ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का वह पावन पर्व है जो भगवान शिव की आराधना, साधना और आत्मिक जागरण का प्रतीक माना जाता है। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की उस गहरी आध्यात्मिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें शिव को सृष्टि के मूल तत्व के रूप में स्वीकार किया गया है। भगवान शिव को आदिदेव कहा गया है, जिनका न आदि है और न अंत। वे संहारक भी हैं और सृजनकर्ता भी, वैरागी भी हैं और गृहस्थ भी, योगी भी हैं और भोले भक्तवत्सल भी। महाशिवरात्रि का पर्व शिव और शक्ति के मिलन, चेतना के उत्कर्ष और आत्मा के परम सत्य से साक्षात्कार का पर्व माना जाता है।

शिव की आराधना का सबसे प्रमुख स्वरूप शिवलिंग है, जिसे निराकार ब्रह्म का प्रतीक माना गया है। शिवलिंग केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा, सृष्टि के संतुलन और अनंत चेतना का केंद्र है। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग वह तत्व है जिसमें समस्त सृष्टि लीन हो जाती है। यही कारण है कि भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के कई हिस्सों में शिवलिंग और शिव मंदिरों की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है। महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घी, शहद और बेलपत्र अर्पित करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति मानी जाती है।
भारत भूमि को शिव की भूमि कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि यहीं भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग स्थित हैं, जिन्हें शिव के दिव्य प्रकाश स्तंभ के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि इन स्थलों पर स्वयं भगवान शिव ज्योति स्वरूप में प्रकट हुए थे। गुजरात का सोमनाथ ज्योतिर्लिंग आस्था और इतिहास का जीवंत प्रमाण है, जिसे अनेक बार ध्वस्त किए जाने के बावजूद हर बार पुनः स्थापित किया गया। यह स्थल चंद्रदेव से जुड़ी पौराणिक कथा के कारण विशेष महत्व रखता है। आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम में स्थित मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग शिव और पार्वती के संयुक्त स्वरूप की पूजा का केंद्र है। मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग अपने दक्षिणमुखी स्वरूप और विश्व प्रसिद्ध भस्म आरती के लिए जाना जाता है, जहाँ शिव काल के भी अधिपति माने जाते हैं।
नर्मदा नदी के तट पर स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग आध्यात्मिक एकता और अद्वैत दर्शन का प्रतीक है, जबकि हिमालय की गोद में स्थित केदारनाथ ज्योतिर्लिंग तप, त्याग और मोक्ष का मार्ग दिखाता है। मान्यता है कि पांडवों ने यहाँ भगवान शिव से अपने पापों से मुक्ति की प्रार्थना की थी। महाराष्ट्र का भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग और नासिक का त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग भी प्राचीन कथाओं और प्राकृतिक सौंदर्य से जुड़े हुए हैं। वाराणसी में स्थित काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग को मोक्षदायी माना गया है, जहाँ मृत्यु भी जीवन के अंतिम सत्य का द्वार बन जाती है।
तमिलनाडु के रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की स्थापना स्वयं भगवान राम द्वारा किए जाने की मान्यता है, जो शिव और विष्णु भक्ति के अद्भुत समन्वय को दर्शाती है। देवघर का वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग आरोग्य और रोग नाश से जुड़ा है, वहीं द्वारका का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग भक्तों को भय और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा का आश्वासन देता है। औरंगाबाद के समीप स्थित घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग करुणा, भक्ति और साधना का प्रतीक है, जो एलोरा की गुफाओं के साथ आध्यात्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र भी है।
भारत के बाहर भी भगवान शिव की उपासना उतनी ही श्रद्धा और आस्था के साथ की जाती है। नेपाल का पशुपतिनाथ मंदिर विश्व भर के शिव भक्तों के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थल है और यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में भी शामिल है। अमरनाथ गुफा में प्राकृतिक रूप से बनने वाला बर्फ का शिवलिंग शिव की दिव्यता और रहस्य का प्रतीक माना जाता है, जहाँ हर वर्ष लाखों श्रद्धालु कठिन यात्रा कर दर्शन के लिए पहुँचते हैं। श्रीलंका और दक्षिण एशिया के अन्य क्षेत्रों में भी शिव के अर्धनारीश्वर और पशुपति स्वरूपों की पूजा की जाती रही है, जो यह दर्शाता है कि शिव भक्ति किसी एक भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं है।
अफगानिस्तान, जिसे आज मुख्यतः इस्लामी देश के रूप में जाना जाता है, कभी हिंदू और बौद्ध संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था। प्राचीन गंधार सभ्यता और काबुल शाही राजवंश के समय भगवान शिव की पूजा व्यापक रूप से प्रचलित थी। इतिहासकारों के अनुसार सातवीं से दसवीं शताब्दी के बीच अफगानिस्तान के काबुल, गजनी और गार्डेज़ जैसे क्षेत्रों में शिव मंदिर और हिंदू धार्मिक स्थल मौजूद थे। काबुल के कोह-ए-असमाई पहाड़ी क्षेत्र में स्थित असमाई हिंदू मंदिर आज भी अफगानिस्तान में हिंदू विरासत का जीवंत प्रतीक माना जाता है। यह मंदिर पहाड़ी की तलहटी में स्थित है और स्थानीय हिंदू समुदाय के लिए आस्था का केंद्र रहा है। हालाँकि वर्तमान परिस्थितियों में अफगानिस्तान में हिंदू आबादी बहुत कम रह गई है, फिर भी यह स्थल इस बात का प्रमाण है कि कभी यहाँ शिव भक्ति और सनातन संस्कृति का प्रभाव गहरा था।
पाकिस्तान में भगवान शिव से जुड़े मंदिरों और स्थलों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक और ऐतिहासिक रूप से अधिक प्रमाणिक मानी जाती है। पंजाब प्रांत के चकवाल ज़िले में स्थित कटास राज मंदिर परिसर विश्व के सबसे प्राचीन शिव मंदिरों में से एक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माता सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव के नेत्रों से गिरे आँसुओं से यहाँ कटाक्ष कुंड का निर्माण हुआ था, जिसके तट पर यह मंदिर स्थित है। महाभारत काल से जुड़ी कथाएँ भी इस स्थान से संबंधित मानी जाती हैं, और आज भी महाशिवरात्रि पर यहाँ विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
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सिंध प्रांत में स्थित शादानी दरबार भी पाकिस्तान का एक महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थ स्थल है, जहाँ शिव सहित अन्य देवताओं की पूजा होती है। यह मंदिर न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ हर वर्ष मेला और धार्मिक आयोजन होते हैं जिनमें पाकिस्तान के साथ-साथ भारत से भी श्रद्धालु आते हैं। इसी प्रकार पिशावर में स्थित पीर रतन नाथ जी का मंदिर भगवान शिव से जुड़ी नाथ परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। यह मंदिर हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय का भी प्रतीक रहा है, जहाँ शिव को एक योगी और संत स्वरूप में सम्मान दिया जाता है।
खैबर पख्तूनख्वा के मानसेहरा क्षेत्र में स्थित चित्ती गट्टी शिव मंदिर एक और प्राचीन स्थल है, जहाँ हजारों वर्ष पुराना शिवलिंग होने की मान्यता है। यह मंदिर इस बात का प्रमाण है कि आज के पाकिस्तान क्षेत्र में प्राचीन काल से शिव उपासना प्रचलित थी। हालाँकि समय के साथ अनेक मंदिर नष्ट हो गए या खंडहर में बदल गए, फिर भी ये स्थल सनातन इतिहास की अमिट छाप छोड़ते हैं।
बांग्लादेश में भी भगवान शिव की पूजा की परंपरा आज तक जीवित है, विशेष रूप से तटीय और ग्रामीण क्षेत्रों में। कोक्स बाज़ार के निकट महेशखाली द्वीप पर स्थित श्री श्री आदिनाथ मंदिर बांग्लादेश का सबसे प्रसिद्ध शिव मंदिर माना जाता है। यहाँ भगवान शिव को आदिनाथ के रूप में पूजा जाता है और हर वर्ष शिवरात्रि तथा वार्षिक मेले के अवसर पर हजारों श्रद्धालु एकत्र होते हैं। पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक शांति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। यह मंदिर इस बात का सशक्त प्रमाण है कि शिव भक्ति बंगाल क्षेत्र की संस्कृति में भी गहराई से रची-बसी है।

इन सभी स्थलों को देखने पर यह स्पष्ट होता है कि भगवान शिव की उपासना किसी एक देश, भाषा या काल तक सीमित नहीं रही। शिव को आदिदेव कहा गया है — अर्थात वे उस चेतना का प्रतीक हैं जो सृष्टि के आरंभ से विद्यमान है। राजनीतिक सीमाएँ बदलीं, साम्राज्य उठे और गिरे, लेकिन शिव तत्व निरंतर मानव चेतना में जीवित रहा। अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में मौजूद शिव मंदिर और उनसे जुड़ी परंपराएँ इस सार्वभौमिक सत्य की पुष्टि करती हैं।
महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर जब शिव भक्त उपवास, रुद्राभिषेक और ध्यान में लीन होते हैं, तब ये ऐतिहासिक शिव स्थल हमें यह स्मरण कराते हैं कि शिव केवल भारत के नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के देवता हैं। वे संहार के साथ सृजन, वैराग्य के साथ करुणा और मौन के साथ अनंत चेतना का संदेश देते हैं। इन देशों में स्थित शिव मंदिर सनातन धर्म की उस अखंड धारा का प्रतीक हैं, जो समय, सीमा और परिस्थितियों से परे बहती रही है।
महाशिवरात्रि का पर्व केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका वैज्ञानिक और योगिक महत्व भी बताया गया है। योग शास्त्रों के अनुसार यह रात्रि मानव शरीर और चेतना के लिए विशेष रूप से अनुकूल होती है, जब ऊर्जा स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर प्रवाहित होती है। इसीलिए इस रात ध्यान, साधना और जागरण को विशेष फलदायी माना गया है। शिव को आदियोगी कहा गया है, जिन्होंने मानवता को योग और ध्यान का मार्ग दिखाया।

अंततः भगवान शिव केवल एक देवता नहीं, बल्कि जीवन दर्शन हैं। वे हमें सिखाते हैं कि सृजन और संहार दोनों ही जीवन के आवश्यक अंग हैं, और वैराग्य के साथ भी करुणा और प्रेम संभव है। महाशिवरात्रि के अवसर पर विश्व प्रसिद्ध शिवलिंग और शिव मंदिरों की महिमा हमें हमारी आध्यात्मिक विरासत की याद दिलाती है और आत्मिक शांति की ओर प्रेरित करती है। शिव की भक्ति हमें बाहरी संसार से भीतर की यात्रा पर ले जाती है, जहाँ अहंकार का विसर्जन और चेतना का उत्थान होता है। यही शिव तत्व का सार है — शांत, स्थिर और अनंत।