वसुधैव कुटुंबकम और अल्लाह का कुनबा: एक ही संदेश

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 17-05-2026
Vasudhaiva Kutumbakam and Allah's Family: One and the Same Message
Vasudhaiva Kutumbakam and Allah's Family: One and the Same Message

 

डॉक्टर मोहम्मद अहमद नईमी

आज के दौर में जब दुनिया अक्सर वैचारिक मतभेदों और अशांति के दौर से गुजर रही है, तब मजहबों के मूल संदेश को समझना बेहद जरूरी हो जाता है। जामिया हमदर्द विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के इस्लामिक स्टडीज विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद अहमद नईमी का एक शोधपरक आलेख इस दिशा में एक नई रोशनी दिखाता है। उनका यह विचार एक ऐसे समाज की नींव रखता है जहां नफरत के लिए कोई जगह नहीं है। डॉ. नईमी का स्पष्ट मानना है कि इस्लाम और हिंदू धर्म दोनों की बुनियाद मानवता, प्रेम, करुणा और क्षमा पर टिकी है। दोनों ही धर्म इंसान को इंसान से जोड़ने का काम करते हैं, तोड़ने का नहीं।

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दिल की दुनिया पर विजय: लोहे की नहीं, अखलाक की तलवार

अक्सर एक बहुत भ्रामक और गलत धारणा समाज में फैलाई जाती है कि इस्लाम का प्रसार तलवार के बल पर हुआ है। डॉ. नईमी इस विचार का पुरजोर खंडन करते हैं। वे कहते हैं कि इस्लाम जरूर तलवार के जोर से फैला है, लेकिन वह तलवार लोहे की नहीं थी।

वह सदाचार, उत्तम व्यवहार और बेहतरीन अखलाक की तलवार थी। इतिहास गवाह है कि लोहे की तलवार के डर से किसी का सिर तो झुकाया जा सकता है, लेकिन किसी का दिल नहीं जीता जा सकता। इस्लाम ने सबसे पहले लोगों के दिलों की दुनिया पर विजय प्राप्त की थी। जब लोगों के दिल जीत लिए गए, तो सिर सम्मान में अपने आप झुकते चले गए।

पैगंबरे इस्लाम हजरत मोहम्मद साहब ने कभी भी युद्ध या हिंसा को पसंद नहीं किया। उन्हें केवल सत्य धर्म, अपने अनुयायियों और अपनी सुरक्षा के लिए बेहद मजबूरन परिस्थितियों में तलवार उठानी पड़ी थी। अपने जान, माल और धर्म की रक्षा के लिए हथियार उठाना कोई गुनाह नहीं है।

इसके सैकड़ों उदाहरण दुनिया के हर धर्म में मौजूद हैं। प्रसिद्ध विद्वान पंडित सुंदरलाल ने भी अपनी पुस्तक 'इस्लाम और हजरत मोहम्मद' में इसी बात का समर्थन किया है। इस्लामिक आदेश बहुत साफ है कि लड़ाई की इजाजत सिर्फ उन लोगों को है जिन पर युद्ध जबरन थोपा गया हो या जिन पर अत्याचार किया जा रहा हो।

इसलिए यह कहना पूरी तरह बेबुनियाद है कि इस्लाम हिंसा से फैला। पैगंबर साहब की तलवार कभी किसी बेकसूर इंसान पर नहीं उठी। वह तलवार अज्ञानता, अत्याचार और अशांति के खिलाफ उठी थी। वह तलवार वास्तव में एकता, ज्ञान और मानवता की रक्षक थी।

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इस्लाम का मूल संदेश: विश्व भाईचारा और शांति

इस्लाम धर्म का सबसे महत्वपूर्ण संदेश पूरी दुनिया के लिए भाईचारे का संदेश है। यह संपूर्ण संसार को मानवीय एकता, सुरक्षा और शांति का पैगाम देता है। इस्लाम की दृष्टि में सभी मनुष्यों का लक्ष्य एक ही है क्योंकि सभी मानव एक ही ईश्वर की संतान हैं।

वही सबका सृष्टिकर्ता, रक्षक और पालनहार है। इस्लाम का गहराई से अध्ययन करने पर पता चलता है कि इसमें हिंसा को पूरी तरह नकारा गया है और अहिंसा को सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है। इस्लाम पूरी मानव जाति को संबोधित करते हुए कहता है कि इस दुनिया में दंगा-फसाद मत करो। आपस में झगड़े बंद करो। न तुम किसी पर जुल्म करो और न कोई तुम पर जुल्म करे।

पवित्र कुरान की शिक्षाएं इस बात की गवाह हैं। इस्लाम के अनुसार जिसने किसी एक बेगुनाह की जान बचाई, उसने मानो पूरी इंसानियत को जीवनदान दे दिया। इसके विपरीत जिसने किसी का नाहक खून किया या किसी बेगुनाह का कत्ल किया, उसका पाप ऐसा ही है जैसे उसने पूरी मानव जाति की हत्या कर दी हो।

इस्लाम में उन लोगों को सबसे बुरा माना गया है जो समाज में अनेकता और नफरत फैलाते हैं। जो लोग उन रिश्तों और संबंधों को तोड़ते हैं जिन्हें जोड़े रखने का ईश्वर ने हुक्म दिया है, वे बड़े पापी हैं। इसके विपरीत, इस्लाम उन लोगों की खुलकर तारीफ करता है जो अक्रोधी होते हैं।

जो लोग अपने गुस्से को पी जाते हैं और अपराधियों को क्षमा करके सही रास्ते पर लाते हैं, वे सर्वश्रेष्ठ हैं। जिनमें प्रतिशोध की भावना नहीं होती और जो बुराई का बदला भलाई से देने का हौसला रखते हैं, इस्लाम उन्हें सबसे महान मानता है। दूसरों की कामयाबी देखकर जलन रखना इस्लाम में मना है। इस्लाम एक बेहद सहनशील धर्म है। इसमें लड़ाई, दंगा, अय्याशी और आवारगी के लिए कोई स्थान नहीं है।

पैगंबर साहब ने हर व्यक्ति से अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया है, चाहे वह किसी भी धर्म का हो। उन्होंने साफ कहा है कि इंसान इंसान का भाई है। उनका एक बहुत मशहूर कथन है कि तुम जमीन वालों पर दया करो, आसमान वाला तुम पर दया करेगा।

जो लोगों पर रहम नहीं करता, ईश्वर भी उस पर रहम नहीं करता। पैगंबर साहब ने पूरी सृष्टि को अल्लाह का कुनबा यानी परिवार बताया है। ईश्वर को अपने इस परिवार में वह व्यक्ति सबसे ज्यादा प्यारा है जो दूसरों के साथ सबसे अच्छा बर्ताव करता है। जब तक हमारे दिल में पूरी इंसानियत के लिए भलाई की भावना न हो, तब तक कोई पूरा मोमिन या सच्चा इंसान नहीं बन सकता।

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प्राचीन हिंदू धर्मशास्त्र: एकता और विश्व बंधुत्व का आधार

डॉ. नईमी अपने विमर्श को आगे बढ़ाते हुए प्राचीन हिंदू धर्मशास्त्रों का हवाला देते हैं। वे बताते हैं कि हिंदू धर्म के अनुसार भी सामाजिक संगठन की असली बुनियाद एकता और भाईचारा ही है। इसी भावना के जरिए समाज के अलग-अलग लोगों को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।

समाज में जब तक आपसी एकता, मोहब्बत और हमदर्दी नहीं होगी, तब तक तरक्की मुमकिन नहीं है। इसी वजह से वेदों और पुराणों में आपसी प्रेम और करुणा पर बहुत जोर दिया गया है। हिंदू धर्मग्रंथ कहते हैं कि हर मनुष्य दूसरे मनुष्य की रक्षा करे और उसे मुसीबत से बचाए।

ऋग्वेद का एक मंत्र कहता है कि एक दूसरे की हमेशा रक्षा करना और मदद करना इंसानों का मुख्य कर्तव्य है। यजुर्वेद में प्रार्थना की गई है कि मैं सभी प्राणियों को मित्र की आंख से देखूं और हम सब आपस में एक दूसरे को दोस्त की नजर से देखें। अथर्ववेद में भी यही संदेश है कि पूरा संसार हमारा दोस्त हो और दुनिया के सारे जीव हमारे मित्र हों। वेदों की यह शिक्षा हमें सिखाती है कि हमारी सोच एक हो, हमारे दिल एक हों और हमारा मन भी एक हो।

अथर्ववेद का एक और सुंदर मंत्र कहता है कि ईश्वर इंसानों के बीच प्रेम और सहमति पैदा करता है। जिस तरह गाय अपने नए जन्मे बछड़े से प्यार करती है, उसी तरह मनुष्यों को भी आपस में प्रेम रखना चाहिए। ऋग्वेद साफ शब्दों में घोषणा करता है कि इंसानों में न तो कोई बड़ा है और न ही कोई छोटा है, आपस में सब भाई-भाई हैं। जब सबके संकल्प और दिल एक जैसे होंगे, तो समाज का संगठन बहुत मजबूत होगा।

वेदों के अलावा अन्य ग्रंथों में भी यही बात मिलती है। योगवशिष्ठ में कहा गया है कि संसार के सारे कष्टों को मिटाने के लिए दूसरों की भलाई करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। भगवद् गीता का अनमोल वचन है कि जो किसी भी जीव से द्वेष नहीं करता, वही सबका सच्चा दोस्त और दयावान है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है कि दूसरों की भलाई से बढ़कर कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दुख पहुंचाने से बढ़कर कोई नीच काम नहीं है। जिनके दिल में दूसरों का भला बसा है, उनके लिए दुनिया में कुछ भी मुश्किल नहीं है। मनुस्मृति भी यही उपदेश देती है कि इंसान खुद दुखी होकर भी किसी दूसरे का दिल न दुखाए और ऐसी बात न बोले जिससे दूसरों को ठेस पहुंचे।

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दया, करुणा और अहिंसा का अटूट संगम

दोनों धर्मों का यह साझा संदेश साबित करता है कि इंसान या जानवर किसी को भी तकलीफ न पहुंचाना हमारा सबसे बड़ा नैतिक कर्तव्य है। महाभारत के शांतिपर्व में साफ लिखा है कि अहिंसा सबसे श्रेष्ठ धर्म है। दया सबसे बड़ी पूजा है और दया ही सबसे बड़ा सत्य है क्योंकि इसी से धर्म आगे बढ़ता है।

महाभारत में यह भी कहा गया है कि दुनिया में अपनी जान से प्यारी कोई चीज नहीं है, इसलिए इंसान जैसे अपने लिए दया चाहता है, वैसी ही दया वह दूसरों पर भी करे। अत्रि स्मृति कहती है कि अपना हो या पराया, दोस्त हो या दुश्मन, जो भी मुसीबत में हो, उसकी रक्षा करना ही सच्ची करुणा है।

दिलचस्प बात यह है कि यही संदेश इस्लाम भी हूबहू देता है। पवित्र कुरान कहता है कि नेकी और भलाई के कामों में एक दूसरे की मदद करो, लेकिन जुल्म और पाप में किसी का साथ मत दो। अल्लाह उस वक्त तक अपने बंदे की मदद करता है जब तक वह अपने किसी भाई की मदद में लगा रहता है। पैगंबर साहब ने फरमाया है कि वह इंसान हममें से नहीं है जो हमारे छोटों पर दया न करे और बड़ों का आदर न करे।

कुरान में जुल्म करने वालों के लिए सख्त चेतावनी है। पैगंबर साहब ने एक बहुत ही सुंदर बात कही है कि अपने भाई की मदद करो, चाहे वह जालिम हो या मजलूम। जब उनके साथियों ने पूछा कि जालिम की मदद कैसे की जाए, तो पैगंबर साहब ने जवाब दिया कि जालिम को जुल्म करने से रोक दो, यही उसकी सबसे बड़ी मदद है। अगर समाज में जुल्म को नहीं रोका जाएगा, तो अपराधियों के हौसले बढ़ेंगे और पूरे समाज का सुकून बर्बाद हो जाएगा।

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क्षमा का आभूषण

क्षमा यानी माफी को दोनों ही धर्मों में इंसान का सबसे बड़ा गुण बताया गया है। वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि पुरुषों और महिलाओं का अगर कोई असली आभूषण है, तो वह क्षमा ही है। क्षमा ही दान है, क्षमा ही सत्य है, क्षमा ही धर्म है और यह पूरी दुनिया क्षमा के सहारे ही टिकी है।

रामायण में उन लोगों को महान बताया गया है जो अपने गुस्से को वैसे ही बुझा देते हैं जैसे पानी जलती हुई आग को बुझा देता है। महाभारत भी कहता है कि लालच से गुस्सा पैदा होता है और दूसरों के दोष देखने से बढ़ता है, लेकिन क्षमा करने से गुस्सा हमेशा के लिए शांत हो जाता है।

ठीक इसी तरह, इस्लाम में भी माफ करने और गुस्से को पी जाने की बहुत बड़ी फजीलत बताई गई है। पवित्र कुरान आदेश देता है कि लोगों को चाहिए कि वे दूसरों को माफ करें और उनकी गलतियों को नजरअंदाज करें। कुरान कहता है कि गुस्सा पीने वालों और माफ करने वालों को अल्लाह बहुत पसंद करता है। पैगंबर साहब का कथन है कि जो व्यक्ति किसी को माफ करता है, अल्लाह दुनिया और आखिरत में उसका मान-सम्मान और बढ़ा देता है। तुम दूसरों को माफ करो, ईश्वर तुम्हें माफ कर देगा।

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'वसुधैव कुटुंबकम' और 'अल्लाह का कुनबा'

डॉ. मोहम्मद अहमद नईमी का यह तुलनात्मक अध्ययन हमें एक बहुत ही खूबसूरत नतीजे पर ले जाता है। प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों ने 'वसुधैव कुटुंबकम' यानी पूरी धरती को एक परिवार मानकर इंसानियत को एकता की डोर में बांधने का प्रयास किया। वहीं इस्लाम ने पूरी सृष्टि को 'अल्लाह का कुनबा' कहकर बिल्कुल यही संदेश दोहराया।

दोनों धर्मों का मूल सार एक ही है। दोनों ही मजहब नफरत, हिंसा, कट्टरता और अत्याचार के खिलाफ हैं। आज जरूरत इस बात की है कि हम सतही बातों और राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठकर अपने धर्मों की इन मूल और पवित्र शिक्षाओं को समझें। जब हम एक दूसरे के धर्म की इन अच्छाइयों को जानेंगे, तो समाज से नफरत का अंधेरा अपने आप छट जाएगा और चारों तरफ प्रेम, करुणा और भाईचारे का उजाला फैल जाएगा। सच्चा धार्मिक वही है जो पूरी मानवता से प्रेम करे।

( डॉक्टर मोहम्मद अहमद नईमी,असिस्टेंट प्रोफेसर डिपार्टमेंट ऑफ इस्लामिक स्टडीज, जामिया हमदर्द,नई दिल्ली)