शिव हैं लोकतांत्रिक देव, उनकी समता और सहिष्णुता आज विश्व की जरूरत
Story by मंजीत ठाकुर | Published by onikamaheshwari | Date 14-02-2026
Shiva is a democratic god; his equality and tolerance are what the world needs today.
मंजीत ठाकुर
आज के समय में जब निजता की अवधारणा ही संदेहों के घेरे में है. न तो आपकी निजता का सम्मान कोई प्रतिष्ठान करता है और न ही आप खुद गोपन रहना चाहते हैं. प्रतिष्ठान को आपकी सूचना चाहिए और आपको अपने हर काम को शेयर करना है, ऐसे में शिवत्व बेहद महत्वपूर्ण है. आपके मन में सहज आएगा कि शिवत्व और निजता या गोपनीयता का क्या संबंध! बेशक है. वह, उनका परिवार, उनका कल्याण बेहद गोपन है. आप सहज शिव को जान नहीं सकते, पर इसके साथ ही शिव हमेशा हर किसी के लिए उपलब्ध हैं. किसी मंदिर में जाइए, स्वर्णाभरणों से ढंकी अन्य देवमूर्तियों को छूना जहां मुश्किल है, वहीं भगवान शिव की पूजा की महत्ता शिवलिंग की स्पर्शपूजा में है.
भगवान शिव लिंग रूप में हों या मूर्ति रूप में, वह सदैव उपलब्ध होते हैं और यह कुछ ऐसा ही है जैसे कोई बहुत बड़ा आदमी हमेशा आपके साथ सेल्फी के लिए मुस्कुराता बैठा रहे. पर मैंने कहा कि आज शिव की जरूरत है. कोई भी पूछ सकता है कि इस औघड़दानी, महादेव, भोलेबाबा की ज़रूरत क्यों है?
कपड़ों को जरूरत से ज्यादा महत्व देने वाले मौजूदा समय में बेहद बुनियादी कपड़ों में रहने वाले को कौन पूछेगा भला? सलीकेदार बालों, सुगंधित तेल-फुलेल, सोने और हीरे-जवाहरातों से सजे देवों की अपना आभा होती है, उस बीच में जटाजूट वाले, गरदन में नाग लपेटे, दुनिया बचाने के लिए हलाहल जैसे घातक विष को गले में धारण करने वाले, बाघ की खाल और भस्म लपेटे देवता को आखिर दिखावापसंद दुनिया में कौन अहमियत देगा? असल में, जरूरत इसी वास्ते है.
भगवान शिव मुझे बहुत पसंद हैं. एक ईश्वर के रूप में, सभी समुदायों में समन्वयकारी मध्यस्थ के रूप में, एक सुखी परिवार के मुखिया के रूप में. वह हम सबको पसंद हैं क्योंकि शिव हमारी सांसारिक क्षुद्रताओं के बीच, हमारी एक-दूसरे समुदायों के प्रति असहिष्णुता, असमानता, अन्याय से भरी दुनिया में सबके लिए सहज रूप से उपलब्ध हैं. शं कल्याणं कुरूः के घोष के साथ महादेव मूलतः शंकर हैं. उनके तीनों नेत्र खोलकर दुनिया (और उनकी शान में गुस्ताखी की कोशिश करने वाले कामदेव) को भस्म कर देने की भीषण और संहारक-विध्वंसक क्षमता की बात बहुत होती है, लेकिन किसी से पूछिए तो भला कि तीनों नेत्र खोलने वाली घटना हुई कितनी बार? उत्तर है सिर्फ तीन बार.
इसका अर्थ है कि मृत्यु और संहार के अधिष्ठाता देव होने के बावजूद शिव बाबा औघड़दानी के रूप में ही हम पर कृपामय रहते हैं. जरा गौर से देखिए, वह रहते हैं हिमालय की ऐसी जगह पर जहां घास का तिनका तक नहीं उगता. और उनका वाहन नंदी (बैल) कैसे रहता होगा? देवी पार्वती का वाहन बाघ है, उसका भोजन बैल हो सकता है.
गणेश जी का वाहन मूषक है, वह शिवजी के गले में लिपटे रहने वाले नाग का भोजन हो सकता है. बड़े बेटे कार्तिकेय का वाहन मयूर है, जो नाग को ग्रास बना सकता है. पर, सब एक साथ रहते हैं. निस्पृह और सांसारिक भोग विषयों से दूर रहने वाले शिव की पत्नी गौरी सौभाग्य की देवी हैं. एक पुत्र कार्तिकेय देवों के सेनापति हैं और दूसरे पुत्र गणेश बुद्धि के. सभी समुदायों के मिलजुल कर रहने का यह ऐसा पावन उदाहरण है, जिसको अभी भारत में सख्त ज़रूरत है.
अभी 14 फरवरी को वैलेंटाइन दिवस गुजरा है. नई पीढ़ी इस दिन को प्रेम प्रकट करने का दिन मानती है. लेकिन, जैसा अप्रतिम और पराकाष्ठापूर्ण प्रेम शिव के यहां है, वह कहीं और कहां? माता सती जब पति शिव के अपमान पर यज्ञ कुंड में कूद गईं तो भगवान उनकी पार्थिव देह लेकर तीनों लोकों में घूमने लगे थे. यह प्रेम का अद्भुत रूप है, जो समर्पण और एक-दूसरे के सम्मा को लेकर सब कुछ त्याग कर देने का उदाहरण है. वही माता सती जब पार्वती या गौरी के रूप में फिर से जन्म लेती हैं, तो परिवार और सौभाग्य के देवी बन जाती हैं और इसलिए हिंदू स्त्रियां सौभाग्य और सुहाग के लिए गौरी की पूजा करती हैं और शिव जैसा पति पाने के लिए कुंवारी लड़कियां सोलह सोमवार का व्रत. अपने पसंद का पति पाने के लिए गौरी ने जैसी कठोर तपस्या की, वह प्रेम का उदात्त रूप है.
सोशल मीडिया के जमाने में जहां हमारे पास ब्रेन रॉट की समस्या है, जहां हमारा अटेंशन स्पैन महज 3 सेकेंड का रह गया है, हमारे शिव जैसी दत्तचित्र होकर स्थिरता की खोज करनी है. हमें कार्तिकेय और गणेश जैसी संतानों के रूप में माता-पिता की सम्मान करना है, जहां ब्रह्मांड की परिक्रमा का अर्थ माता-पिता की परिक्रमा होता है, जहां शिव लोकतांत्रिक देव के रूप में अच्छे-बुरे, देव-दावन, मनुष्य-गंधर्व, यक्ष-राक्षस, स्त्री-पुरुष सबके लिए सहज उपलब्ध हैं, जिनकी पूजा दूब-बेलपत्र, भांग-धतूरे जैसे चीजों से होती है और यह सब न हो तो महज एक लोटा जल भी भक्तिभाव से अर्पित किया जाए तो भी स्वीकार्य है.
शिव रावण की भक्ति स्वीकार करते हैं तो भगवान श्रीराम की भी. दानवों को भी वरदान देते हैं तो देवों की रक्षा भी करते हैं. उनकी बारात में उनके साथ भूत-प्रेत, किच्चिन-बैताल सब है. पशुपतिनाथ के कल्याण के दायरे में मानव-दावन-देव-गंधर्व ही नहीं, बल्कि पशु और पक्षी भी हैं. समुद्र मंथन में रत्न देवों ने रख लिए, अमृत को लेकर झगड़ा हुआ, पर जिस हलाहल से संसार का नाश हो सकता था, यह शिव ने समेटा.
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यह विश्व का कल्याण करने की उत्तम मंगल का भाव है. शिव समरसता, समन्वय, सहिष्णुता, संस्कृति और सदाशयता के देव हैं. इस महाशिवरात्रि शिव का महज जलाभिषेक ही न करें, बल्कि उनके गुणों पर चलने का प्रयास भी करें. हर हर महादेव.