Mohammad Shahid: The wizard of hockey whose stick seemed to weave a story, not just control the ball.
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
कहा जाता है कि कुछ खिलाड़ी खेलते हैं और कुछ खेल को कला बना देते हैं। मोहम्मद शाहिद उन्हीं खिलाड़ियों में से एक थे। उनकी स्टिक पर गेंद आती थी तो विपक्षी डिफेंडरों के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता था कि अगला कदम क्या होगा। उनकी रफ्तार, ड्रिब्लिंग और गेंद को अपने नियंत्रण में रखने की कला ने उन्हें 1980 के दशक में भारतीय हॉकी का सबसे रोमांचक चेहरा बना दिया। “शाहिद जैसा खिलाड़ी एक बार ही पैदा होता है।”
उनके साथी और भारतीय हॉकी के दिग्गज जफर इकबाल ने उन्हें याद करते हुए कहा था कि शाहिद और हॉकी स्टिक का रिश्ता ही कुछ अलग था। वाराणसी से निकला यह लड़का आगे चलकर 1980 मॉस्को ओलंपिक में भारत की स्वर्ण पदक विजेता टीम का हिस्सा बना, तीन ओलंपिक खेले, भारतीय टीम की कप्तानी की, अर्जुन अवॉर्ड और पद्मश्री हासिल किया और अपनी असाधारण ड्रिब्लिंग के कारण हॉकी प्रेमियों के दिल में हमेशा के लिए बस गया।
खिलाड़ी का परिचय
मोहम्मद शाहिद का जन्म 14 अप्रैल 1960 को वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वह भारतीय हॉकी टीम में मुख्य रूप से फॉरवर्ड की भूमिका निभाते थे। उनकी पहचान उनकी असाधारण गति, गेंद पर नियंत्रण और ड्रिब्लिंग के लिए बनी। उन्होंने 1979 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कदम रखा और करीब एक दशक तक भारतीय हॉकी के प्रमुख खिलाड़ियों में रहे। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उन्होंने भारत के लिए 167 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले और 66 गोल किए। उन्होंने 1980, 1984 और 1988 के ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। शाहिद की सबसे बड़ी ताकत थी उनकी स्पीड और ड्रिब्लिंग। वह विपक्षी खिलाड़ियों के बीच से गेंद निकाल ले जाने के लिए मशहूर थे। उनकी इसी कला ने उन्हें भारतीय हॉकी का ‘जादूगर’ बना दिया।
शुरुआती जीवन और संघर्ष
वाराणसी की गलियों से शुरू हुआ शाहिद का सफर आसान नहीं था। उनकी प्रतिभा को शुरुआती दौर में ही पहचान मिली और वह Sports College, Lucknow से जुड़े, जहां उनकी हॉकी प्रतिभा को निखरने का मौका मिला। महज 19 साल की उम्र में 1979 Junior World Cup में भारत की ओर से खेलने का मौका मिला। फ्रांस के खिलाफ उस प्रतियोगिता में उनका प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय हॉकी के जानकारों की नजर में आया। इसके बाद मलेशिया में आयोजित चार देशों के टूर्नामेंट में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया। भारतीय कप्तान वासुदेवन भास्करन भी उनकी प्रतिभा से प्रभावित हुए। यही प्रदर्शन उन्हें 1980 की भारतीय ओलंपिक टीम तक ले गया। यानी जिस उम्र में ज्यादातर खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय हॉकी का सपना देखते हैं, उसी उम्र में शाहिद उस मंच पर अपनी पहचान बनाने लगे थे।
खेल करियर: जब हॉकी बनी कला
शाहिद के खेल को सिर्फ ‘अच्छा’ कहना उनके साथ नाइंसाफी होगी। वह मैदान पर एक कलाकार थे। उनकी ड्रिब्लिंग इतनी प्रभावशाली थी कि कई बार वह एक साथ कई डिफेंडरों को छकाकर निकल जाते थे। उनकी गति और शरीर को अचानक मोड़ने की क्षमता विपक्षी खिलाड़ियों के लिए बड़ी चुनौती थी। 1980 के Champions Trophy, कराची में उन्हें Best Forward चुना गया। इसी दौर में उनका नाम भारतीय हॉकी के सबसे खतरनाक फॉरवर्ड खिलाड़ियों में शामिल हो गया। उनकी खास तकनीकों में ‘half push-half hit’ भी शामिल थी। इसमें वह ड्रिब्लिंग के दौरान इस्तेमाल होने वाली पकड़ के साथ बेहद कम बैक-लिफ्ट लेकर गेंद को तेजी से साथी खिलाड़ी की ओर भेजते थे। इससे पास तेज और सटीक रहता था। उनकी जोड़ी जफर इकबाल के साथ बेहद लोकप्रिय रही। दोनों की आपसी समझ ने भारतीय आक्रमण को खास ताकत दी। जफर बाईं ओर और शाहिद दाईं ओर से विपक्षी डिफेंस में सेंध लगाने के लिए जाने जाते थे।
देश के लिए उपलब्धियां
मोहम्मद शाहिद के करियर का सबसे चमकदार अध्याय 1980 मॉस्को ओलंपिक था। भारत ने मॉस्को में शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीता। शाहिद इस ऐतिहासिक टीम का अहम हिस्सा थे। कई पूर्व खिलाड़ियों ने उस जीत में उनके योगदान को महत्वपूर्ण माना। इसके बाद शाहिद ने 1982 एशियन गेम्स में भारत के लिए रजत पदक जीता। हालांकि फाइनल में भारत को पाकिस्तान से हार का सामना करना पड़ा, लेकिन शाहिद का प्रदर्शन पूरे टूर्नामेंट में चर्चा में रहा। 1986 के सियोल एशियन गेम्स में भारत ने कांस्य पदक जीता और शाहिद उस टीम के कप्तान भी रहे। उनके प्रदर्शन के बाद उन्हें Asian All-Star Team में जगह मिली। उन्होंने भारत के लिए 1980, 1984 और 1988 ओलंपिक खेले। 1984 लॉस एंजिल्स और 1988 सियोल ओलंपिक में भी वह भारतीय टीम का हिस्सा रहे। 1985-86 के दौरान उन्हें भारतीय टीम की कप्तानी की जिम्मेदारी भी मिली।
अर्जुन अवॉर्ड तक का सफर
जब शाहिद ने भारतीय हॉकी में अपनी पहचान बनाई, तब उनकी उम्र ज्यादा नहीं थी। लेकिन कम उम्र में ही उनके प्रदर्शन ने उन्हें देश के शीर्ष खिलाड़ियों में ला खड़ा किया। 1980 मॉस्को ओलंपिक का स्वर्ण, 1980 Champions Trophy में Best Forward का सम्मान और अंतरराष्ट्रीय हॉकी में लगातार प्रभावशाली प्रदर्शन ने उनके कद को और बड़ा किया। इसी शानदार प्रदर्शन के लिए उन्हें 1980-81 में अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। Hockey India की आधिकारिक सूची में भी मोहम्मद शाहिद का नाम 1980 के पुरुष अर्जुन अवॉर्ड विजेता के रूप में दर्ज है। इसके बाद 1986 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। इस तरह अर्जुन अवॉर्ड उनके लिए सिर्फ एक पुरस्कार नहीं था, बल्कि भारतीय हॉकी में उनके शुरुआती लेकिन बेहद प्रभावशाली करियर की राष्ट्रीय पहचान थी।
प्रेरक कहानी: चार डिफेंडरों के बीच भी नहीं रुकी उनकी स्टिक
मोहम्मद शाहिद की प्रतिभा का अंदाजा एक पुराने किस्से से लगाया जा सकता है। 1982 विश्व कप में नीदरलैंड्स के खिलाफ एक मौके पर चार डच खिलाड़ी शाहिद के आसपास आ गए थे। मैदान पर जगह बेहद कम थी, लेकिन शाहिद ने अपनी ड्रिब्लिंग से उन चारों को चकमा दिया और गेंद लेकर बाहर निकल गए। उनके साथी एम.एम. सोमाया ने बाद में इस घटना को याद करते हुए कहा कि ऐसी स्थिति से गेंद लेकर निकलना सिर्फ शाहिद ही कर सकते थे। यही उनकी सबसे बड़ी खासियत थी वह दबाव में घबराते नहीं थे। जितने ज्यादा डिफेंडर सामने आते, उनकी ड्रिब्लिंग उतनी ही रोमांचक हो जाती। उनके खेल की खूबसूरती यह थी कि वह सिर्फ गोल करने की कोशिश नहीं करते थे। वह दर्शकों को यह महसूस कराते थे कि हॉकी भी एक कला हो सकती है।
क्रिकेट के दौर में हॉकी का सुपरस्टार
1980 के दशक में भारतीय खेल जगत में क्रिकेट का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था। 1983 विश्व कप के बाद क्रिकेट सितारों की लोकप्रियता आसमान छू रही थी। लेकिन उस दौर में मोहम्मद शाहिद की अपनी अलग पहचान थी। उनकी हॉकी देखने के लिए लोग इंतजार करते थे। पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान सौरव गांगुली ने भी उन्हें अपना पसंदीदा खिलाड़ी बताया था और कहा था कि वह शाहिद को खेलते देखने के लिए रातों तक जागते थे। यह बताता है कि शाहिद केवल हॉकी प्रशंसकों के खिलाड़ी नहीं थे। उनकी कला ने दूसरे खेलों के प्रशंसकों को भी आकर्षित किया।
खेल के बाद की जिंदगी
अंतरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास लेने के बाद शाहिद भारतीय रेलवे से जुड़े रहे। उन्होंने रेलवे की हॉकी टीम का भी प्रतिनिधित्व किया और राष्ट्रीय हॉकी चैंपियनशिप में हिस्सा लिया। 1988 में रेलवे ने दिल्ली में राष्ट्रीय खिताब भी जीता। उनका अंतरराष्ट्रीय करियर 1989 के आसपास समाप्त हुआ और बाद के वर्षों में वह खेल जगत से जुड़े रहे। लेकिन मैदान से दूर जाने के बाद भी उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई। भारतीय हॉकी में उनकी ड्रिब्लिंग और खेल शैली को आज भी एक मिसाल के तौर पर याद किया जाता है।
आज वे क्या कर रहे हैं?
मोहम्मद शाहिद अब हमारे बीच नहीं हैं। 20 जुलाई 2016 को 56 वर्ष की उम्र में गुरुग्राम में उनका निधन हुआ। वह गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे और इलाज के दौरान उनकी हालत बिगड़ती गई। उनके निधन पर अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ (FIH) ने उन्हें भारतीय हॉकी का महान खिलाड़ी और एक सच्चा सुपरस्टार बताया। उनकी विरासत आज भी जीवित है। 2025 में वाराणसी स्थित उनके पुश्तैनी घर को सड़क चौड़ीकरण परियोजना के लिए हटाए जाने की योजना सामने आई तो परिवार ने सरकार से वहां मोहम्मद शाहिद के नाम पर स्मारक या चौक बनाए जाने की मांग की। परिवार के अनुसार यह घर न सिर्फ उनका जन्मस्थान था, बल्कि युवा हॉकी खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का केंद्र भी रहा था। 2026 में वाराणसी में All India Padma Shri Mohammad Shahid Invitation Prize Money Men's Hockey Competition का आयोजन भी हुआ, जो उनके नाम और विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने का एक उदाहरण है।
मोहम्मद शाहिद: एक खिलाड़ी नहीं, हॉकी की कला
मोहम्मद शाहिद के करियर को अगर कुछ शब्दों में समेटना हो तो वे होंगे रफ्तार, हुनर, ड्रिब्लिंग और जुनून। उन्होंने भारत को 1980 ओलंपिक का स्वर्ण दिलाने वाली टीम में योगदान दिया, एशियन गेम्स में पदक जीते, तीन ओलंपिक खेले, भारतीय टीम की कप्तानी की और अर्जुन अवॉर्ड तथा पद्मश्री हासिल किया। लेकिन उनके आंकड़ों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण उनकी खेलने की शैली थी। वह गेंद को सिर्फ आगे नहीं बढ़ाते थे वह गेंद के साथ कहानी लिखते थे। इसीलिए मोहम्मद शाहिद का नाम भारतीय हॉकी के इतिहास में सिर्फ एक अर्जुन अवॉर्डी या ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट के तौर पर नहीं लिया जाता। उन्हें उस खिलाड़ी के रूप में याद किया जाता है जिसने हॉकी को देखने वालों को यह महसूस कराया कि मैदान पर खेल भी कविता की तरह खूबसूरत हो सकता है।