फैजान मुस्तफा की मुसलमानों को बड़ी तस्वीर देखने की सलाह

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 18-05-2026
Faizan Mustafa Advises Muslims to Look at the Bigger Picture
Faizan Mustafa Advises Muslims to Look at the Bigger Picture

 

आवाज द वाॅयस/ नई दिल्ली

देश के चर्चित कानूनी विशेषज्ञ और शिक्षाविद फैजान मुस्तफा एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह बनी है मस्जिद विवादों, बाबरी मस्जिद फैसले और पूजा स्थल अधिनियम 1991 को लेकर उनकी खुली राय। दिल्ली में हाल ही में आयोजित जमीयत उलेमा ए हिंद के एक कार्यक्रम में उनके विचारों ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों के बीच तीखी बहस छेड़ दी।

कार्यक्रम में बाबरी मस्जिद अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा से जुड़ी एक रिपोर्ट पेश की गई थी। इस रिपोर्ट को लेकर जमीयत के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि इसका उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाना है कि बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने किस तरह का विवादास्पद फैसला दिया था।

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हालांकि इस रिपोर्ट पर फैजान मुस्तफा ने गंभीर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि रिपोर्ट में कुछ जगह ऐसी भाषा इस्तेमाल की गई है जिससे अदालत की अवमानना का मामला बन सकता है। इसी मुद्दे पर कार्यक्रम के दौरान मंच से ही बहस शुरू हो गई।

फैजान मुस्तफा ने बाद में अपने यूट्यूब चैनल “लीगल अवेयरनेस वेब सीरीज” पर इस पूरे मामले को लेकर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को सबसे पहले अपने नागरिक अधिकारों और संवैधानिक सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए। उनके अनुसार लंबे समय तक चलने वाले धार्मिक मुकदमों में उलझने से समाज में तनाव बढ़ता है और इसका फायदा नफरत फैलाने वाली ताकतों को मिलता है।

उन्होंने कहा कि जिन मस्जिदों को लेकर ऐतिहासिक विवाद मौजूद हैं और जहां मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाए जाने के दावे सामने आते हैं, वहां अदालतों के बाहर समाधान तलाशने की कोशिश होनी चाहिए। उनके मुताबिक ऐसे रास्ते निकाले जाने चाहिए जिनमें दोनों पक्ष सम्मान के साथ आगे बढ़ सकें।

फैजान मुस्तफा ने पूजा स्थल अधिनियम 1991 पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस कानून को अदालत में चुनौती मिल सकती है। उनका तर्क था कि किसी भी कानून में न्यायिक समीक्षा को सीमित करना अदालतों के लिए संवैधानिक सवाल खड़ा कर सकता है।

उन्होंने हालिया भोजशाला मामले का जिक्र करते हुए कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई द्वारा संरक्षित मस्जिदें इस कानून के दायरे से बाहर मानी जा सकती हैं। यही वजह है कि आने वाले समय में कई धार्मिक स्थलों को लेकर नए कानूनी विवाद खड़े हो सकते हैं।

कार्यक्रम में मौजूद कुछ वक्ताओं ने फैजान मुस्तफा की राय से असहमति जताई। उनका कहना था कि मुसलमानों को अपने धार्मिक अधिकारों के सवाल पर पीछे नहीं हटना चाहिए। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि बाबरी मस्जिद मुकदमे को पूरी मजबूती के साथ नहीं लड़ा गया।

इस पर जवाब देते हुए फैजान मुस्तफा ने कहा कि हर लड़ाई अदालत में जीतना ही समाधान नहीं होता। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को भी समझना होगा। अगर समाज में लगातार ध्रुवीकरण बढ़ेगा तो इसका असर पूरे देश पर पड़ेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि आज जरूरत समाज में भरोसा और संवाद बढ़ाने की है। उनके मुताबिक नफरत और टकराव की राजनीति से किसी समुदाय को स्थायी फायदा नहीं मिलता।

सुप्रीम कोर्ट को लेकर की जा रही तीखी आलोचनाओं पर भी फैजान मुस्तफा ने अलग राय रखी। उन्होंने कहा कि अदालतों की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है लेकिन संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा बनाए रखना भी जरूरी है।

उन्होंने बाबरी मस्जिद फैसले के कुछ पहलुओं को मुसलमानों के लिए सकारात्मक बताया। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह नहीं माना कि किसी राम मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी। उन्होंने कहा कि इस तथ्य पर कम चर्चा होती है जबकि यह फैसले का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

फैजान मुस्तफा के इन बयानों के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस तेज हो गई है। कुछ लोग उनके विचारों को व्यावहारिक और समय के अनुसार जरूरी बता रहे हैं। उनका मानना है कि मौजूदा माहौल में अदालतों से बाहर समाधान और सामाजिक सौहार्द पर जोर देना समझदारी का रास्ता हो सकता है।

वहीं दूसरी ओर कई लोग इसे मुस्लिम पक्ष की कमजोरी के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि अगर धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों पर समझौते की बात होगी तो इससे समुदाय का मनोबल प्रभावित होगा।

राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि देश में बदलते माहौल के बीच मुस्लिम नेतृत्व के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। ज्ञानवापी, मथुरा और दूसरे धार्मिक स्थलों को लेकर चल रहे विवादों ने इस बहस को और गहरा कर दिया है।

ऐसे समय में फैजान मुस्तफा का अदालत से बाहर समाधान और सामाजिक शांति पर जोर देना एक अलग सोच के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि यह भी साफ है कि मुस्लिम समाज के भीतर इस मुद्दे पर अभी एक राय नहीं है।

दिल्ली के इस कार्यक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या धार्मिक विवादों का समाधान केवल अदालतों में संभव है या फिर समाज के भीतर संवाद और समझौते की नई राह तलाशनी होगी। आने वाले दिनों में यह बहस और तेज होने की संभावना है।