ईरान पर अमेरिकी दबाव क्यों पड़ रहा है बेअसर?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 02-09-2026
Why is American pressure on Iran ineffective?
Why is American pressure on Iran ineffective?

 

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आदिल फराज़

28 फरवरी 2026 को ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद से हालात लगातार बदल रहे हैं। अमेरिका, ईरान के सुप्रीम लीडर को शहीद करके सत्ता परिवर्तन और 'विलायत-ए-फकीह' की व्यवस्था को खत्म करने के सपने देख रहा था, मगर यह 'दीवाने का सपना' साबित हुआ। ट्रंप के लंबे-चौड़े दावे बकवास से ज्यादा कुछ नहीं थे। अमेरिका जब ईरान में अपने लक्ष्य तक पहुँचने में नाकाम रहा, तो उसने आर्थिक नाकाबंदी करके ईरान को झुकाने की कोशिश की, मगर इस मैदान में भी उसे नाकामी का मुँह देखना पड़ा।

 समंदर में जिस शान-ओ-शौकत से अमेरिकी बेड़े उभरे थे, उन्हें वैसी ही लगातार पीछे हटने और रुसवाई का सामना करना पड़ रहा है। ईरान समंदर में लगातार तेल बेच रहा है और अमेरिकी नाकाबंदी को तोड़कर अपनी नौसैनिक ताकत का ऐलान भी कर रहा है।

इस युद्ध ने जहाँ अमेरिकी ताकत की पोल खोल दी, वहीं उसके सहयोगी देशों को भी भारी नुकसान का सामना करना पड़ा। खास तौर पर अरब देशों की अर्थव्यवस्था डगमगा रही है और क्षेत्र में मौजूद व्यापारिक मॉडल प्रभावित हो रहा है।

अरबों की अर्थव्यवस्था तेल निर्यात पर निर्भर है, जिसे संकट का सामना है। बंदरगाहों पर युद्ध से पहले जैसीहलचल नहीं है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) को अरबों डॉलर के व्यापार का नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे हालात में ट्रंप की आर्थिक नाकाबंदी अकेले ईरान को प्रभावित नहीं कर सकती, बल्कि खाड़ी के सभी देश इसकी चपेट में आएंगे।

अरब देश इस नुकसान को सहने की बिल्कुल ताकत नहीं रखते। कतर के प्रधानमंत्री के तेहरान दौरे के अलग-अलग कारण बताए जा सकते हैं, लेकिन क्षेत्र के व्यापारिक मॉडल को पहुँचे नुकसान पर भी जरूर चर्चा हुई होगी। कतर समेत खाड़ी के सभी देशों के लिए व्यापार रीढ़ की हड्डी की तरह है। अगर व्यापार प्रभावित हुआ, तो अर्थव्यवस्था को ज़मीन पर आने में ज़रा भी देर नहीं लगेगी।

अमेरिका आर्थिक नाकाबंदी के जरिए ईरान को झुकाना चाहता है। जो काम युद्ध नहीं कर सका, वह आर्थिक नाकाबंदी से भी मुमकिन नहीं है। क्योंकि ईरान पिछले 48साल से प्रतिबंधों की मार झेल रहा है। उसके लिए नए और पुराने प्रतिबंधों में ज्यादा फर्क नहीं है।

ईरानी राष्ट्र ने प्रतिबंधों के साथ जीना और आर्थिक मुश्किलों से निकलना सीख लिया है। ट्रंप को यह समझना होगा कि जिस राष्ट्र ने लगातार आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद तरक्की के नए रास्ते तलाशे हों, उसे झुकाना मुमकिन नहीं है।

दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति अब तक ईरान की तरक्की के कारणों और ईरानी राष्ट्र के मनोविज्ञान को नहीं समझ सके हैं। उन्हें पहले ईरानी राष्ट्र के इतिहास और प्रतिबंधों में उनकी लगातार प्रगति पर गौर करना चाहिए।

 अगर आर्थिक बहिष्कार और नए-नए प्रतिबंधों से ईरान को झुकाया जा सकता, तो यह बहुत पहले हो चुका होता। प्रतिबंधों ने ईरान को तरक्की के नए रास्तों की तरफ मोड़ा। आर्थिक बहिष्कार ने 'आत्मनिर्भर ईरान' की नींव रखी। अगर ट्रंप ईरानी राष्ट्र के मनोविज्ञान और इतिहास से थोड़ा भी वाकिफ होते, तो यह युद्ध अमेरिकी रुसवाई का कारण नहीं बनता।

ट्रंप ने दावा किया कि हमने ईरान की समुद्री नाकाबंदी बढ़ा दी है, जिसके बाद ईरान वैश्विक बाजार में अपना तेल नहीं बेच सकेगा। जबकि ईरान लगातार समंदर में तेल बेच रहा है। हाल ही में ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मेजर जनरल मोहसिन रजाई ने लेबनान के अल-मनार चैनल को दिए एक इंटरव्यू में अमेरिकी समुद्री नाकाबंदी का मजाक उड़ाते हुए कहा कि: 'हमने युद्धविराम के दौरान अस्सी मिलियन (आठ करोड़) बैरल तेल निर्यात किया।

 अगर आर्थिक नाकाबंदी इसी तरह जारी रही, तो हम अमेरिकी आर्थिक हितों पर और करारी चोट करेंगे।' उन्होंने कहा कि: 'ईरान ने युद्धविराम के दौरान समुद्री नाकाबंदी को तोड़ते हुए सत्तर से अस्सी मिलियन बैरल तेल बेचा।

समंदर में तेल के भंडार बेचने के अलावा ईरान ने तेल बेचने के नए रास्ते भी तलाश लिए हैं, जिससे तेल निर्यात की मात्रा में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इस तरह तेल की बिक्री प्रतिबंधों से पहले के स्तर पर वापस आ गई है।'

इस बयान से साफ हो जाता है कि अमेरिका ईरान की समुद्री नाकाबंदी में भी नाकाम हो चुका है। युद्ध अब नए चरण में प्रवेश कर रहा है। अमेरिका इस युद्ध का नक्शा ईरान की मर्जी के मुताबिक तैयार करने पर मजबूर है। शायद इसी आधार पर ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियान ने कहा था कि: 'ईरान से बड़ा शतरंज का कोई खिलाड़ी नहीं है', जिसका नजारा धीरे-धीरे सामने आ रहा है।

ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंध पूरी तरह असरहीन भी नहीं हैं। प्रतिबंधों ने महँगाई को बढ़ावा दिया है और आम जनता को मुश्किलें पेश आ रही हैं। इसके बावजूद ईरानी जनता के दृढ़ संकल्प ने दुश्मन की आर्थिक नाकाबंदी को मात दे दी।

हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों का असर ईरान तक सीमित नहीं है। इसका दायरा अरब देशों के साथ-साथ मध्य पूर्व तक फैल रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों ने संयुक्त अरब अमीरात के इक्कीस अरब डॉलर के व्यापार को प्रभावित किया है।

 वाशिंगटन ने ईरान के खिलाफ लगाए गए प्रतिबंधों को 'आर्थिक अलगाव' का नाम दिया था, लेकिन इसका दायरा खाड़ी तक फैल गया। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने नए प्रतिबंधों का ऐलान करते हुए ईरान की डिजिटल संपत्तियों, तकनीक, सोने, विमानन और समुद्री परिवहन - इन पाँच क्षेत्रों को निशाना बनाया।

अमेरिका ने दुनिया को अल्टीमेटम दिया कि जो भी ईरान के साथ इन क्षेत्रों में सहयोग करेगा, उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने साफ तौर पर कहा कि इस नीति का मकसद ईरान की 'हर तरह की आर्थिक और जीवनदायी सांस की नली को काटना' है।

उन्होंने कहा कि इन प्रतिबंधों के जरिए ईरान के खिलाफ 'डी-डे' की शुरुआत हो रही है। ईरान ने अमेरिकी प्रतिबंधों को राजकीय और आर्थिक आतंकवाद करार देते हुए साफ ऐलान किया कि 'जो भी देश ईरान के खिलाफ अमेरिकी आर्थिक युद्ध में शामिल होगा, तेहरान उसे अपना दुश्मन समझेगा।'

मोहसिन रजाई ने कहा कि ईरान पहले ऐसे देशों से बातचीत करेगा और उन्हें इस विवाद से दूर रहने के लिए कहेगा। लेकिन अगर वे बाज नहीं आए, तो ईरान उनके हितों को भी निशाना बनाएगा।

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर पड़ोसी देश अमेरिका के साथ आर्थिक नाकाबंदी में शामिल होते हैं, तो हम होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) में तेल का निर्यात बंद कर देंगे। मोहसिन रजाई ने मानो सभी पड़ोसी देशों को चेतावनी दी है ताकि वे अमेरिका के साथ सहयोग करने से बचें।

होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का दावा हवाई नहीं है। इस दावे को हकीकत बनते हुए दुनिया ने देखा है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने इस सिलसिले में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को पत्र भेजकर अमेरिकी प्रतिबंधों को राजकीय और आर्थिक आतंकवाद करार दिया।

हालांकि संयुक्त राष्ट्र को पत्र भेजना एक नैतिक और कानूनी कदम जरूर है, लेकिन इसका जाहिर तौर पर कोई फायदा नहीं है। संयुक्त राष्ट्र एक जिंदा लाश की तरह है जिसने पूरी दुनिया को अपनी सड़न से प्रभावित किया है। ऐसे संगठनों की मानवता को कोई जरूरत नहीं है जो अपना फर्ज अदा नहीं कर सकते।

अब आते हैं ईरान और अरब देशों की राजनीति की तरफ! ईरान ने हमेशा इस्लामिक भाईचारे और एकता को प्राथमिकता दी है। आज भी ईरान इस्लामिक एकता का सबसे बड़ा समर्थक है। मुस्लिम देशों पर हुए हमलों में ईरान ने सिर्फ अमेरिकी और इजरायली हितों को निशाना बनाया।

खासतौर पर उन अमेरिकी सैन्य अड्डों को लक्ष्य बनाया गया जिनका इस्तेमाल ईरान के खिलाफ किया जा रहा था। ईरान का युद्ध मुस्लिम देशों के खिलाफ नहीं था। अगर ऐसा होता, तो अरब देशों पर वैसे ही हमले होते जैसे इजरायल पर किए गए थे, मगर ईरान ने ऐसा नहीं किया। अरब देशों को भी चाहिए कि वे अमेरिकी गुलामी से बाहर निकलें और इस्लामिक एकता बनाकर क्षेत्र में नई ताकत की नींव रखें, हालांकि यह बहुत मुश्किल प्रक्रिया है।

मुस्लिम शासकों को यह बात समझनी होगी कि अगर वे अमेरिका के साथ आर्थिक नाकाबंदी में शामिल हुए, तो इसका खामियाजा उनकी अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़ेगा। उन्हें यह समझना होगा कि अमेरिका के लिए अपने हित से ऊपर कुछ नहीं है।

ईरान के साथ युद्ध में अब तक अरब देशों को जितना नुकसान पहुँचा है, क्या अमेरिका उसकी भरपाई करेगा? बिल्कुल नहीं! क्योंकि अमेरिका ने ये अड्डे उन्हीं देशों की रक्षा के दावों के साथ बनाए थे, जिन्हें वे अपने बचाव के लिए भी इस्तेमाल नहीं कर सके। अगर अमेरिका के साथ ईरान की यह खींचतान इसी तरह जारी रही, तो इसका खामियाजा अमेरिका के सहयोगी देशों को भी भुगतना पड़ेगा, जिसका संकेत ईरानी नेतृत्व दे चुका है।

अरब देशों की अर्थव्यवस्था तेल के निर्यात पर ज्यादा निर्भर है। अगर तेल का निर्यात प्रभावित हुआ, तो अरब में नया आर्थिक संकट पैदा होगा। इसलिए अभी भी वक्त है कि अरब शासक होश के नाखून लें। अमेरिकी समर्थन उन्हें कतई सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता।

हालांकि अरब जनता को भी संवेदनशीलता और जागरूकता का परिचय देना होगा। इसके संकेत बहरीन समेत अन्य देशों में नजर भी आ रहे हैं। अगर जनता जागरूक हो गई, तो सत्ता बदलने में देर नहीं लगेगी! शासकों को सत्ता परिवर्तन से ज्यादा किसी बात का डर नहीं होता!