान करने की अच्छी नीयत से समाज को बदलने का यह काम चल रहा है।"

अशोक धिवरे आगे कहते हैं, "मैं इन कार्यक्रमों में हमेशा बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता हूँ। क्योंकि अगर समाज को तरक्की के रास्ते पर ले जाना है, तो इस प्रोग्राम में धर्म और जाति देखने के बजाय समाज के लिए ज़रूरी बातों पर ज़ोर दिया गया है।

यहां ब्लड डोनेट करने वालों में दूसरे मज़हब के लोगों को देखकर बहुत खुशी होती है। अगर भारत को पूरी तरह से एक और मज़बूत रखना है, तो आज देश को ऐसे ही प्रोग्राम्स की बहुत ज़रूरत है। डॉ. तांबोली और उनके कार्यकर्ता जो यह अनमोल काम कर रहे हैं, उसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है।"

इस प्रोग्राम की असल ज़रूरत और इस्लाम में इंसानियत की अहमियत पर मुस्लिम सत्यशोधक मंडल की मेंबर डॉ. समीना पठान ने बहुत ही बेहतरीन बातें कहीं। डॉ. समीना पठान बताती हैं, "इस्लाम में सभी मुस्लिम भाई जानवरों की कुर्बानी देते हैं, उस रवायत को इस प्रोग्राम के ज़रिए एक नई सोच देने की कोशिश की गई है।"

रवायतों में वक्त के हिसाब से होने वाले बदलावों पर बात करते हुए डॉ. समीना पठान आगे कहती हैं, "साइंटिफिक नज़रिया सामने रखते हुए, मज़हब में बताई गई कुछ रवायतों को आज के वक्त की ज़रूरत के हिसाब से भी सोचना चाहिए। कुछ लोग जानवरों की कुर्बानी देते हैं, तो कुछ लोग ज़कात निकालकर गरीब और पिछड़े तबकों की तालीम (शिक्षा) के लिए पैसों से मदद करते हैं। इन दिनों हम ब्लड डोनेशन, देहदान और अंगदान का संकल्प लेते हैं। इसमें सभी जातियों और मज़हबों के भाई-बहन शामिल होते हैं।"

गर्मियों में खून की कमी का बेहतरीन इलाज

महाराष्ट्र राज्य के पूर्व स्वास्थ्य निदेशक और मशहूर लेखक डॉ. प्रदीप आवटे ने इस प्रोग्राम के मेडिकल और सामाजिक पहलुओं पर खास ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि हर मज़हब के त्योहारों को ऐसे नए रूप की ज़रूरत है।

प्रदीप आवटे कहते हैं, "मुस्लिम सत्यशोधक मंडल कुर्बानी को एक नया और खूबसूरत मतलब देने की कोशिश कर रहा है। अपने-अपने मज़हब के त्योहारों को वक्त के साथ एक अलग और बेहतर रूप देना हर धर्म के इंसान का फर्ज़ है।

इस मंडल ने असल पैगाम—यानी त्याग और भाईचारे—को सीधे ब्लड डोनेशन, देहदान और अंगदान के नए कॉन्सेप्ट के साथ जोड़ दिया है। इससे इंसानी ज़िंदगी आसान होने में मदद मिलती है और हमारी कुर्बानी से कई लोगों की ज़िंदगी में खुशियां आती हैं। यह बहुत ही तारीफ के काबिल काम है और देश भर के सभी तबकों के लोगों को इसमें शामिल होना चाहिए।"

गर्मियों में अस्पतालों में खून की भारी कमी महसूस होती है। इसी बात का हवाला देते हुए प्रदीप आवटे आगे कहते हैं, "हम देख रहे हैं कि अभी गर्मी बहुत ज़बरदस्त है। इस तेज़ गर्मी की वजह से लगभग सभी शहरों में खून की बड़ी कमी हो गई है। ऐसे मुश्किल वक्त में ब्लड डोनेट करना, सही मायनों में इंसानियत का एक बहुत बड़ा काम है।"

पुणे में मुस्लिम सत्यशोधक मंडल की तरफ से किया गया यह काम समाज के लिए एक मिसाल बन गया है। त्याग के पाक जज़्बे को साइंस और इंसानियत के साथ जोड़कर मुस्लिम समाज ने पूरे देश के सामने एक इंकलाबी मिसाल पेश की है। खून के रिश्तों से बढ़कर 'खून का दान' करके जोड़ा गया इंसानियत का यह रिश्ता आने वाले वक्त में और भी मज़बूत होगा, इसमें कोई शक नहीं है।