मोहम्मद उस्मान हाशमी: जिनके लिए देवी-देवता बने रोज़ी-रोज़गार का जरिया

Story by  दयाराम वशिष्ठ | Published by  [email protected] | Date 17-02-2026
Mohammad Usman Hashmi: For whom gods and goddesses became a source of livelihood
Mohammad Usman Hashmi: For whom gods and goddesses became a source of livelihood

 

दयाराम वशिष्ठ

गाजीपुर–बनारस की सांस्कृतिक धरती से निकले युवा शिल्पकार मोहम्मद उस्मान हाशमी आज अपनी जूट आर्ट पेंटिंग के जरिए न सिर्फ रोज़गार कमा रहे हैं, बल्कि गंगा-जमुनी तहज़ीब की एक जीवंत मिसाल भी बन चुके हैं। हिंदू देवी-देवताओं की जूट से बनी उनकी कलाकृतियाँ देश के अलग-अलग हिस्सों में सराही जा रही हैं। गणेश, शिव, कृष्ण, दुर्गा, काली और काशी विश्वनाथ से लेकर गंगा घाटों के दृश्य तक,उनकी कला धार्मिक सीमाओं को पार कर साझी संस्कृति की तस्वीर पेश करती है। खास बात यह है कि उनके इस कार्य में 40 से 45 प्रतिशत कारीगर हिंदू समुदाय से हैं, जिन्हें उन्होंने खुद प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाया है।

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मोहम्मद उस्मान हाशमी का मानना है कि कला का कोई धर्म नहीं होता। वह कहते हैं कि अगर उनके हाथों से बनी गणेश या शिव की प्रतिमा किसी घर में श्रद्धा से स्थापित होती है, तो यह उनके लिए सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की सेवा है। उनके शब्दों में, “हमारी कला नफरत फैलाने वालों के लिए एक जवाब है। जब हिंदू और मुसलमान एक साथ बैठकर देवी-देवताओं की कलाकृतियाँ बनाते हैं, तो यह अपने आप में एक संदेश है कि देश की असली ताकत भाईचारा है।”

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हाशमी ने अब तक 300 से अधिक युवाओं को जूट आर्ट पेंटिंग का प्रशिक्षण दिया है, जिनमें बड़ी संख्या हिंदू युवाओं की भी है। वह चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग इस कला को सीखें और अपने पैरों पर खड़े हों। उनके यहां काम करने वाले कारीगरों के लिए धर्म या जाति कोई मायने नहीं रखती। उनके कार्यशाला में सभी एक परिवार की तरह काम करते हैं। यही कारण है कि उनका छोटा-सा स्टूडियो आज सामाजिक समरसता का प्रतीक बन गया है।

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उनकी कला की मांग देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रूप में दिखाई देती है। मुंबई में गणेश और कृष्ण की जूट पेंटिंग की अधिक मांग रहती है, गुजरात में कृष्ण भक्ति से जुड़े डिजाइन पसंद किए जाते हैं, जबकि कोलकाता में काली और दुर्गा की कलाकृतियों की मांग अधिक होती है। काशी की पवित्रता को दर्शाते हुए उन्होंने जूट से काशी विश्वनाथ और गंगा घाटों का जो भव्य चित्र तैयार किया, उसे बनाने में उनके पूरे परिवार को लगभग एक महीने का समय लगा। यह कृति आज भी sउनके संग्रह की शान है।

मोहम्मद उस्मान हाशमी की यह यात्रा आसान नहीं रही। उनके दादा हसमतुल्ला हाशमी बनारसी साड़ी के कारोबार से जुड़े थे। पिता इम्तिहाज हाशमी और चाचा मुमताज हाशमी भी इसी काम में हाथ बंटाते थे।

काशी तीर्थ स्थल होने के कारण विदेशी पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता था और साड़ियों की बिक्री अच्छी हो जाती थी। इसी दौरान एक विदेशी ग्राहक ने जूट से बने उत्पादों की मांग रखी। यह विचार हाशमी परिवार के लिए नया था। जूट का प्रमुख बाजार कोलकाता में था, इसलिए उस्मान अकेले वहां गए और जूट सामग्री लाकर बनारस में नया प्रयोग शुरू किया।

sधीरे-धीरे जूट आर्ट पेंटिंग का काम आकार लेने लगा। परिवार के सभी सदस्य इसमें जुट गए। लेकिन दादा की बीमारी और फिर उनके निधन ने परिवार को गहरे आर्थिक संकट में डाल दिया। इलाज में भारी खर्च हुआ और 25 बीघा जमीन तक बेचनी पड़ी।

जूट पेंटिंग का काम भी मंदा पड़ गया। आर्थिक तंगी ने परिवार को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन उस्मान हाशमी ने हिम्मत नहीं हारी।

सिर्फ आठवीं कक्षा तक पढ़ाई कर पाने वाले उस्मान के मन में आगे पढ़ने की इच्छा थी, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों ने उन्हें जल्दी ही काम की दुनिया में ला खड़ा किया।

उन्होंने 20 वर्ष की उम्र से जूट कला को गंभीरता से अपनाया। शिक्षा अधूरी रहने का उन्हें मलाल नहीं है। वह कहते हैं, “परिस्थितियों ने जो सिखाया, वही मेरी असली डिग्री है।”

शुरुआती दौर में उनके जूट उत्पाद एजेंटों के माध्यम से तुर्की, दुबई और इटली तक पहुंचे। विदेशी बाजार में उनकी कला को सराहा गया, लेकिन कुछ एजेंटों की धोखाधड़ी ने उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया। सामान भेजा गया, लेकिन भुगतान नहीं मिला।

इससे परिवार की आर्थिक स्थिति और बिगड़ गई। यह दौर उनके लिए सबसे कठिन था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। दिन-रात मेहनत की, नए डिजाइन तैयार किए और बाजार में अपनी पहचान दोबारा बनाई।

उनकी मेहनत रंग लाई। बेहतर और आकर्षक डिजाइन के कारण बाजार में उनकी मांग बढ़ने लगी। आज उनके जूट आर्ट उत्पादों की नोएडा, दिल्ली और चेन्नई जैसे बड़े शहरों में अच्छी खासी मांग है। उन्होंने बैंक से ऋण लेकर अपने कारोबार को फिर से खड़ा किया। आधुनिक उपकरणों और बेहतर कच्चे माल के साथ उन्होंने उत्पादन क्षमता बढ़ाई।

आज उनका कारोबार लगातार आगे बढ़ रहा है। उनकी कार्यशाला में दर्जनों कारीगर काम करते हैं, जिनमें बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है जिन्हें उन्होंने खुद प्रशिक्षित किया है। उनका लक्ष्य सिर्फ व्यापार बढ़ाना नहीं, बल्कि इस कला को एक आंदोलन का रूप देना है, जिससे बेरोजगार युवाओं को सम्मानजनक रोजगार मिल सके।

मोहम्मद उस्मान हाशमी की कहानी सिर्फ एक शिल्पकार की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस भारत की कहानी है जो विविधता में एकता की मिसाल पेश करता है। जूट के रेशों से गढ़ी गई उनकी कलाकृतियाँ यह संदेश देती हैं कि सांस्कृतिक विरासत और साझा परंपराएं किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि पूरे देश की धरोहर हैं।

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जब एक मुस्लिम शिल्पकार अपने हिंदू साथियों के साथ बैठकर गणेश और शिव की प्रतिमा तैयार करता है और वह कलाकृति किसी मंदिर या घर की शोभा बढ़ाती है, तो वह सिर्फ कला नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द का जीवंत प्रतीक बन जाती है।

आर्थिक संकट, धोखाधड़ी, अधूरी शिक्षा और संसाधनों की कमी जैसी तमाम चुनौतियों के बावजूद मोहम्मद उस्मान हाशमी ने यह साबित कर दिया कि जुनून और मेहनत से किसी भी परिस्थिति को बदला जा सकता है। उनकी जूट कला आज नफरत की दीवारों के खिलाफ एक मजबूत पुल का काम कर रही है,जो समाज को जोड़ती है, सशक्त बनाती है और भारत की साझी संस्कृति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाती है।