श्रीलता
जब भी देश में 'बेटी बचाओ', 'आंगनवाड़ी योजना' या ग्रामीण रोजगार गारंटी जैसी बड़ी कल्याणकारी योजनाओं का नाम लिया जाता है तो अक्सर लोग उनके पीछे की कड़ी मेहनत को नहीं देख पाते। इन सरकारी घोषणाओं से पहले सालों तक जमीन पर रिसर्च की जाती है। नीतियां उन विद्वानों की रिपोर्ट से तय होती हैं जो उपेक्षित बस्तियों की धूल छानते हैं। वे जमीन के हालातों को कागजों पर दर्ज करते हैं और सरकार को सौंपते हैं। प्रोफेसर शाहिदा मुर्तजा एक ऐसी ही समर्पित अकादमिक शख्सियत रही हैं।
वह मानवविज्ञानी हैं। वह मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (मानू), हैदराबाद में सोशल साइंसेज की डीन और महिला अध्ययन विभाग की प्रोफेसर रह चुकी हैं। उन्होंने अपने जीवन के तीस से ज्यादा साल क्लासरूम और समाज के बीच आते-जाते गुजारे हैं।

उनका काम सिर्फ पढ़ाना नहीं था। उन्होंने जमीनी अध्ययन और नीति-उन्मुख शोध को मिलाकर देखा। उनका पूरा ध्यान समाज के सबसे वंचित तबकों विशेषकर तेलंगाना और कर्नाटक के मुस्लिम बहुल इलाकों की महिलाओं पर रहा।
मानव विज्ञान के क्षेत्र में उनका आना पहले से तय नहीं था। तत्कालीन आंध्र प्रदेश के महबूबनगर की रहने वाली शाहिदा की रुचि शुद्ध विज्ञान में थी। वह इसी क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती थीं। लेकिन परिस्थितियों ने उनकी राह बदल दी। गुलबर्गा में पोस्ट ग्रेजुएशन में दाखिले के दौरान विश्वविद्यालय के एक आंतरिक फैसले के कारण उन्हें एंथ्रोपोलॉजी यानी मानव विज्ञान विषय दे दिया गया।
प्रोफेसर शाहिदा कहती हैं कि इसी एक फैसले ने उनके जीवन की दिशा को हमेशा के लिए बदल दिया। मानव विज्ञान ने उन्हें उस विषय को गहराई से समझने का जरिया दिया जो उन्हें हमेशा से परेशान करता था। यह विषय था समाज में फैली असमानता, लाचारी और उन महिलाओं का खामोश दर्द जिनकी जिंदगी सरकारी आंकड़ों में कभी जगह नहीं पाती। उन्हें लगा कि अब उनके पास गरीबी और पिछड़ेपन के कारणों का अध्ययन करने का सीधा रास्ता है।
गुलबर्गा की लंबाडी आदिवासी कम्युनिटी के बीच किए गए शुरुआती फील्डवर्क ने उन्हें गरीबी का असली चेहरा दिखाया। उनके लिए गरीबी अब किताबों में लिखी कोई परिभाषा नहीं थी। यह लोगों का जिया जाने वाला एक कड़वा सच था। लोगों के जीवन की यह खोज और पिछड़ेपन के कारणों की पड़ताल उनके रिटायरमेंट तक लगातार चलती रही।
इन दशकों के दौरान वह ऐसे अनगिनत घरों में गईं जहां एक ही कमरे में बारह से तेरह लोग रहने को मजबूर थे। वह ऐसी महिलाओं से मिलीं जिन्हें गर्भनिरोधक साधनों की कोई जानकारी नहीं थी। उनके पास जन्म नियंत्रण को लेकर कोई जागरूकता नहीं थी।
उन्होंने उन बच्चियों से बात की जिनकी शादी महज तेरह या चौदह साल की उम्र में कर दी गई थी। उन्हें अनजान शहरों में भेज दिया गया था जहां वे आर्थिक रूप से पूरी तरह दूसरों पर निर्भर और सामाजिक रूप से बिल्कुल अकेली थीं। बार-बार होने वाला गर्भधारण उनके लिए कोई पसंद नहीं बल्कि एक मजबूरी था। इन हालातों को देखकर वह बहुत दुखी होती हैं। उनका मानना है कि आजादी के इतने सालों बाद भी इन लड़कियों की जिंदगी में जमीनी स्तर पर कुछ खास नहीं बदला है।
प्रोफेसर शाहिदा ने अपने कई सर्वेक्षणों में यही निष्कर्ष निकाले हैं। उन्होंने अपने पीएचडी शोध के दौरान यह सवाल उठाया था कि क्या मुस्लिम समाज में अधिक बच्चों को लेकर कोई खास धार्मिक नजरिया है। उन्होंने मुस्लिम बहुल इलाकों सहित विभिन्न समुदायों में कई सर्वे किए।
उनका आखिरी सर्वे उनके रिटायरमेंट से ठीक पहले का है। जब उनसे पूछा गया कि क्या मुस्लिम महिलाओं की स्थिति, बाल विवाह और ज्यादा बच्चों की संख्या का संबंध उनके धर्म से है तो उन्होंने बहुत स्पष्ट जवाब दिया। वह कहती हैं कि आस्था का विकास से कोई सीधा लेना-देना नहीं है।
वह इंसानों द्वारा बनाए गए भेदभावों को खारिज करती हैं। वह पूरी तरह से व्यावहारिक जांच पर भरोसा करती हैं। उनका मानना है कि इंसानों के बीच दिखने वाले अंतर उनके रहने के हालातों का नतीजा होते हैं। यदि आप किसी को भी उन्हीं कठिन परिस्थितियों में रखेंगे तो परिणाम बिल्कुल वैसा ही आएगा।
इन सभी सामाजिक बुराइयों और समस्याओं की सबसे बड़ी वजह वह महिलाओं के पास निर्णय लेने के अधिकार की कमी को मानती हैं। वह कहती हैं कि महिलाओं को खुद फैसले लेने की आजादी दी जानी चाहिए। इसके बाद बाकी सारे सुधार अपने आप होने लगेंगे।
उनके अनुसार यह सशक्तिकरण तीन चीजों से आता है। पहली चीज शिक्षा है। दूसरी चीज सरकारी सुविधाओं और योजनाओं की सही जानकारी है। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण चीज है सही उम्र में शादी होना। देश के सबसे पिछड़े इलाकों में रहने वाली औसत मुस्लिम महिला की लाचारी इन तीन चीजों की कमी के कारण ही है।
लड़कियों की शादी बहुत जल्दी कर दी जाती है। वे खामोशी से पुरुषों के फैसलों को स्वीकार कर लेती हैं। अपने शरीर पर भी उनका कोई नियंत्रण नहीं रहता। अनपढ़ होने के कारण उन्हें यह भी नहीं पता होता कि उनकी मदद के लिए कौन सी सरकारी योजनाएं मौजूद हैं। अगर उनके साथ घरेलू हिंसा होती है तो वे चुपचाप सहने के अलावा कुछ नहीं कर पातीं। इसलिए जागरूकता पैदा किए बिना गरीबों के लिए अनगिनत योजनाएं चलाना पूरी तरह से बेकार साबित होता है।
हाल ही में हैदराबाद के मुस्लिम बहुल इलाकों में किए गए एक फील्ड सर्वे में प्रोफेसर शाहिदा ने महिलाओं के लिए बनी कल्याणकारी योजनाओं और सुरक्षा प्रणालियों की हकीकत को परखा। उनके निष्कर्ष बेहद चौंकाने वाले थे। उन्हें पूरे सर्वे क्षेत्र में एक भी चालू वन स्टॉप सेंटर नहीं मिला।
ये केंद्र घरेलू हिंसा के मामलों को सुलझाने और पीड़ित महिलाओं को सहायता देने के लिए बनाए गए हैं। उन्हें उन इलाकों में महिलाओं के लिए कोई भी सक्रिय आजीविका कार्यक्रम चलता हुआ नहीं दिखा। महिलाओं के कल्याण के लिए बनी सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता फैलाने का कोई व्यवस्थित प्रयास भी जमीन पर नजर नहीं आया। वह कहती हैं कि आज ये तमाम बड़े प्रयास सिर्फ कागजों पर ही जिंदा दिखाई देते हैं।
हैदराबाद में जामा मस्जिद के पीछे बनी तंग बस्तियों में उन्होंने देखा कि एक-एक कमरे में दर्जनों लोग रह रहे हैं। ऐसे घरों में महिलाओं की प्राइवेसी पूरी तरह खत्म हो जाती है। माहवारी के दिनों में महिलाओं के पास अपने कपड़े सुखाने के लिए छत के अलावा कोई जगह नहीं होती।
कई महिलाओं ने उन्हें बताया कि उनके पास इस दौरान इस्तेमाल के लिए कोई साफ कपड़ा तक उपलब्ध नहीं है। वह जोर देकर कहती हैं कि यह स्थिति किसी धर्म की वजह से नहीं बल्कि भयंकर गरीबी के कारण है। इन वाक्यों ने उनके दिल पर गहरा असर छोड़ा है। वह भावुक होकर कहती हैं कि एक तरफ इंडिया शाइनिंग की बातें होती हैं और दूसरी तरफ लोग अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर हैं।
आंध्र प्रदेश के विभाजन से पहले उन्होंने हैदराबाद के आंगनवाड़ी केंद्रों का अध्ययन किया था। वहां उन्होंने देखा कि उर्दू बोलने वाले घरों के बच्चों को प्री-प्राइमरी स्तर पर तेलुगु माध्यम की किताबों से पढ़ाया जा रहा था। उन्होंने तुरंत संबंधित विभागों को इसकी जानकारी दी।
उन्होंने खुद किताबों का अनुवाद करवाया और उन्हें इस्तेमाल के लिए विभाग को सौंप दिया। लेकिन दुख की बात यह रही कि उन सामग्रियों को कभी बच्चों के बीच बांटा ही नहीं गया। कुछ केंद्रों पर बच्चों का नामांकन सिर्फ कागजों पर ही था।
उनकी अधिकांश रिपोर्टों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और उन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अपने पूरे करियर में उन्होंने सरकारी विभागों को नीति निर्धारण के लिए कई महत्वपूर्ण शोध रिपोर्ट सौंपीं। इनमें से कुछ रिपोर्ट बेहद गोपनीय थीं। लेकिन अधिकांश मामलों में उन्हें कभी कोई फीडबैक नहीं मिला। वह कहती हैं कि रिपोर्ट सौंपने के बाद सरकार की तरफ से कोई जवाब न आना बेहद निराशाजनक होता है।
वह पिछले कुछ सालों में सरकारी प्राथमिकताओं में आए बदलाव को भी रेखांकित करती हैं। उनका मानना है कि पिछले दशक में अल्पसंख्यक शिक्षा के क्षेत्र में किए गए प्रयासों से पैर पीछे खींचे गए हैं। अल्पसंख्यक छात्रों के लिए मिलने वाली 35हजार रुपये की मासिक रिसर्च स्कॉलरशिप को बंद कर दिया गया है।
इसके साथ ही अल्पसंख्यक संस्थानों को मिलने वाले फंड में भी कटौती की गई है। पहले विश्वविद्यालय अपने स्तर पर छात्रों को हर महीने छोटी आर्थिक मदद दे पाते थे। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि संस्थानों के पास सिर्फ वेतन देने का बजट ही बचता है।
इन तमाम चुनौतियों और असफलताओं के बावजूद उन्होंने हमेशा विश्वविद्यालय और समाज के बीच की दूरी को पाटने का प्रयास किया। साल 2004में उन्होंने एक बेहतरीन मॉडल का प्रस्ताव रखा था। इसके तहत विश्वविद्यालयों को सरकारी नीतियों और आम जनता के बीच एक माध्यम के रूप में काम करना था।
इसके जरिए गांवों को गोद लेना, वहां जागरूकता फैलाना और ग्रामीण समुदायों को डिजिटल माध्यमों से जोड़ना तय हुआ था। शुरुआत में इसके लिए यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन यानी यूजीसी की तरफ से फंड का वादा किया गया था। कुछ पैसे जारी भी हुए और गांवों में कंप्यूटर भी लगाए गए। लेकिन बाद में यूजीसी ने अपने हाथ पीछे खींच लिए और इस बेहतरीन योजना को बीच में ही बंद करना पड़ा।
वह अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि कैसे उन्होंने कर्नाटक में अपने कॉलेज के पास एक गांव में महिलाओं का एक स्वयं सहायता समूह बनाया था। उन्होंने इसका नाम 'कात्यायनी महिला मंडल' रखा था। यह कर्नाटक का पहला डीडब्ल्यूसीआरए (DWCRA) प्रोजेक्ट बना।
यह ग्रामीण विकास मंत्रालय का गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम था। शाहिदा उन महिलाओं को खुद पढ़ाती थीं। उन्होंने उनके लिए मसाला पीसने की मशीन खरीदी और अपने घर में ही उनके साथ बैठकें आयोजित कीं। उन महिलाओं ने आटा और मसाले के पैकेट बनाने शुरू किए। शाहिदा खुद उन सामानों को कॉलेज के हॉस्टल की रसोई और दूसरी जगहों पर बेचने जाती थीं। उन प्रयासों से ग्रामीण महिलाओं की कमाई शुरू हुई जो उनके लिए बेहद गर्व का पल था।
उन्होंने विश्वविद्यालय के महिला शिक्षा विभाग में सालों तक अध्यापन का कार्य किया। लेकिन उनके लिए पढ़ाना कभी भी सिर्फ एक नौकरी नहीं रहा। वह कहती हैं कि वह क्लास में कभी किताबें लेकर नहीं गईं। उन्होंने हमेशा महिलाओं के असली अनुभवों से छात्रों को पढ़ाया।
उनके लिए क्लासरूम सिर्फ सिलेबस पूरा करने की जगह नहीं थी बल्कि वह युवा दिमागों को जगाने का एक जरिया था। वह दुख के साथ कहती हैं कि आज लोग संवेदनशीलता जगाने के लिए नहीं बल्कि सिर्फ आजीविका कमाने के लिए पढ़ा रहे हैं।
उनका मानना है कि पढ़ाई के सिलेबस की कोई बंदिश नहीं होनी चाहिए। वह युवा छात्राओं को समाज की कड़वी हकीकत दिखाना चाहती थीं ताकि वे खुद घर-घर जाकर लोगों के जीवन का अध्ययन करें। जब युवा लड़कियां बाल विवाह, अशिक्षा और अत्यधिक बच्चे पैदा करने की मजबूरी को अपनी आंखों से देखेंगी तो वे स्थिति को समझने के लिए धर्म या समुदाय का चश्मा इस्तेमाल नहीं करेंगी।

उन्होंने तेलंगाना और कर्नाटक के आदिवासी इलाकों, शहरी झुग्गियों, अल्पसंख्यक बस्तियों और पिछड़े वर्ग के समुदायों में एक ही जैसा सामाजिक पैटर्न देखा है। वह पैटर्न है कम उम्र में शादी, अधूरी पढ़ाई, आर्थिक निर्भरता और अपने अधिकारों के प्रति अज्ञानता।
जगह बदल जाती है पर महिलाओं के हालात नहीं बदलते। तीन दशकों की लंबी रिसर्च और शिक्षण के बाद आज वह मानती हैं कि जमीन पर बहुत कम बदलाव आया है। ऐसा लगता है कि देश की आजादी का इन गरीब महिलाओं के जीवन पर कोई असर नहीं पड़ा है।
सरकारें बदलती रहीं और नई योजनाएं आती रहीं लेकिन जो इसके असली हकदार थे वे आज भी जानकारी के अभाव में समाज से कटे हुए हैं। नीतियों और आम जनता के बीच इस बड़ी खाई को पाटना अभी बाकी है। प्रोफेसर शाहिदा मुर्तजा अपनी पूरी जिंदगी की सीख को केवल एक शब्द में समेट देती हैं और वह शब्द है 'एजेंसी' यानी महिला का अपने जीवन पर खुद का अधिकार। वह कहती हैं कि जिस दिन महिला को उसके फैसले लेने का अधिकार मिल जाएगा उस दिन समाज की आधी से ज्यादा कमियां अपने आप दूर हो जाएंगी।