देश में सामाजिक सौहार्द, अल्पसंख्यकों की चुनौतियों और शिक्षा के समावेशी मॉडल पर एक अहम पहल के तहत भारत की ग्रैंड मस्जिद के चीफ इमाम डॉ. मुहम्मद अब्दुल हकीम अजहरी ने ग्रैंड मुफ्ती कांतापुरम ए.पी. अबूबकर मुसलियार के साथ प्रधानमंत्री Narendra Modi से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद ‘आवाज़ द वॉयस’ के प्रधान संपादक आतिर खान से विशेष बातचीत में डॉ. अज़री ने कहा कि देश के विकास, स्थिरता और दीर्घकालिक शांति के लिए सोशल हार्मनी को प्राथमिकता देना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
उन्होंने बताया कि मुलाकात में न केवल रमज़ान के पावन महीने के अवसर पर एक सकारात्मक संदेश साझा किया गया, बल्कि देश में बढ़ती ध्रुवीकरण की प्रवृत्तियों पर भी गंभीर चर्चा हुई। “हमने प्रधानमंत्री जी के समक्ष माइनॉरिटी समुदाय की कुछ वास्तविक परेशानियाँ रखीं। साथ ही यह भी विमर्श किया कि सामाजिक सौहार्द को जमीनी स्तर पर कैसे मजबूत किया जा सकता है,” उन्होंने कहा।
डॉ. अज़री ने विशेष रूप से ‘इंसानियत के साथ’ संदेश का उल्लेख किया, जिसे ग्रैंड मुफ्ती कांतापुरम ने केरल में एक 16 दिवसीय आध्यात्मिक यात्रा के दौरान प्रचारित किया था। इस यात्रा में उन्होंने विभिन्न समुदायों के लोगों से संवाद किया, उनकी कहानियाँ सुनीं और सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। “हम चाहते हैं कि ‘इंसानियत के साथ’ का यह संदेश पूरे भारत में फैले। धर्म अपनी जगह है, आस्था अपनी जगह है, लेकिन इंसानियत सबसे ऊपर है,” उन्होंने कहा।
बातचीत में डॉ. अज़री ने यह भी स्पष्ट किया कि इस्लाम केवल इबादत, नमाज़ और रोज़े तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसान के संपूर्ण विकास का मार्गदर्शन करता है।उन्होंने कहा, “इस्लाम शिक्षा, प्रशिक्षण, कृषि, उद्योग और व्यापार—हर क्षेत्र में संतुलित विकास की बात करता है। हमें ऐसे सामाजिक संगठनों की जरूरत है जिनकी अगुवाई विद्वान करें और जो समाज को सकारात्मक दिशा दें,”
उन्होंने केरल स्थित जामिया मरकज़ खत्ताब सुन्नत का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे धार्मिक और आधुनिक शिक्षा का समन्वय एक ही परिसर में संभव है। यह संस्थान, जिसकी स्थापना ग्रैंड मुफ्ती शेख अबूबकर साहिब ने की थी, पिछले 48 वर्षों से प्राथमिक धार्मिक शिक्षा से लेकर मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य प्रोफेशनल कोर्स तक संचालित कर रहा है। आज यह मॉडल भारत के लगभग 20 राज्यों में विभिन्न स्तरों पर मौजूद है। हाल ही में पंजाब के सरहिंद शरीफ में एक बड़े शैक्षणिक संस्थान का उद्घाटन इसी विचारधारा के विस्तार का प्रमाण है।
डॉ. अज़री का मानना है कि शिक्षा प्रणाली को समयानुकूल प्रशासनिक ढांचे और नई सोच के साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। “यदि संस्थागत ढांचा मजबूत हो, तो समाज में सकारात्मक बदलाव बहुत आसानी से लाया जा सकता है,” उन्होंने कहा।
जब उनसे पूछा गया कि मौजूदा समय में भारतीय विद्वानों के सामने क्या चुनौतियाँ हैं, तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि एकता ही सबसे बड़ा समाधान है।उन्होंने सुझाव दिया, “विद्वान अकेले न रहें, बल्कि सामूहिक नेतृत्व में कार्य करें। केरल में चालीस उलेमाओं की एक शूरा है, जो विचार-विमर्श के बाद ही फतवे जारी करती है। अन्य राज्यों में भी ऐसी मजलिसें बननी चाहिए, ताकि हर निर्णय परिपक्व चर्चा के बाद लिया जाए.”
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आज का दौर सोशल मीडिया का है, जहाँ कोई भी स्वयं को आलिम घोषित कर सकता है और भ्रामक विचार फैला सकता है।उन्होंने कहा, “इससे निपटने का तरीका यही है कि प्रमाणिक और प्रतिष्ठित विद्वान सामूहिक मंच पर आएँ, तथ्यों की जांच करें और सोच-समझकर बयान दें। जल्दबाजी में प्रतिक्रिया देना उचित नहीं है.”
राजनीति और धार्मिक नेतृत्व के संबंधों पर उन्होंने संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।उन्होंने कहा, “हम सीधे तौर पर राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करते और न ही राजनीति को हमारे धार्मिक मामलों में दखल देना चाहिए। लेकिन सरकार के साथ सकारात्मक संवाद आवश्यक है, ताकि अल्पसंख्यकों और अन्य समुदायों की आवश्यकताएँ सामने रखी जा सकें.”
आज के तनावपूर्ण माहौल में इस्लाम की शिक्षाओं को सही रूप में प्रस्तुत करने के प्रश्न पर डॉ. अज़री ने जोर दिया कि आमने-सामने संवाद की परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा। उन्होंने कहा, “खानकाहों और मदरसों में शिक्षा आमने-सामने बैठकर दी जाती है। यही तरीका सबसे प्रभावी है। सोशल मीडिया के शोर में सच्चाई अक्सर दब जाती है.”
बातचीत के अंत में उन्होंने प्रेम और लगाव को सामाजिक सौहार्द की आधारशिला बताया।उन्होंने कहा, “नफरत की भाषा को पूरी तरह त्यागना होगा। चाहे हिंदू परंपराओं के उदाहरण हों या सूफी संतों की शिक्षाएँ—भारत की संस्कृति हमेशा समन्वय और सहअस्तित्व की रही है। हमें उसी परंपरा को आगे बढ़ाना है,”
डॉ. अज़री के शब्दों में, भारत की शक्ति उसकी विविधता और साझा विरासत में निहित है। यदि शिक्षा, इंसानियत और संवाद को केंद्र में रखा जाए, तो न केवल अल्पसंख्यकों की समस्याओं का समाधान संभव है, बल्कि देश को विकास और शांति की नई दिशा भी मिल सकती है।




