मधुकर पांडेय /लखनऊ
लखनऊ की पहचान सिर्फ उसकी तहज़ीब, अदब और इमामबाड़ों से नहीं है, बल्कि यहां की रसोई से उठती मिठास भी इस शहर की सांस्कृतिक धड़कन है। उन्हीं परंपराओं में एक खास नाम है सेवइयों का, जो खास तौर पर रमजान और ईद के मौके पर हर घर की शान बनती हैं। लेकिन इस बार यह मिठास महंगाई की मार से फीकी पड़ती नजर आ रही है। कच्चे माल की बढ़ती कीमतों, ऊर्जा खर्च और मजदूरी में इजाफे ने सेवइयों के कारोबार को कठिन दौर में ला खड़ा किया है।

पुराने लखनऊ के बालागंज, चौपटिया और अमीनाबाद जैसे इलाकों में सालभर सेवइयों की खुशबू बिखरी रहती है। यहां की छोटी-बड़ी फैक्ट्रियों में पारंपरिक तरीके से महीन सेवइयां और लखनवी फेनी तैयार की जाती हैं।
इन इलाकों में पीढ़ियों से यह कारोबार चलता आया है। रमजान के महीने में तो इन कारखानों की रफ्तार दोगुनी हो जाती है। सामान्य दिनों में जहां एक कुंतल तक उत्पादन होता है, वहीं रमजान में यह आंकड़ा दोगुना हो जाता है। लेकिन इस साल उत्पादन की यह रफ्तार लागत के बढ़ते दबाव से जूझ रही है।
सेवइयों के उत्पादकों का कहना है कि सबसे बड़ा असर मैदे की कीमतों में उछाल का पड़ा है।
वर्ष 2025 में जो मैदा 27 रुपये प्रति किलो मिलता था, वह अब 38 रुपये किलो तक पहुंच गया है। यानी करीब 10 से 11 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी।
इसका सीधा असर सेवइयों की कीमतों पर पड़ा है, जो औसतन 15 रुपये प्रति किलो तक महंगी हो चुकी हैं। बनारसी सेवइयों की कीमतों में भी 15 से 20 रुपये प्रति किलो की वृद्धि देखी जा रही है।
पसंद बाग स्थित हुमायूं ट्रेडर्स के प्रोपराइटर मोहम्मद सलमान बताते हैं कि खुदरा बाजार में साधारण सेवइयां, जो पहले 40 से 85 रुपये किलो तक बिकती थीं, अब 50 से 100 रुपये किलो तक पहुंच गई हैं।
वहीं लखनवी फेनी, जो शहर की विशेष पहचान मानी जाती है, अब 120 से 160 रुपये किलो के बीच बिक रही है। उनके अनुसार उत्पादन लागत में बढ़ोतरी इसका मुख्य कारण है।
चौपटिया के सेवई उत्पादक मेराज खान, जिनका परिवार पिछले 50 वर्षों से इस व्यवसाय में है, कहते हैं कि आटा, तेल और पैकेजिंग सामग्री के दामों में 20 से 30 प्रतिशत तक की तेजी आई है।
इसके अलावा कमर्शियल बिजली दरों में बढ़ोतरी ने निर्माण लागत को और बढ़ा दिया है।
मजदूरी और परिवहन खर्च भी बढ़ चुके हैं। उनका कहना है कि यदि थोक स्तर पर कीमतों में 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है, तो खुदरा बाजार में यह बढ़ोतरी 15 से 20 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।
लखनऊ की सेवइयां सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं हैं। यहां से तैयार माल बिहार, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, पंजाब और हरियाणा तक भेजा जाता है। चौपटिया की महीन सेवइयों की मांग देशभर में है। रमजान के दौरान यहां की फैक्ट्रियां चौबीसों घंटे काम करती हैं। लेकिन इस बार कारोबारी वर्ग को चिंता है कि बढ़ती कीमतों का असर बिक्री पर पड़ेगा।
कैसरबाग के फुटकर विक्रेता उस्मान का कहना है कि लखनवी सेवइयों की देशभर में अलग पहचान है, लेकिन बनारसी वैरायटी की बढ़ती मांग से प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है।
ईद के मौके पर बनारसी और लखनवी सेवइयों के बीच मुकाबला देखने लायक होता है। बनारसी सेवइयों की मोटाई और बनावट अलग होती है, जबकि लखनवी सेवइयां अपनी महीनता और हल्केपन के लिए जानी जाती हैं।
थोक व्यापारी मोहम्मद रिजवान का अनुमान है कि इस बार रमजान के दौरान कारोबार में 15 से 20 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। उनका कहना है कि उपभोक्ता पहले की तरह बड़ी मात्रा में खरीदारी करने से बच रहे हैं। महंगाई का असर आम परिवारों की रसोई पर साफ दिखाई दे रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि खाद्य सामग्री की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर त्योहारों से जुड़े उत्पादों पर पड़ता है। सेवइयां, जो ईद की खुशियों का अहम हिस्सा हैं, अब बजट संतुलन का सवाल बनती जा रही हैं। पहले जहां लोग बड़े पैकेट खरीदते थे, अब वे छोटी मात्रा में खरीदारी कर रहे हैं।
लखनऊ की गलियों में सेवइयों की महक सिर्फ एक स्वाद नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यहां की फैक्ट्रियों में काम करने वाले कारीगर महीन सेवइयों को हाथों से संवारते हैं। उनके लिए यह सिर्फ रोज़गार नहीं, बल्कि परंपरा का निर्वाह है। लेकिन जब लागत बढ़ती है और मुनाफा घटता है, तो यह परंपरा भी दबाव में आ जाती है।
रमजान और ईद के अवसर पर सेवइयों की मांग अपने चरम पर होती है। यह मिठाई केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल और साझा खुशियों का माध्यम है।
महंगाई के इस दौर में चुनौती यह है कि परंपरा की यह मिठास कैसे बरकरार रखी जाए। कारोबारी उम्मीद कर रहे हैं कि आने वाले समय में कच्चे माल की कीमतें स्थिर होंगी और मांग फिर से पटरी पर लौटेगी।
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— Awaz -The Voice हिन्दी (@AwazTheVoiceHin) February 13, 2026
फिलहाल स्थिति यह है कि लखनऊ की सेवइयों की मिठास महंगाई की आंच में तप रही है। उत्पादन जारी है, पर मुनाफा सिमट रहा है। बाजार में हलचल है, पर खरीदारों की जेब पर बोझ भी बढ़ा है।

ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस ईद पर सेवइयों की खुशबू पहले जैसी रौनक लौटा पाएगी या महंगाई का असर त्योहार की मिठास को कुछ फीका कर देगा।