मलिक असगर हाशमी
आपने अक्सर अखबारों में पढ़ा होगा कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया या किसी नामी यूनिवर्सिटी की कोचिंग से पढ़कर दर्जनों छात्र आईएएस और आईपीएस बन गए। इस बार भी जामिया के 35 से ज्यादा छात्रों ने यूपीएससी की परीक्षा में अपना परचम लहराया है। इन युवाओं की सफलता की चमक तो सबको दिखती है लेकिन इसके पीछे की जो बड़ी तैयारी और रणनीति है उस पर कम ही लोगों की नजर जाती है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन आला दर्जे के कोचिंग संस्थानों में छात्रों से एक रुपया भी नहीं लिया जाता। कोचिंग तो छोड़िए इन होनहारों के रहने और खाने का इंतजाम भी पूरी तरह मुफ्त होता है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह सब कैसे मुमकिन है? कौन है जो इन छात्रों के सपनों में निवेश कर रहा है?
'फायदे की बात' की इस दूसरी कड़ी में आज हम इसी खास सरकारी योजना की परतों को खोलेंगे। पहली कड़ी में हमने मुसलमानों के लिए टर्म लोन स्कीम पर चर्चा की थी। आज का मुद्दा शिक्षा और सरकारी नौकरी के उन दरवाजों से जुड़ा है जो पैसों की कमी के कारण अक्सर बंद रह जाते थे।
केंद्र सरकार का अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी मिलकर एक बेहद प्रभावी योजना चलाते हैं। इस योजना का मकसद अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी (नॉन-क्रीमी लेयर) और अल्पसंख्यक समुदाय के प्रतिभावान छात्रों को समाज की मुख्यधारा में लाना है।
यह सिर्फ एक कोचिंग क्लास नहीं है बल्कि एक ऐसा प्लेटफार्म है जो उन छात्रों को बराबरी का मौका देता है जिनके पास काबिलियत तो है लेकिन संसाधनों की कमी है। अक्सर देखा गया है कि दिल्ली जैसे शहरों में यूपीएससी की कोचिंग के नाम पर लाखों रुपये वसूले जाते हैं। ऐसे में गरीब या मध्यम वर्ग का छात्र चाहकर भी उन संस्थानों तक नहीं पहुंच पाता। सरकार की यह स्कीम इसी खाई को पाटने का काम कर रही है।
इस पूरी योजना को तीन अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया है ताकि छात्र की हर जरूरत पूरी हो सके। इसका पहला हिस्सा है उपचारात्मक कोचिंग यानी रिमेडियल कोचिंग। यह कोचिंग उन छात्रों के लिए है जो ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे हैं।
कई बार दूर-दराज के इलाकों से आने वाले छात्रों की भाषा पर पकड़ कम होती है या उन्हें बेसिक विषयों को समझने में दिक्कत आती है। रिमेडियल कोचिंग के जरिए उनकी भाषाई दक्षता और शैक्षणिक कौशल को सुधारा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि छात्र अपनी डिग्री के दौरान पीछे न छूट जाएं और उनके फेल होने या पढ़ाई छोड़ने की नौबत न आए। यहां उन्हें मनोवैज्ञानिक परामर्श भी दिया जाता है ताकि वे मानसिक रूप से मजबूत बन सकें।
योजना का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है सेवाओं में प्रवेश के लिए कोचिंग। यही वह हिस्सा है जिसने हाल के वर्षों में प्रशासनिक सेवाओं का चेहरा बदल दिया है। इसके तहत छात्रों को केंद्र और राज्य सरकार की ग्रुप ए, बी और सी की नौकरियों के लिए तैयार किया जाता है।
इसमें आईएएस, आईपीएस और बैंक भर्ती जैसी बड़ी परीक्षाएं शामिल हैं। विश्वविद्यालय अपने कैंपस में ही रोजगार सूचना सेल बनाते हैं। यहां छात्रों को न केवल पढ़ाया जाता है बल्कि उन्हें परीक्षाओं के बदलते पैटर्न और विशेष आवश्यकताओं के बारे में भी जानकारी दी जाती है। जामिया जैसी जगहों पर मिलने वाली सफलता इसी कोचिंग मॉडल का नतीजा है।
तीसरा हिस्सा उन युवाओं के लिए है जो शिक्षा के क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहते हैं। राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा यानी नेट और राज्य स्तरीय पात्रता परीक्षा यानी सेट के लिए विशेष कोचिंग दी जाती है। इसका मकसद यह है कि यूनिवर्सिटी सिस्टम में लेक्चरर बनने के लिए अल्पसंख्यक और पिछड़े समुदायों के पास पर्याप्त संख्या में योग्य उम्मीदवार हों। जब इन वर्गों के लोग शिक्षक बनेंगे तो आने वाली पीढ़ियां उनसे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ेंगी।
अब बात करते हैं कि इन संस्थानों को पैसा कहां से मिलता है। यूजीसी इन योजनाओं को चलाने के लिए यूनिवर्सिटी और कॉलेजों को मोटी आर्थिक मदद देता है। किसी भी योजना को शुरू करने के लिए संस्थान को किताबों, कंप्यूटर, प्रिंटर, जनरेटर और अन्य जरूरी सामानों के लिए पांच लाख रुपये तक का एकमुश्त अनुदान मिलता है।
इसके अलावा हर साल योजना को सुचारू रूप से चलाने के लिए सात लाख रुपये का आवर्ती अनुदान भी दिया जाता है। इस पैसे का इस्तेमाल शिक्षकों के मानदेय और कर्मचारियों के वेतन के लिए किया जाता है। खास बात यह है कि पढ़ाने वाले शिक्षकों को उनके समय के हिसाब से भुगतान किया जाता है। अगर कोई बड़ा शिक्षाविद विशेष लेक्चर देने आता है तो उन्हें अलग से सम्मान राशि दी जाती है।
इस योजना का लाभ उठाने के लिए कुछ जरूरी पात्रता शर्तें भी हैं। यह सुविधा उन यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में उपलब्ध है जो यूजीसी अधिनियम की धारा 2 (f) और 12 (B) के दायरे में आते हैं। जिन संस्थानों में पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों की संख्या अच्छी है उन्हें प्राथमिकता दी जाती है।
हालांकि सामान्य वर्ग के छात्र भी इसका लाभ उठा सकते हैं बशर्ते उनके पास गरीबी रेखा से नीचे यानी बीपीएल का कार्ड हो। अगर आरक्षित वर्गों के छात्र पर्याप्त संख्या में नहीं मिलते तो सामान्य वर्ग के गरीब छात्रों और ओबीसी छात्रों के लिए सीटों का कोटा 40 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है।
आवेदन की प्रक्रिया बहुत ही सरल और पारदर्शी है। छात्र को सीधे अपनी यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार या कॉलेज के प्रिंसिपल से संपर्क करना होता है। इसके लिए किसी ऑनलाइन उलझन में फंसने के बजाय सीधे संबंधित विभाग से आवेदन फॉर्म लिया जा सकता है।
फॉर्म भरते समय छात्र को अपनी सही जानकारी देनी होती है। आवेदन के साथ आधार कार्ड, जाति या समुदाय प्रमाण पत्र और अपनी पिछली कक्षाओं की मार्कशीट जैसे दस्तावेज लगाने होते हैं। एक बार आवेदन जमा होने और विभाग से सत्यापन होने के बाद छात्र मुफ्त कोचिंग का लाभ उठाना शुरू कर सकता है।
यह योजना केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है। यह एक सामाजिक बदलाव का औजार है। जब एक पिछड़े परिवार का बच्चा बिना किसी आर्थिक बोझ के कलेक्टर या पुलिस कप्तान बनता है तो वह पूरे समाज के लिए मिसाल बन जाता है।
सरकार का यह निवेश दरअसल देश के भविष्य में निवेश है। शिक्षा के प्रति बढ़ती यह जागरूकता और सरकारी मदद का सही तालमेल ही आज हमें जामिया या अन्य शिक्षण संस्थानों के नतीजों में देखने को मिल रहा है। अगर आप भी इन श्रेणियों में आते हैं और आपके पास बड़े सपने हैं तो आर्थिक तंगी को अपनी राह का रोड़ा मत बनने दीजिए। अपने पास की यूनिवर्सिटी में जाइए और इस योजना के बारे में पता कीजिए। सफलता का रास्ता अब आपके करीब है।
एक नजर में फायदे:
बिना किसी फीस के उच्च स्तरीय कोचिंग।
मुफ्त रहने और खाने की व्यवस्था (संस्थान के नियमों के अनुसार)।
विशेषज्ञों और अनुभवी शिक्षकों से सीधे सीखने का मौका।
लाइब्रेरी और कंप्यूटर लैब जैसी आधुनिक सुविधाओं तक पहुंच।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सटीक और जरूरी स्टडी मटेरियल।
जरूरी दस्तावेज:
पहचान के लिए आधार कार्ड।
आरक्षण के लिए जाति या समुदाय प्रमाण पत्र।
शैक्षणिक योग्यता के लिए पुरानी मार्कशीट।
बैंक खाते की जानकारी (यदि कोई छात्रवृत्ति का प्रावधान हो)।
यह योजना उन सभी के लिए एक सुनहरा मौका है जो मेहनत करने का जज्बा रखते हैं। सरकारी नीतियों का सही लाभ उठाकर ही देश का युवा वर्ग आगे बढ़ सकता है और राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सकता है।आशा है कि 'फायदे की बात' की यह जानकारी आपके करियर की दिशा बदलने में मददगार साबित होगी। अगली कड़ी में हम किसी और सरकारी योजना की बारीकियों पर चर्चा करेंगे।