विरासत और विश्वास : कुलाह-ए-मुबारक की हिफाज़त करती जयपुर की सलीम मंज़िल

Story by  फरहान इसराइली | Published by  [email protected] | Date 15-02-2026
Heritage and Faith: Jaipur's Salim Manzil Protects the Kula-e-Mubarak
Heritage and Faith: Jaipur's Salim Manzil Protects the Kula-e-Mubarak

 

फरहान इसराइली I जयपुर

गुलाबी नगर जयपुर की रौनक भरी गलियों में, जौहरी बाज़ार की चकाचौंध से कुछ कदम भीतर जब हल्दियों का रास्ता और ऊँचा कुआँ की पुरानी बस्तियों की ओर बढ़ते हैं, तो अचानक समय जैसे धीमा पड़ जाता है। पत्थरों की पुरानी दीवारें, मेहराबदार दरवाज़े और हवा में घुली इतिहास की ख़ामोशी इन सबके बीच खड़ी है सलीम मंज़िल। यह केवल एक हवेली नहीं, बल्कि दो सदियों से ज्यादा पुरानी एक जीवित विरासत है, जिसकी दीवारों में रियासत की यादें, कमरों में यूनानी हिकमत की परंपरा और एक पवित्र हॉल में सुरक्षित है हज़रत इमाम हुसैन अ.स. से जुड़ी पाक निशानी-“कुलाह-ए-मुबारक”।

s

करीब 200 वर्षों से यह हवेली एक ख़ानदान की पहचान रही है। आज इसकी जिम्मेदारी 33 वर्षीय मोइनुद्दीन खान और उनके छोटे भाई 27 वर्षीय हुसामुद्दीन खान के कंधों पर है। दोनों भाई विरासत को केवल संभाल नहीं रहे, बल्कि उसे समझते हुए नए दौर के साथ संतुलित भी कर रहे हैं। उनके लिए यह इमारत महज़ पुरखों की छोड़ी हुई संपत्ति नहीं, बल्कि एक अमानत है, जिसे सहेजना भी है और आने वाली पीढ़ियों तक ईमानदारी से पहुँचाना भी।

मोइनुद्दीन खान बताते हैं कि उनके पूर्वज लगभग 1812 में दिल्ली से जयपुर आए थे। उस दौर में जयपुर रियासत के महाराजा जगत सिंह ने उनके बुजुर्ग हकीम वासल अली खान को जागीर और ताज़ीम अता की। यह सम्मान यूँ ही नहीं मिला था; यह उस भरोसे का प्रतीक था जो राजघराने ने इस परिवार पर जताया। वासल अली खान की विद्वता और चिकित्सा कौशल ने उन्हें दरबार में विशिष्ट स्थान दिलाया। उनके बाद अज़ीम खान और फिर हकीम सलीम अली खान ने भी न केवल जागीरदार और ताज़ीमी सरदार की जिम्मेदारियाँ निभाईं, बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक क्षेत्रों में भी अपनी भूमिका दर्ज कराई।

f

परिवार के अज़ीम खान जयपुर स्टेट के इंटेलिजेंस विभाग के प्रमुख रहे। रियासत के समय में यह पद अत्यंत संवेदनशील माना जाता था। राज्य की सुरक्षा, राजनीतिक गतिविधियों और प्रशासनिक सूचनाओं पर नज़र रखना उनकी जिम्मेदारी थी। बाद में उनके पुत्र सलीम अली खान ने भी यही दायित्व निभाया। लगातार दो पीढ़ियों तक राज्य की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ाव इस परिवार की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा का प्रमाण है।

सलीम मंज़िल का निर्माण 1867 में शुरू हुआ और 1870 तक यह भव्य हवेली आकार ले चुकी थी। लगभग एक बीघा क्षेत्र में फैली इस इमारत को जयपुर महाराजा की ओर से उपहार स्वरूप प्रदान किया गया था। आज भी हवेली में पारंपरिक राजस्थानी नक्काशी, मेहराबें, ऊँची छतें और जालीदार खिड़कियाँ उस दौर की स्थापत्य कला का जीवंत उदाहरण पेश करती हैं। समय के साथ कई हवेलियाँ व्यावसायिक होटलों में बदल गईं, लेकिन सलीम मंज़िल ने अपनी मौलिक पहचान को बचाए रखा। परिवार को इसे होटल में बदलने के प्रस्ताव मिले, मगर उन्होंने विरासत की आत्मा को बाज़ार में उतारने के बजाय उसे संरक्षित रखना बेहतर समझा।

d

हालाँकि हवेली आधुनिक दौर से कटी नहीं है। फिल्मों और वेब सीरीज़ की शूटिंग के लिए यह लोकेशन कई बार चुनी गई है। मोइनुद्दीन मुस्कुराते हुए बताते हैं कि एक वेब सीरीज़ में उन्होंने स्वयं श्रीकृष्ण की भूमिका निभाई थी। वे कहते हैं, “हमारी परवरिश में मजहबी विरासत है, लेकिन कला और संवाद से जुड़ाव भी उतना ही जरूरी है।”

सलीम मंज़िल की सबसे बड़ी पहचान “कुलाह-ए-मुबारक” है। परिवार के अनुसार 17वीं सदी की शुरुआत में उनके बुजुर्गों ने ईरान के एक बादशाह का सफल इलाज किया था। बादशाह ने उन्हें सोना-चाँदी और कीमती तोहफों से नवाजना चाहा, लेकिन उन्होंने सब अस्वीकार कर दिया और कहा,यदि कुछ देना ही है, तो हज़रत इमाम हुसैन अ.स. की टोपी ‘कुलाह-ए-मुबारक’ अता की जाए। उनकी इस इच्छा का सम्मान करते हुए वह पवित्र निशानी उन्हें भेंट की गई, साथ ही शाही मुहर लगी सनद भी दी गई, जो आज तक सुरक्षित है।

1876 से यह कुलाह-ए-मुबारक सलीम मंज़िल में महफूज़ है। साल भर यह विशेष काँच के फ्रेम लगे बॉक्स में संरक्षित रहती है। हर साल मोहर्रम की 9 और 10 तारीख को इसे ज़ियारत के लिए खोला जाता है। उन दो दिनों में हवेली का वातावरण आध्यात्मिक रंग में रंग जाता है।

d

एक बड़ा हॉल सजाया जाता है, कमरों में इत्र और गुलाब की खुशबू बिखर जाती है, मीलाद शरीफ के साथ ज़ियारत की शुरुआत होती है। गुजरात, महाराष्ट्र और देश के अन्य हिस्सों से भी अकीदतमंद यहाँ पहुँचते हैं। फातेहा पढ़ी जाती है, तबर्रुक बाँटा जाता है और एक गहरी शांति का माहौल बनता है।मोइनुद्दीन कहते हैं, “हम इसे विरासत से ज्यादा अमानत मानते हैं। यह हमारे लिए इज़्ज़त भी है और जिम्मेदारी भी।” उनकी आवाज़ में गर्व से ज्यादा विनम्रता झलकती है।

dसलीम मंज़िल कई प्रमुख हस्तियों की मौजूदगी की गवाह रही है। पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी और शिवचरण माथुर, पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत, पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह, राज्यसभा की पूर्व उपसभापति नजमा हेपतुल्ला और सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश ज्ञान सुधा मिश्रा जैसी अनेक शख्सियतें यहाँ आ चुकी हैं। परिवार के मुखिया नसीमुद्दीन खान, जिन्हें लोग ‘प्यारे मियां’ के नाम से जानते थे, ने ऑल इंडिया हकीम अजमल खान मेमोरियल सोसाइटी की

स्थापना की थी। यूनानी चिकित्सा और सामाजिक सेवा की यह परंपरा आज भी परिवार की पहचान का हिस्सा है। 2020 में उनके निधन के बाद नई पीढ़ी ने यह जिम्मेदारी संभाली।

dपरिवार को 1812 में लालसोट क्षेत्र के अजीजपुर गाँव का ठिकाना प्रदान किया गया था। ताज़ीमी सरदार का दर्जा विशेष सम्मान का प्रतीक था,ऐसे सरदार को महाराजा के सामने तलवार लेकर जाने और खास पगड़ी पहनने का अधिकार प्राप्त था।

रियासत का दौर भले समाप्त हो चुका हो, पर उस परंपरा की स्मृति आज भी जीवित है।

आज मोइनुद्दीन और हुसामुद्दीन खान विरासत को आधुनिक संवाद से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। वे ज़ियारत के बेहतर इंतज़ाम के लिए नए हॉल के निर्माण की योजना बना रहे हैं।

सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के जरिए वे इस विरासत की जानकारी दुनिया तक पहुँचा रहे हैं। उनका मानना है कि पारदर्शिता और संवाद से ही विश्वास कायम रहता है।

जयपुर की हवेलियाँ केवल स्थापत्य धरोहर नहीं, बल्कि इतिहास की साँस लेती हुई किताबें हैं। सलीम मंज़िल ऐसी ही एक जीवित किताब है,जहाँ रियासत की प्रशासनिक यादें भी हैं और कर्बला की रूहानी विरासत भी।

जहाँ यूनानी हिकमत की परंपरा है और नई पीढ़ी की आधुनिक सोच भी। मोहर्रम की नौवीं शाम जब कुलाह-ए-मुबारक के दीदार के लिए दरवाज़े खुलते हैं, तो वह केवल एक धार्मिक रस्म नहीं होती; वह भरोसे, आस्था और जिम्मेदारी का ऐसा संगम होता है, जो पीढ़ियों को जोड़ता है।

सलीम मंज़िल की कहानी दरअसल एक परिवार की नहीं, बल्कि उस सांझी विरासत की कहानी है जो इतिहास से मिलती है, आस्था से संवरती है और समय के साथ आगे बढ़ती रहती है।