पल्लब भट्टाचार्य
एक ऐसी दुनिया में, जो धार्मिक पहचानों के आधार पर लगातार बंटती जा रही है और जहां आस्था को अक्सर उपचार के बजाय विभाजन के लिए इस्तेमाल किया जाता है, यह भूल जाना आसान है कि जिन धर्मों पर भेद पैदा करने का आरोप लगाया जाता है, वही मानवता की कुछ गहरी साझा परंपराओं को भी पोषित करते हैं। इनमें उपवास एक शांत लेकिन अत्यंत प्रभावशाली धागे की तरह है, जो लगभग हर प्रमुख धार्मिक परंपरा में दिखाई देता है। यह कोई मामूली अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक साझा नैतिक भाषा है, जो आत्म-संयम, करुणा, विनम्रता और जीवन के गहरे अर्थ की खोज की बात करती है। ऐसे समय में जब धार्मिक भिन्नताएं प्रमुख दिखाई देती हैं, यह प्राचीन परंपरा एकता की ठोस जमीन प्रदान करती है।
विभिन्न आस्थाओं और महाद्वीपों में उपवास को आत्म-अनुशासन और आध्यात्मिक उन्नति के साधन के रूप में अपनाया गया है। मुसलमान रमजान के महीने में सुबह से शाम तक भोजन और पानी से परहेज़ करते हैं, केवल आज्ञापालन के लिए नहीं बल्कि धार्मिकता और गरीबों के प्रति सहानुभूति विकसित करने के लिए। ईसाई लेंट के दौरान उपवास रखते हैं, जो जंगल में यीशु के चालीस दिनों की स्मृति में आत्म-नवीकरण और प्रायश्चित की तैयारी का समय होता है।
यहूदी योम किप्पुर, अर्थात प्रायश्चित दिवस, पर उपवास रखते हैं और शारीरिक आवश्यकताओं को त्यागकर क्षमा, मेल-मिलाप और नैतिक सुधार पर ध्यान केंद्रित करते हैं। हिंदू विभिन्न प्रकार के व्रत रखते हैं, यह मानते हुए कि संयम शरीर और मन को शुद्ध करता है और आत्म-नियंत्रण को मजबूत करता है।
जैन धर्म में उपवास आध्यात्मिक जीवन का केंद्र है, जिसे कर्मबंधन से मुक्ति और अहिंसा व क्षमा के विकास का माध्यम माना जाता है। बौद्ध धर्म में पवित्र दिनों पर उपवास रखकर सजगता बढ़ाई जाती है और इच्छाओं से आसक्ति कम की जाती है, जबकि बहाई धर्म के अनुयायी नए वर्ष की तैयारी के रूप में उन्नीस दिन का उपवास रखते हैं। सिख धर्म, यद्यपि अनुष्ठानिक उपवास को स्वीकार नहीं करता, फिर भी मानसिक अनुशासन और इच्छाओं पर नियंत्रण पर जोर देकर उसी आंतरिक उद्देश्य को महत्व देता है।

ध्यान देने योग्य बात केवल उपवास की व्यापकता नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य की समानता है। हर जगह उपवास का मकसद अतिरेक को नियंत्रित करना, अहंकार को नम्र बनाना और यह याद दिलाना है कि जीवन केवल भौतिक उपभोग से नहीं चलता। भूख एक शिक्षक बन जाती है।
जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से वह अनुभव करता है जिसे करोड़ों लोग अनिच्छा से झेलते हैं, तो उसमें करुणा जागती है,ऐसी करुणा जो कोई प्रवचन नहीं सिखा सकता। यही कारण है कि कई धर्मों में उपवास दान से जुड़ा हुआ है। रमजान में उदारता और जकात पर जोर दिया जाता है, ईसाई लेंट गरीबों की सहायता का आह्वान करता है, यहूदी परंपरा प्रायश्चित को न्याय से जोड़ती है, और हिंदू व जैन परंपराओं में उपवास के साथ दान का समावेश होता है। संदेश स्पष्ट है: ऐसा आध्यात्मिक अनुशासन जो हृदय को दूसरों के लिए न खोले, अधूरा है।
इसी साझा नैतिक दृष्टि में उपवास की वह क्षमता छिपी है, जो विभाजित दुनिया में सेतु का काम कर सकती है। जब विभिन्न धर्मों के लोग यह समझते हैं कि उनके पड़ोसी भी किसी उच्च उद्देश्य के लिए भूख का अनुभव करते हैं, तो संदेह कम होने लगता है।

रमजान के दौरान साझा इफ्तार जैसे अंतरधार्मिक आयोजन यह दिखाते हैं कि संवाद तब सहज हो जाता है, जब लोग सिद्धांतों पर बहस करने के बजाय अनुभव साझा करने के लिए मिलते हैं। रोज़ा खोलने के क्षण में साथ बैठकर लोग पाते हैं कि संयम के माध्यम से वे जिस शांति, नैतिक स्पष्टता और किसी उच्च शक्ति से जुड़ाव की तलाश करते हैं, वह आश्चर्यजनक रूप से समान है। ऐसे अनुभव “दूसरे” को मानवीय बनाते हैं और भय तथा शत्रुता की उन कथाओं को कमजोर करते हैं जो अज्ञानता पर आधारित होती हैं।
उपवास आधुनिक उपभोगवादी संस्कृति को भी चुनौती देता है, जो धार्मिक सीमाओं से परे फैल चुकी है। ऐसे समाज में जहां त्वरित संतुष्टि और अति-उपभोग सामान्य हो गया है, “बस अब काफी है” कहना एक सांस्कृतिक प्रतिरोध बन जाता है।
जब विभिन्न आस्थाओं के लोग मिलकर संयम को अपनाते हैं, तो यह संयम, कमजोरों के प्रति संवेदनशीलता और पृथ्वी के प्रति जिम्मेदारी की साझा नैतिकता को जन्म दे सकता है। इस अर्थ में उपवास केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक कर्म भी है, जो याद दिलाता है कि संयम अभाव नहीं, बल्कि शक्ति का स्रोत हो सकता है।

इसके लिए किसी धर्म को अपने सिद्धांतों को त्यागने या मिलाने की आवश्यकता नहीं है। एकता का अर्थ एकरूपता नहीं होता। उपवास की शक्ति इसी में है कि यह लोगों को अपनी-अपनी परंपराओं में जड़े रहते हुए भी साझा मानवीय आकांक्षा को पहचानने का अवसर देता है। हर धर्म अपने ग्रंथों और दर्शन के माध्यम से उपवास की व्याख्या करता है, फिर भी उसका अनुभव सीमाओं के पार एक जैसा महसूस होता है।
जब धार्मिक तनाव राजनीति और सामाजिक जीवन को प्रभावित कर रहे हैं, तब ऐसे साझा आधार को फिर से खोज निकालना आदर्शवाद नहीं, बल्कि आवश्यकता है। उपवास एक दुर्लभ अवसर प्रदान करता है,ऐसी परंपरा जो अपनी-अपनी आस्थाओं में सम्मानित है, और फिर भी जुड़ाव का बिंदु बन सकती है। जब भूख को बहिष्कार के हथियार के रूप में नहीं, बल्कि साझा कमजोरी और आशा की याद दिलाने वाले अनुभव के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो वह एक ऐसी भाषा बन जाती है जिसे हर कोई समझता है। उसी भाषा में आस्था विभाजन की रेखा नहीं, बल्कि एक बार फिर से सेतु बन जाती है।