गौतम बुद्ध से क्यों प्रभावित थे अल्लामा इक़बाल?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 02-09-2026
Why was Allama Iqbal influenced by Gautam Buddha?
Why was Allama Iqbal influenced by Gautam Buddha?

 

ग़ौस सिवानी

अल्लामा मोहम्मद इक़बाल की शायरी और सोच में इतिहास की महान हस्तियों को बहुत महत्व मिला है। ऐसी ही एक महान शख्सियत गौतम बुद्ध हैं, जिनका ज़िक्र इक़बाल ने बड़े सम्मान के साथ किया है। इक़बाल की नज़र में गौतम बुद्ध सिर्फ़ एक धार्मिक गुरु नहीं थे, बल्कि इंसानियत, प्रेम, दया, आत्मसंयम और नैतिक बदलाव के संदेशवाहक थे। उन्होंने केवल समाज और राजनीति को ही नहीं, बल्कि संस्कृति और विचारों की दुनिया को भी गहराई से प्रभावित किया।

उनका संदेश एशिया के बड़े हिस्से में फैला और उनकी सोच से करोड़ों लोग प्रभावित हुए। दुनिया के अनेक दार्शनिकों और विचारकों ने गौतम बुद्ध पर लिखा है और इक़बाल भी उनमें शामिल हैं। उन्होंने अपनी शायरी में कई जगह बुद्ध का ज़िक्र किया है। इसके अलावा अपनी फ़ारसी किताब "जावेद नामा" में भी उन्होंने बुद्ध का बड़े आदर के साथ उल्लेख किया है।

दुनिया पर गौतम बुद्ध का प्रभाव

एक समय ऐसा था जब चीन से लेकर ईरान तक गौतम बुद्ध के अनुयायी बड़ी संख्या में मौजूद थे। भारत, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के कई देशों में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रभाव था। इसी कारण इन इलाक़ों में आज भी बड़ी संख्या में बौद्ध स्तूप और बुद्ध की मूर्तियाँ मिलती हैं।

बिहार और उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म के बड़े-बड़े केंद्र थे, जिनके ऐतिहासिक प्रमाण पटना, नालंदा से लेकर अयोध्या तक फैले हुए हैं। कश्मीर भी बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। आज का पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान कभी गांधार सभ्यता के प्रमुख क्षेत्र थे, जहाँ बौद्ध धर्म खूब फला-फूला। वर्तमान ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अज़रबैजान और ईरान तक बौद्ध धर्म के अनुयायी मौजूद थे।

यहाँ तक कि पैग़ंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के समय अरब देशों में भी बौद्ध भिक्षु पाए जाते थे। उनके लाल वस्त्रों के कारण उन्हें "मुहम्मरा" (लाल वस्त्र पहनने वाले) कहा जाता था। इतिहासकारों के अनुसार अरब के लोग गौतम बुद्ध की मूर्ति से भी परिचित थे।

आज चीन, जापान, तिब्बत, कंबोडिया, म्यांमार, भूटान, श्रीलंका, थाईलैंड, लाओस, वियतनाम, दक्षिण कोरिया और मंगोलिया जैसे देशों में बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। भारत, जहाँ बौद्ध धर्म की शुरुआत हुई, आज वहाँ बौद्धों की आबादी एक प्रतिशत से भी कम है। फिर भी बौद्ध धर्म दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म माना जाता है।

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गौतम बुद्ध कौन थे?

गौतम बुद्ध कोई काल्पनिक या पौराणिक पात्र नहीं थे, बल्कि एक वास्तविक ऐतिहासिक व्यक्ति थे। इतिहासकारों के अनुसार उनका जन्म ईसा पूर्व छठी से चौथी शताब्दी के बीच लुंबिनी (वर्तमान नेपाल) में कपिलवस्तु के पास हुआ था। उनका निधन कुशीनगर (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में हुआ।

ब्रिटानिका के अनुसार "बुद्ध" का अर्थ है-ऐसा जागृत और ज्ञान प्राप्त व्यक्ति, जो अज्ञान से मुक्त होकर दुख और पीड़ा से छुटकारा पा चुका हो। गौतम बुद्ध का खानदानी नाम गौतम था, जबकि उनका व्यक्तिगत नाम सिद्धार्थ था।

उनके जीवन की जानकारी मुख्य रूप से बौद्ध धर्म के धार्मिक ग्रंथों से मिलती है। ये ग्रंथ भी उनकी मृत्यु के कई सौ वर्ष बाद लिखे गए, इसलिए इनमें वर्णित सभी घटनाओं को पूरी तरह ऐतिहासिक नहीं माना जा सकता। फिर भी आधुनिक इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि गौतम बुद्ध एक वास्तविक ऐतिहासिक व्यक्ति थे।

परंपराओं के अनुसार गौतम बुद्ध ने लगभग 80वर्ष की आयु प्राप्त की। हालांकि उनके महापरिनिर्वाण की सही तिथि को लेकर मतभेद है। अलग-अलग बौद्ध परंपराएँ इसे ईसा पूर्व 2420से लेकर 290तक की अलग-अलग तिथियों से जोड़ती हैं।

गौतम बुद्ध का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

गौतम बुद्ध की वास्तविक शिक्षाएँ क्या थीं, यह पूरी तरह निश्चित नहीं है। लेकिन आज बौद्ध धर्म में यह माना जाता है कि पूरी सृष्टि कर्म के नियम पर चलती है। अच्छे कर्म भविष्य में सुख देते हैं, जबकि बुरे कर्म दुख और कष्ट का कारण बनते हैं।

बौद्ध धर्म के अनुसार सभी जीव बार-बार जन्म लेते और मरते रहते हैं। इस अंतहीन चक्र को संसार कहा जाता है, जिसका अर्थ है लगातार भटकते रहना। बौद्ध धर्म के अनुसार संसार दुखों से भरा हुआ है और उसकी शिक्षाओं का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को इस दुख से मुक्ति दिलाना है।गौतम बुद्ध के जीवन की घटनाएँ अलग-अलग रूपों में सुरक्षित हैं। सबसे प्राचीन स्रोत वे उपदेश और प्रवचन हैं, जिन्हें स्वयं बुद्ध से जोड़ा जाता है।

इन सूत्रों में बुद्ध अपने जीवन की कई महत्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख करते हैं। विशेष रूप से उस समय का, जब उन्होंने राजकुमार का जीवन छोड़ दिया और छह वर्ष की कठिन साधना के बाद ज्ञान प्राप्त किया। इन ग्रंथों में उनके ज्ञान प्राप्त करने की घटनाओं का भी वर्णन मिलता है। शुरुआती सूत्रों में उनके जन्म और बचपन के बारे में बहुत कम जानकारी दी गई है।

ब्रिटानिका के अनुसार बुद्ध आज अपनी शिक्षाओं वाले धार्मिक ग्रंथों और अपनी मूर्तियों के रूप में दुनिया में उपस्थित माने जाते हैं। लेकिन ऐसा कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता कि उनके जीवनकाल में उनकी मूर्तियाँ बनाई गई थीं।

भारतीय कला के विद्वान लंबे समय से इस बात पर विचार करते रहे हैं कि बौद्ध धर्म के शुरुआती स्मारकों में बुद्ध की मानव आकृति क्यों नहीं दिखाई देती। कुछ विद्वानों का मानना है कि प्रारंभिक बौद्ध धर्म में बुद्ध की प्रतिमा बनाना स्वीकार नहीं था और उनकी पहचान केवल प्रतीकों के माध्यम से की जाती थी।

हालांकि आज बौद्ध धर्म में धार्मिक विधि से स्थापित बुद्ध की मूर्तियाँ पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।चौथी या पाँचवीं शताब्दी के अभिलेखों से पता चलता है कि भारत के बौद्ध विहारों में आमतौर पर एक विशेष कक्ष होता था, जिसे सुगंधित कक्ष कहा जाता था। वहाँ बुद्ध की मूर्ति रखी जाती थी। उसे बुद्ध का निवास माना जाता था और उसकी सेवा के लिए विशेष भिक्षु नियुक्त किए जाते थे।

इक़बाल और गौतम बुद्ध

इक़बाल की नज़र में गौतम बुद्ध एक महान ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं और भारत के आध्यात्मिक इतिहास का उज्ज्वल अध्याय हैं। इक़बाल के अनुसार गौतम बुद्ध की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने मनुष्य को घृणा, अन्याय और सामाजिक भेदभाव से मुक्त करने का प्रयास किया।

उन्होंने प्रेम, करुणा, अहिंसा और मानवता का संदेश दिया। जब भारत में ऊँच-नीच और जातिगत भेदभाव का माहौल था, तब बुद्ध ने सभी मनुष्यों की समानता की बात की। इक़बाल इन नैतिक मूल्यों का सम्मान करते हैं, क्योंकि उनकी अपनी शायरी भी इंसान की गरिमा, आत्मसम्मान और नैतिक ऊँचाई का संदेश देती है।

हालांकि इक़बाल बौद्ध दर्शन की कुछ दार्शनिक मान्यताओं से सहमत नहीं थे। उनके अनुसार जीवन का उद्देश्य दुनिया से भागना नहीं, बल्कि उसे बेहतर बनाना है। इक़बाल अपने "ख़ुदी" के दर्शन के माध्यम से मनुष्य को सक्रिय, दृढ़ निश्चयी और रचनात्मक बनने की प्रेरणा देते हैं। जबकि उनका मानना था कि बौद्ध धर्म की कुछ पारंपरिक व्याख्याएँ मनुष्य को संसार त्यागने और इच्छाओं का दमन करने की ओर ले जाती हैं।

इक़बाल के अनुसार धर्म का असली उद्देश्य केवल व्यक्ति का आंतरिक सुधार नहीं, बल्कि समाज का निर्माण भी है। इसलिए वे ऐसी आध्यात्मिकता के समर्थक हैं, जो मनुष्य को दुनिया की समस्याओं से दूर न करे, बल्कि अन्याय, शोषण और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा दे। इसी दृष्टि से वे गौतम बुद्ध के व्यक्तित्व का सम्मान करते हैं, लेकिन इस्लाम की शिक्षाओं को अधिक व्यापक, संतुलित और व्यावहारिक जीवन व्यवस्था मानते हैं।

इक़बाल ने गौतम बुद्ध, उनके प्रभाव और उनकी शिक्षाओं का गहराई से अध्ययन किया था। यह उनके लिए इसलिए भी आवश्यक था क्योंकि उनकी पीएचडी का विषय ईरानी दर्शन था और गौतम बुद्ध का प्रभाव ईरान तक पहुँचा था।

अपने शोधग्रंथ में वे एक स्थान पर लिखते हैं:"इस विचार के विकास पर उन भारतीय यात्रियों का प्रभाव पड़ा होगा, जो ईरान से होकर उस समय बाकू में मौजूद बौद्ध मंदिरों की यात्रा किया करते थे। इस विचारधारा को हुसैन मंसूर ने पूरी तरह 'वहदत-उल-वजूद' का रूप दे दिया और एक सच्चे हिंदू वेदांती की तरह 'अना-अल-हक़' (अहम् ब्रह्मास्मि) का उद्घोष कर उठे।"फ़लसफ़ा-ए-अजम, पृष्ठ 111

इस लेख से यह पता चलता है कि इक़बाल ने ईरानी दर्शन पर गौतम बुद्ध के प्रभाव का गहराई से अध्ययन किया था। साफ़ है कि उन्होंने गौतम बुद्ध की शिक्षाओं को भी अच्छी तरह समझने की कोशिश की थी। वे अपने इसी शोधग्रंथ में लिखते हैं:"बुद्ध के नज़दीक मुक्ति तभी मिल सकती है, जब मनुष्य अपनी इच्छाओं को समाप्त कर दे और आत्मा की वासनाओं को पूरी तरह दबा दे।"फ़लसफ़ा-ए-अजम, पृष्ठ 185(इक़बाल का पीएचडी शोधग्रंथ) प्रकाशक: तसद्दुक़ हुसैन ताज, हैदराबाद दक्कन

इन बातों से यह समझ में आता है कि इक़बाल ने केवल गौतम बुद्ध के जीवन, उनकी शिक्षाओं और उनके प्रभाव का ही गहराई से अध्ययन नहीं किया, बल्कि उनके प्रति सम्मान और प्रशंसा का भाव भी रखा।

इक़बाल की शायरी में गौतम बुद्ध

इक़बाल ने कई जगह गौतम बुद्ध की प्रशंसा की है। एक ओर उन्होंने अपनी कविता "नानक" में बुद्ध की महानता का उल्लेख किया है, तो दूसरी ओर अपनी प्रसिद्ध फ़ारसी रचना "जावेद नामा" में उनके साथ एक कल्पनात्मक भेंट का चित्र भी प्रस्तुत किया है। कविता "नानक" में वे कहते हैं:--

क़ौम ने पैग़ाम-ए-गौतम की ज़रा परवा न की

क़द्र पहचानी न अपने गौहर-ए-यक-दाना की

इसका अर्थ है कि भारत के लोगों ने गौतम बुद्ध के संदेश की सही क़द्र नहीं की। बुद्ध एक अनमोल और अद्वितीय व्यक्तित्व थे, लेकिन उनकी अपनी ही क़ौम उनकी महानता को पहचान नहीं सकी। "गौहर-ए-यक-दाना" का मतलब है ऐसा अनमोल मोती, जिसका कोई दूसरा उदाहरण न हो। यहाँ गौतम बुद्ध की तुलना ऐसे ही दुर्लभ मोती से की गई है।

आह बदक़िस्मत रहे आवाज़-ए-हक़ से बेख़बर

ग़ाफ़िल अपने फल की शीरीनी से होता है शजर

इस शेर में इक़बाल दुख व्यक्त करते हैं कि भारत के लोग सत्य की आवाज़ को नहीं समझ सके। वे पेड़ का उदाहरण देते हैं, जो अपने ही फल की मिठास नहीं जानता। उसकी मिठास तो वही लोग समझते हैं, जो उसका फल खाते हैं। उसी तरह कोई समाज अक्सर अपने ही महान लोगों की क़द्र नहीं कर पाता, जबकि दूसरे लोग उनकी महानता को पहचान लेते हैं।

आश्कार उस ने किया जो ज़िंदगी का राज़ था

हिंद को लेकिन ख़याली फ़लसफ़ा पर नाज़ था

इस शेर में इक़बाल कहते हैं कि गौतम बुद्ध ने इंसान को जीवन का असली रहस्य समझाने की कोशिश की। उन्होंने नैतिकता, आत्मसंयम और आत्मिक पवित्रता का रास्ता दिखाया। साथ ही दुखों से मुक्ति और निर्वाण का मार्ग भी बताया। लेकिन उस समय भारत के विद्वान कल्पनाओं और सैद्धांतिक दर्शन में ज़्यादा उलझे हुए थे। इसलिए वे बुद्ध के व्यावहारिक संदेश का महत्व पूरी तरह नहीं समझ सके।

शम्अ-ए-हक़ से जो मुनव्वर हो ये वह महफ़िल न थी

बारिश-ए-रहमत हुई लेकिन ज़मीं क़ाबिल न थी

यहाँ इक़बाल ने बहुत सुंदर प्रतीक का प्रयोग किया है। "शम्अ-ए-हक़" से मतलब गौतम बुद्ध की सच्ची और उज्ज्वल शिक्षाओं से है। वे कहते हैं कि जिस समाज में यह संदेश पहुँचा, वह उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। जैसे अच्छी बारिश होने पर भी यदि ज़मीन बंजर हो तो फ़सल नहीं उगती, उसी तरह बुद्ध की शिक्षाएँ महान थीं, लेकिन समाज उनसे लाभ उठाने के योग्य नहीं था।

बरहमन सरशार है अब तक मय-ए-पिंदार में

शम्अ-ए-गौतम जल रही है महफ़िल-ए-अग़्यार में

इस शेर में इक़बाल कहते हैं कि परंपरागत धार्मिक वर्ग आज भी अपने अहंकार और घमंड में डूबा हुआ है, जबकि गौतम बुद्ध की शिक्षाओं को भारत के बाहर अधिक सम्मान और स्वीकार्यता मिली। "महफ़िल-ए-अग़्यार" से उनका संकेत चीन, जापान, श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार, तिब्बत और उन दूसरे देशों की ओर है, जहाँ बौद्ध धर्म को अपनाया गया और गौतम बुद्ध की शिक्षाओं का सम्मान किया गया।

जावेदनामा में गौतम बुद्ध का ज़िक्र

अल्लामा इक़बाल ने अपनी लंबी फ़ारसी नज़्म "जावेदनामा" में गौतम बुद्ध का बहुत आदर और सम्मान के साथ ज़िक्र किया है। इस नज़्म में कल्पना के अनुसार मौलाना रूमी, इक़बाल को आसमानों की सैर कराते हैं। इस सफ़र के दौरान "तासीन" नाम की जगह पर उनकी मुलाक़ात गौतम बुद्ध से होती है।

गौतम बुद्ध के ऊँचे चरित्र और महान जीवन को सामने रखते हुए इक़बाल कहते हैं:

मये दीरीना व माशूक़-ए जवाँ चीज़े नीस्त

पेश-ए साहिब-नज़राँ हूर-ए जिनाँ चीज़े नीस्त

इस शेर में इक़बाल कहते हैं कि पुरानी शराब, जवान महबूब या जन्नत की हूरें भी सच्ची समझ रखने वाले लोगों का असली मक़सद नहीं होतीं। वे इन चीज़ों से आगे बढ़कर ईश्वर की पहचान, सच्चे प्रेम और आत्मिक ऊँचाई को ज़्यादा अहमियत देते हैं। इस शेर के पीछे गौतम बुद्ध की वही घटना है, जब उन्होंने राज-पाट, महल और परिवार छोड़कर सत्य की खोज का रास्ता चुना।

हर चि अज़ मुहकम ओ पायंदा शनासी गुज़रद

कोह ओ सहरा ओ बर ओ बहर ओ कराँ चीज़े नीस्त

इसका मतलब है कि जो इंसान सच्चाई को पहचान लेता है, उसके लिए पहाड़, जंगल, धरती, समंदर और दुनिया की सारी बड़ी-बड़ी चीज़ें भी हमेशा रहने वाली नहीं होतीं। सब कुछ एक दिन ख़त्म हो जाता है, केवल ईश्वर ही हमेशा रहने वाला है।

दानिश-ए मग़रिबियान फ़लसफ़ा-ए मशरिकियान

हमा बुतख़ाना ओ दर तवाफ़-ए बुताँ चीज़े नीस्त

इक़बाल कहते हैं कि अगर पश्चिम का ज्ञान और पूर्व का दर्शन इंसान को ईश्वर तक न पहुँचाए, तो उसका कोई बड़ा फ़ायदा नहीं। सिर्फ़ दिमाग़ और बहस से मंज़िल नहीं मिलती, उसके साथ आत्मिक समझ भी ज़रूरी है।

गौतम बुद्ध की खोज भी केवल तर्क तक सीमित नहीं थी। उन्होंने जीवन को गहराई से समझने की कोशिश की। कहा जाता है कि एक बीमार आदमी और फिर एक मृत व्यक्ति को देखकर उन्होंने जीवन की सच्चाई पर विचार करना शुरू किया। ऐसे दृश्य तो हर कोई देखता है, लेकिन बुद्ध ने उनसे सीख ली और सत्य की तलाश में निकल पड़े।

अज़ ख़ुद अंदेश व अज़ीं बादिया तरसाँ मगुज़र

कि तू हस्ती व वुजूद ओ जहाँ चीज़े नीस्त

इस शेर में इक़बाल कहते हैं कि अपनी ख़ुदी को पहचानो और मुश्किलों से मत डरो। जब इंसान अपने अंदर की ताक़त पहचान लेता है, तब दुनिया की बड़ी से बड़ी ताक़त भी छोटी लगने लगती है। गौतम बुद्ध ने राज-पाट छोड़कर यही दिखाया कि दुनिया की दौलत और आराम से बढ़कर इंसान की आत्मिक ताक़त है। यही ख़ुदी इक़बाल की शायरी का भी सबसे बड़ा संदेश है।

दर तरीक़े कि ब-नोक-ए मुझा कावीदम मन

मंज़िल ओ क़ाफ़िला ओ रेग-ए रवाँ चीज़े नीस्त

इसका मतलब है कि मैंने प्रेम और सत्य के रास्ते में इतनी कठिनाइयाँ झेलीं कि जैसे पलकों की नोक से रास्ता बनाया हो। इस राह में मंज़िल, साथी और रास्ते की रेत की कोई अहमियत नहीं रहती। असली बात लगातार चलते रहना है। यहाँ इक़बाल गौतम बुद्ध की उस कठिन साधना की ओर इशारा करते हैं, जो उन्होंने निर्वाण पाने के लिए की थी।

बगुज़र अज़ ग़ैब कि ईं वह्म ओ गुमाँ चीज़े नीस्त

दर जहाँ बूदन ओ रस्तन ज़ जहाँ चीज़े हस्त

इस शेर का मतलब है कि केवल अनदेखी बातों और अंदाज़ों में मत उलझो। असली कमाल यह है कि इंसान दुनिया में रहते हुए भी दुनिया की बुराइयों और लालच से आज़ाद रहे। गौतम बुद्ध ने अपने जीवन से यही रास्ता दिखाया।

आँ बहिश्ते कि ख़ुदाय ब-तू बख़्शद हमा हीच

ता जज़ा-ए अमल अस्त जुनाँ चीज़े हस्त

इसका मतलब है कि अगर जन्नत बिना मेहनत के मिल जाए तो उसकी क़ीमत कम है। लेकिन अगर वह इंसान के अच्छे कामों का नतीजा हो, तब उसकी असली अहमियत होती है। इक़बाल यहाँ अच्छे कर्म और मेहनत की महानता बताते हैं। उनकी शायरी में ख़ुदी के साथ-साथ कर्म और लगातार काम करते रहने का संदेश भी बहुत अहम है। इसी कारण वे गीता के कर्मयोग से भी प्रभावित थे।

राहत-ए जाँ तलबी राहत-ए जाँ चीज़े नीस्त

दर ग़म-ए हम-नफ़साँ अश्क-ए रवाँ चीज़े हस्त

इसका मतलब है कि केवल अपनी ख़ुशी और आराम चाहना कोई बड़ी बात नहीं है। असली महानता यह है कि इंसान दूसरों के दुख-दर्द में साथ खड़ा हो और उनके लिए आँसू बहाए।

चश्म-ए मख़मूर ओ निगाह-ए ग़लत-अंदाज़ ओ सुरूद

हमा ख़ूब अस्त वले ख़ुश्तर अज़ाँ चीज़े हस्त

इसका अर्थ है कि सुंदर आँखें, दिलकश नज़रें और अच्छे गीत अपनी जगह अच्छे हैं, लेकिन इन सबसे बढ़कर भी एक चीज़ है, और वह है ऊँचा चरित्र, सच्चा प्रेम और आत्मिक सुंदरता।

हुस्न-ए रुख़्सार दमे हस्त ओ दमे दीगर नीस्त

हुस्न-ए किरदार ख़यालात-ए ख़ुशाँ चीज़े हस्त

इस शेर का मतलब है कि चेहरे की सुंदरता कुछ समय की होती है। आज है, कल नहीं रहेगी। लेकिन अच्छा चरित्र, अच्छे काम और अच्छे विचार हमेशा याद रखे जाते हैं। इक़बाल के अनुसार इंसान की असली सुंदरता उसके चरित्र में होती है, चेहरे में नहीं।

इन अशआर में इक़बाल ने गौतम बुद्ध के ज़रिये यह बताया है कि दुनिया की दौलत, सुंदरता, सुख और शोहरत हमेशा रहने वाली नहीं हैं। असली दौलत ख़ुदी, सच्चा प्रेम, अच्छे कर्म, लोगों की सेवा और ऊँचा चरित्र है।

इक़बाल ने गौतम बुद्ध को पूर्व की बुद्धिमत्ता और आत्मिक समझ का प्रतीक माना है। उनके अनुसार बुद्ध ने इंसान के अंदर दया, प्रेम और भलाई की भावना जगाई। इक़बाल इस बात को भी बहुत अहम मानते हैं कि बुद्ध ने जात-पात, ऊँच-नीच और सामाजिक अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, जो उस समय के भारत में एक बहुत बड़ा और साहसिक कदम था।