पनजथ गांव का नाम यहां मौजूद प्रसिद्ध जलस्रोत “पनजथ नाग” से जुड़ा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस नाग से 500 पौराणिक झरनों का पानी निकलता है। यही वजह है कि इस जगह को धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से बेहद खास माना जाता है। हर साल गर्मियों की शुरुआत में गांव के लोग और आसपास के इलाकों से आए लोग एक साथ मिलकर इस झरने और उससे जुड़ी जलधाराओं की सफाई करते हैं। इसके साथ ही पारंपरिक तरीके से मछली पकड़ने का आयोजन भी होता है।
सुबह से ही गांव की पगडंडियों पर लोगों की भीड़ दिखाई देने लगती है। बुजुर्ग, युवा और बच्चे सब इस आयोजन का हिस्सा बनते हैं। कई लोग इसे अपने पूर्वजों की विरासत बताते हैं। गांव के निवासी बशीर अहमद कहते हैं कि यह केवल मछली पकड़ने का त्योहार नहीं है। इसका असली मकसद पानी को साफ रखना है। वे बताते हैं कि साल भर झरनों में उगने वाली घास और जमा होने वाली गंदगी पानी के बहाव को प्रभावित करती है। इसलिए लोग मिलकर इसे साफ करते हैं ताकि पानी का प्राकृतिक प्रवाह बना रहे।
पनजथ नाग का पानी पूरे इलाके के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। स्थानीय लोग पीने के पानी से लेकर खेती तक के लिए इस पर निर्भर हैं। यही कारण है कि इस उत्सव को पर्यावरण संरक्षण से भी जोड़ा जाता है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले यह आयोजन और भी बड़े स्तर पर होता था। उस समय लोग इसे सामाजिक जिम्मेदारी की तरह निभाते थे। अब नई पीढ़ी भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है।
उत्सव के दौरान एक दिलचस्प दृश्य देखने को मिलता है। लोग पानी में उतरकर हाथों से या छोटे जालों की मदद से मछलियां पकड़ते हैं। बच्चों में इसे लेकर खास उत्साह दिखाई देता है। कई परिवार इस दिन को एक त्योहार की तरह मनाते हैं। महिलाएं घरों में पारंपरिक भोजन तैयार करती हैं और दूर-दूर से आए मेहमानों का स्वागत किया जाता है।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बदलते दौर में इस तरह के आयोजन बहुत जरूरी हो गए हैं। कश्मीर में कई प्राकृतिक जलस्रोत धीरे-धीरे सिकुड़ रहे हैं। प्रदूषण और लापरवाही के कारण कई झरनों का अस्तित्व खतरे में है। ऐसे में पनजथ का यह आयोजन लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का भी काम करता है।
दिलचस्प बात यह है कि कश्मीर का यह उत्सव देश के दूसरे हिस्सों की परंपराओं से भी मेल खाता है। तमिलनाडु के मदुरै जिले में भी इसी तरह का एक सदियों पुराना मछली उत्सव मनाया जाता है। वहां मेलूर के पास कल्लंधिरी गांव में हजारों लोग पारंपरिक मछली पकड़ने के उत्सव में शामिल होते हैं। यह आयोजन गर्मियों की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। गांव के लोग मंदिर में पूजा करते हैं और अच्छी फसल तथा स्वस्थ जीवन की कामना करते हैं।
कश्मीर और तमिलनाडु के इन आयोजनों में भले ही भौगोलिक दूरी हो, लेकिन दोनों की भावना एक जैसी है। दोनों जगह लोग प्रकृति के साथ अपने रिश्ते को मजबूत करने के लिए इकट्ठा होते हैं। यह परंपरा केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। इसमें सामुदायिक एकता, जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन का संदेश भी छिपा है।
पनजथ उत्सव में शामिल कई युवाओं का कहना है कि मोबाइल और सोशल मीडिया के दौर में इस तरह के आयोजन लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। गांव के एक छात्र आदिल अहमद बताते हैं कि पहले उन्हें यह सिर्फ मछली पकड़ने का कार्यक्रम लगता था, लेकिन अब समझ आता है कि यह पानी और प्रकृति को बचाने की जिम्मेदारी भी है।
इस आयोजन में प्रशासन की ओर से भी सहयोग दिया जाता है। हालांकि स्थानीय लोग मानते हैं कि इस परंपरा को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर और प्रयास होने चाहिए। उनका कहना है कि अगर इस जगह को पर्यावरण पर्यटन से जोड़ा जाए तो यह पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन सकती है।
आज जब दुनिया जल संकट और पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझ रही है, तब पनजथ जैसे गांव उम्मीद की एक तस्वीर पेश करते हैं। यहां लोग बिना किसी बड़े अभियान या सरकारी नारे के, अपनी परंपरा के जरिए प्रकृति को बचाने का काम कर रहे हैं। यही इस उत्सव की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
पनजथ नाग का यह मछली उत्सव केवल एक वार्षिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि इंसान और प्रकृति के रिश्ते की जीवित कहानी है। यह याद दिलाता है कि अगर समाज मिलकर प्रयास करे, तो परंपरा भी पर्यावरण संरक्षण का मजबूत माध्यम बन सकती है।