अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के अवसर पर आयोजित एक विशेष संवाद में प्रसिद्ध इतिहासकार दानिश मोईन (MANUU, हैदराबाद के इतिहास विभाग में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं) ने भारतीय इतिहास, संग्रहालयों की भूमिका और विशेष रूप से मुगलकालीन सिक्कों की धर्मनिरपेक्ष एवं समावेशी प्रकृति पर आवाज द वॉयस की संवाददाता ओनिका माहेश्वरी के साथ विस्तार से चर्चा की। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि भारतीय सिक्के केवल आर्थिक लेन-देन का माध्यम नहीं रहे, बल्कि वे अपने समय की राजनीति, संस्कृति, तकनीक, धार्मिक विचारधारा और सामाजिक संरचना के सबसे प्रमाणिक दस्तावेज भी हैं।
प्रश्न: सबसे पहले हम जानना चाहेंगे कि International Day of Museums का उद्देश्य क्या है और 2026 की थीम क्या है?
उत्तर: दानिश मोईन ने बताया कि वर्ष 1977 में International Council of Museums ने यह निर्णय लिया था कि विश्व स्तर पर संग्रहालयों के महत्व को बढ़ाने और लोगों को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने के लिए International Museum Day मनाया जाएगा। इसके बाद से हर वर्ष 18 मई को यह दिवस मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि इसका मूल उद्देश्य अलग-अलग देशों और समाजों के बीच सांस्कृतिक संवाद स्थापित करना है ताकि लोग एक-दूसरे की सभ्यता, विरासत और परंपराओं को समझ सकें।
उन्होंने कहा कि 2026 की थीम समावेशी विश्व यानी “inclusive world” की अवधारणा पर आधारित है, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि कोई भी समाज, संस्कृति या समुदाय खुद को अलग-थलग महसूस न करे। दुनिया की सांस्कृतिक विरासत केवल किसी एक देश की नहीं बल्कि पूरी मानवता की साझा धरोहर है और उसे संरक्षित करना सबकी जिम्मेदारी है।
प्रश्न: आपने मध्यकालीन भारतीय सिक्कों पर वर्षों तक शोध किया है। इस विषय ने आपको कैसे आकर्षित किया?
उत्तर: उन्होंने बताया कि अकादमिक जीवन में हर इतिहासकार को अपना एक विशेष क्षेत्र चुनना पड़ता है। कोई प्राचीन इतिहास पर काम करता है, कोई पुरातत्व पर, कोई अभिलेखों पर और कोई फारसी या संस्कृत दस्तावेजों पर। उन्हें numismatics यानी सिक्का अध्ययन का क्षेत्र इसलिए मिला क्योंकि उनकी पहली नौकरी Indian Institute of Research in Numismatic Studies में लगी, जो उस समय भारत का सबसे बड़ा और प्रमुख मुद्रा-अध्ययन केंद्र था।
उन्होंने कहा कि वहीं से उनकी पूरी training शुरू हुई। उन्होंने न केवल स्वयं शोध किया बल्कि अनेक प्रशिक्षण कार्यक्रमों का संचालन भी किया। नासिक में short-term training courses आयोजित किए गए जिनके माध्यम से बड़ी संख्या में छात्रों और शोधकर्ताओं को numismatics की शिक्षा दी गई। उन्होंने बताया कि आज भी यह प्रशिक्षण कार्यक्रम जारी हैं।
प्रश्न: अक्सर कहा जाता है कि इतिहास केवल किताबों में नहीं बल्कि सिक्कों में भी होता है। इस पर आपका क्या कहना है?
उत्तर: इतिहासकार ने कहा कि इतिहास को हमेशा evidence यानी प्रमाण के आधार पर पढ़ना चाहिए। कोई भी दावा तभी महत्वपूर्ण माना जाता है जब उसके पीछे ठोस साक्ष्य हों। सिक्के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण primary sources यानी प्राथमिक स्रोतों में गिने जाते हैं क्योंकि वे सीधे उस काल से जुड़े होते हैं।
उन्होंने कहा कि जब हम गुप्तकाल, कुषाणकाल या मुगलकाल के सिक्कों को देखते हैं तो हमें उस समय की राजनीतिक सत्ता, आर्थिक व्यवस्था, तकनीकी विकास और धार्मिक प्रतीकों की वास्तविक जानकारी मिलती है। उन्होंने बताया कि भारत में छठी शताब्दी ईसा पूर्व यानी लगभग 2600 वर्ष पहले से सिक्कों का प्रचलन था। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज उस समय आर्थिक और तकनीकी रूप से काफी विकसित था।
उन्होंने कहा कि सिक्के केवल मुद्रा नहीं बल्कि technology, technique और आर्थिक सोच के प्रतीक हैं। उनसे यह समझा जा सकता है कि धातु का उपयोग कैसे किया गया, सिक्के बनाने की तकनीक क्या थी और समाज में money concept कैसे विकसित हुआ।

प्रश्न: मुगलकालीन सिक्कों में धार्मिक सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता किस प्रकार दिखाई देती है?
उत्तर: दानिश मोईन ने कहा कि भारतीय सिक्कों की परंपरा में धर्म हमेशा एक महत्वपूर्ण तत्व रहा है। यदि हम Indo-Greek coins को देखें तो उन पर यूनानी देवी-देवताओं की आकृतियां दिखाई देती हैं। कुषाणकाल में भगवान शिव के चित्र मिलते हैं और जब कनिष्क ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया तो गौतम बुद्ध की छवियां भी सिक्कों पर दिखाई देने लगीं।
उन्होंने कहा कि दिल्ली सल्तनत और मुस्लिम शासकों के सिक्कों पर इस्लामी कलमा अंकित किया जाता था क्योंकि वे इस्लाम के अनुयायी थे। लेकिन भारतीय परंपरा में धार्मिक विविधता के कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जो सांस्कृतिक समन्वय को दर्शाते हैं।
उन्होंने विशेष रूप से बताया कि मुहम्मद गोरी के सिक्कों पर देवी लक्ष्मी का चित्र अंकित था। इसी प्रकार अकबर ने अपने सिक्कों पर राम और सीता की छवियां अंकित करवाईं। हैदर अली ने शिव-पार्वती की आकृतियों वाले सिक्के जारी किए।
उन्होंने कहा कि ये उदाहरण यह साबित करते हैं कि भारतीय सिक्का परंपरा में धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक समावेश की मजबूत भावना मौजूद थी। सिक्के केवल धार्मिक प्रचार का माध्यम नहीं थे बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने का प्रतीक भी थे।
उन्होंने आगे कहा कि एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि भारतीय सिक्कों में धार्मिक inscriptions की परंपरा को समाप्त करने का काम सबसे पहले औरंगजेब ने किया। उन्होंने अपने सिक्कों पर न तो इस्लामी कलमा अंकित कराया और न ही किसी प्रकार का धार्मिक संदेश। उनके सिक्कों पर केवल उनका नाम और एक couplet लिखा होता था जिसमें शासन वर्ष और समृद्धि का उल्लेख किया जाता था।
इतिहासकार के अनुसार शाहजहां काल तक सिक्कों पर धार्मिक सूचनाएं एक परंपरा की तरह मौजूद थीं, लेकिन औरंगजेब के बाद यह परंपरा कमजोर पड़ गई।
मुगलकालीन सिक्के धार्मिक सहिष्णुता, उदारता और धर्मनिरपेक्षता के अद्भुत ऐतिहासिक दस्तावेज हैं। इन सिक्कों पर अरबी और फारसी के साथ-साथ हिंदू देवी-देवताओं, संस्कृत भाषा, और स्थानीय प्रतीकों का अंकन इस बात का प्रमाण है कि मुगल सम्राटों ने अपनी प्रजा की धार्मिक भावनाओं का सम्मान किया।

प्रश्न: दिल्ली सल्तनत और मुगलकालीन सिक्कों में मुख्य अंतर क्या था?
उत्तर: उन्होंने बताया कि दिल्ली सल्तनत काल में चार प्रकार की धातुओं के सिक्के चलते थे — gold, silver, copper और billon। Billon चांदी और तांबे का मिश्रित धातु था और आम जनता के बीच सबसे अधिक प्रचलित था। सोने के सिक्के केवल उच्च वर्ग तक सीमित थे।
मुगलों ने इस व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया। उन्होंने शेरशाह सूरी की मुद्रा प्रणाली को अपनाया और billon coins की जगह standard gold, silver और copper coins को व्यवस्थित रूप से चलाया।
उन्होंने बताया कि मुगलकाल में तांबे का भारी coin “दाम” कहलाता था जिसका वजन लगभग 20 ग्राम होता था। चांदी के सिक्के को “रुपया” कहा गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि “रुपया” शब्द संस्कृत के “रूप” शब्द से निकला है जिसका अर्थ चांदी से जुड़ा हुआ माना जाता है।
सोने के सिक्कों को “मुहर” और बाद में “अशर्फी” कहा गया।
उन्होंने कहा कि मुगलकालीन सिक्कों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता mint system था। सिक्कों पर उस स्थान का नाम स्पष्ट रूप से अंकित किया जाता था जहां उन्हें बनाया गया। दिल्ली, आगरा, सूरत, अजमेर, श्रीनगर और कश्मीर जैसी टकसालों के नाम सिक्कों पर मिलते हैं। इसे mint mark या हिंदी में टकसाल कहा जाता है।
उन्होंने बताया कि मुगलों ने dating system को भी अत्यंत व्यवस्थित बनाया। सिक्कों पर न केवल वर्ष लिखा जाता था बल्कि regnal year यानी शासनकाल का वर्ष भी अंकित किया जाता था।
प्रश्न: सिक्के राजनीतिक और आर्थिक इतिहास को समझने में किस प्रकार मदद करते हैं?
उत्तर: उन्होंने कहा कि सिक्कों ने भारतीय राजनीतिक इतिहास को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उदाहरण के तौर पर Indo-Greek rulers के बारे में लिखित स्रोतों में केवल 10-12 शासकों का उल्लेख मिलता था, लेकिन जब numismatics पर शोध हुआ तो लगभग 30-35 अलग-अलग शासकों के सिक्के मिले। इससे राजनीतिक chronology ही बदल गई।
इसी प्रकार सातवाहन काल के बारे में भी कई ऐसी जानकारियां सिक्कों से मिलीं जो किसी लिखित स्रोत में उपलब्ध नहीं थीं।
उन्होंने कहा कि मुगलकाल में इतिहासकार आइने अकबरी और अबुल फजल जैसे स्रोतों को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं, लेकिन कई ऐसी जानकारियां हैं जो वहां नहीं मिलतीं और केवल सिक्कों के माध्यम से सामने आती हैं।
उन्होंने कहा कि economy studies में coin circulation research अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। इससे यह समझा जाता है कि किस क्षेत्र में कौन-सी मुद्रा चल रही थी। उन्होंने अपने शोध का उदाहरण देते हुए कहा कि मुगलकाल में केवल मुगल सिक्के ही नहीं बल्कि मराठा, शिवाजी और निजामशाही के सिक्के भी circulation में मौजूद थे।
प्रश्न: भारत के संग्रहालयों में दुर्लभ सिक्कों के संरक्षण की वर्तमान स्थिति क्या है?
उत्तर: उन्होंने कहा कि भारत में सिक्कों की कोई कमी नहीं है और लगभग सभी बड़े संग्रहालयों के पास अत्यंत समृद्ध coin collections मौजूद हैं। National Museum, Indian Museum और लखनऊ संग्रहालय जैसे संस्थानों में दुर्लभ सिक्कों का विशाल संग्रह सुरक्षित है।
उन्होंने बताया कि संग्रहालयों में cataloguing का कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यदि किसी संग्रहालय के मुगल सिक्कों की catalog तैयार हो जाए तो शोधकर्ताओं और आम जनता दोनों को यह जानकारी आसानी से मिल सकती है कि वहां कौन-कौन से सिक्के मौजूद हैं।
उन्होंने कहा कि Indian Museum Kolkata, Lahore Museum और Lucknow Museum के कई catalog पहले ही तैयार किए जा चुके हैं, लेकिन भारत में अभी भी कई संग्रहालय ऐसे हैं जिनके coin catalog नहीं बने हैं।
प्रश्न: क्या युवाओं की इतिहास में रुचि कम हो रही है?
उत्तर: दानिश मोईन ने कहा कि समस्या इतिहास में नहीं बल्कि उसे पढ़ाने के तरीके में है। यदि शिक्षक रोचक और प्रमाण-आधारित तरीके से पढ़ाएं तो छात्रों की रुचि स्वतः बढ़ेगी।
उन्होंने कहा कि इतिहास को केवल कहानी की तरह नहीं पढ़ाना चाहिए बल्कि evidence के साथ पढ़ाना चाहिए। छात्रों को यह समझाना जरूरी है कि इतिहास जानना क्यों आवश्यक है और अपने समाज, परिवार और देश को समझने में इसकी क्या भूमिका है।
उन्होंने Jawaharlal Nehru University का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कुछ ऐसे शिक्षक थे जिनकी कक्षाओं में दूसरे विश्वविद्यालयों के छात्र भी बैठने आते थे क्योंकि उनका पढ़ाने का तरीका अत्यंत रोचक था।
प्रश्न: डिजिटल युग में virtual museums कितने उपयोगी हैं?
उत्तर: उन्होंने कहा कि virtual museums निश्चित रूप से उपयोगी हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो किसी संग्रहालय तक physically नहीं पहुंच सकते। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि वास्तविक संग्रहालय का अनुभव अलग होता है।
उन्होंने बताया कि आजकल संग्रहालयों में interactive machines, digital question-answer systems और आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है ताकि visitors का interest बढ़ सके।
उन्होंने tribal museums, science museums, war museums और money museums का उदाहरण देते हुए कहा कि अब संग्रहालयों का स्वरूप लगातार बदल रहा है। उन्होंने नासिक के Money Museum का उल्लेख किया जिसमें प्राचीन सिक्कों से लेकर modern credit card और plastic money तक की यात्रा को प्रदर्शित किया गया है।
उन्होंने असम के tribal museums और बेंगलुरु के science museums की भी प्रशंसा की।

प्रश्न: अंत में लोगों के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर: उन्होंने कहा कि लोगों को अपनी छुट्टियों में संग्रहालय जरूर जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि संग्रहालय केवल फोटो खिंचाने की जगह नहीं हैं बल्कि सीखने और समझने का माध्यम हैं।उन्होंने बताया कि ब्रिटिश म्यूजियम जैसे बड़े संग्रहालयों को एक दिन में पूरी तरह समझना संभव नहीं होता, इसलिए visitors को पहले यह तय करना चाहिए कि वे क्या देखना चाहते हैं।
उन्होंने एक शोध का उल्लेख करते हुए कहा कि museum visitor behavior पर भी गंभीर अध्ययन हो रहे हैं। एक शोध में यह देखा गया कि tribal museums में आने वाले लोगों पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है और कौन-सी सुविधाओं की कमी visitors को प्रभावित करती है।
उन्होंने कहा कि यदि संग्रहालयों में basic facilities जैसे public toilets और visitor amenities बेहतर हों तो अधिक लोग संग्रहालयों की ओर आकर्षित होंगे।अंत में उन्होंने कहा कि संग्रहालय हमारी साझा सांस्कृतिक धरोहर हैं और हर व्यक्ति को उन्हें समझने, देखने और उनसे सीखने की आदत विकसित करनी चाहिए।
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