क्या कमजोर पड़ रही है ट्रेड यूनियनों की ताकत ?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 18-02-2026
Is the power of trade unions weakening?
Is the power of trade unions weakening?

 

कमल मदिशेट्टी

12 फरवरी को केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच द्वारा बुलाया गया “भारत बंद” देशव्यापी बंद के रूप में प्रस्तुत किया गया था, जिसका उद्देश्य संगठित मजदूर शक्ति की मजबूती दिखाना था। लेकिन वास्तविकता में इस दिन ने यह दिखाया कि राष्ट्रीय स्तर पर उसका प्रभाव कितना कम हो गया है। यूनियन नेताओं ने बड़ी भागीदारी का दावा किया, पर कई राज्यों से आई रिपोर्टों में बताया गया कि ज्यादातर शहरों में व्यापार सामान्य रहा, कई जगह सार्वजनिक परिवहन चलता रहा और औद्योगिक गतिविधियां केवल कुछ स्थानों पर ही प्रभावित हुईं।

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कुछ क्षेत्रों को छोड़कर, जहां यूनियनों का मजबूत नेटवर्क है, दैनिक जीवन सामान्य ही रहा। यहां तक कि जिन औद्योगिक इलाकों में हड़ताल की खबरें थीं, वहां भी कई इकाइयां आंशिक उपस्थिति के साथ चलती रहीं। “भारत बंद” जैसे बड़े दावे और जमीन पर सीमित असर के बीच का अंतर साफ दिखाई दिया।

यह परिणाम एक गहरी सच्चाई को दर्शाता है: भारत का श्रम बाजार लंबे समय से असंगठित क्षेत्र से प्रभावित रहा है और आज भी यह स्थिति बनी हुई है। लगभग 85–90% कामगार असंगठित रोजगार में हैं, जहां उन्हें स्थायी नौकरी और सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता। हाल के सर्वेक्षण बताते हैं कि अधिकांश लोग नियमित वेतनभोगी कर्मचारी नहीं, बल्कि स्व-रोजगार में हैं।

इसका मतलब है कि पारंपरिक यूनियन से जुड़े कामगारों की संख्या सीमित है। आज तेजी से बढ़ते रोजगार के क्षेत्र सेवाएं, छोटे व्यवसाय, ठेका काम और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आधारित गिग कार्य हैं। ऐसे माहौल में पारंपरिक यूनियन मॉडल,जो बड़े कारखानों और स्थायी कर्मचारियों पर आधारित है,बहुत कम लोगों तक ही पहुंच पाता है। जब लोग डिलीवरी पार्टनर, फ्रीलांसर, छोटे व्यापारी या सूक्ष्म उद्यमी हों, तो देशव्यापी हड़ताल उनके रोज़गार की वास्तविकता से मेल नहीं खाती।

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12 फरवरी का बंद इसी दूरी को दिखाता है। केरल में बंद लगभग पूरी तरह सफल रहा, लेकिन वहां जबरन बंद करवाने के आरोप और सार्वजनिक आलोचना भी हुई। पश्चिमी और उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में असर असमान रहा, जहां केवल कुछ कारखाने ही बंद हुए।

कई जगह खबरें स्वैच्छिक भागीदारी से ज्यादा एहतियाती गिरफ्तारियों और सड़क या रेल मार्ग रोकने की कोशिशों पर केंद्रित रहीं। जब किसी आंदोलन को अपनी ताकत दिखाने के लिए अवरोध और प्रतीकात्मक रुकावटों का सहारा लेना पड़े, तो वह व्यापक जनसमर्थन से दूर दिखाई देता है।

सामान्य नागरिकों के लिए ऐसी हड़तालें अक्सर असुविधा और आर्थिक नुकसान का कारण बनती हैं। यात्रियों को परेशानी होती है, छोटे व्यवसायों की एक दिन की कमाई चली जाती है, और आवश्यक सेवाएं प्रभावित होती हैं। दैनिक मजदूरी करने वालों और ठेका श्रमिकों के लिए हड़ताल में शामिल होना आय खोने जैसा है, बिना किसी निश्चित लाभ के। अस्पताल जाना, परीक्षाएं और रोजमर्रा के कामकाज बाधित हो जाते हैं। जो “बंद” कभी लोकतांत्रिक आंदोलन का मजबूत माध्यम माना जाता था, वह अब कई लोगों को थोपे गए व्यवधान जैसा लगता है।

यूनियनों और जनता के बीच बढ़ती दूरी के कई कारण हैं। रोजगार के ढांचे में बदलाव बहुत तेज़ी से हुआ है, लेकिन यूनियनों की रणनीति उतनी नहीं बदली। असंगठित और गिग कामगार पारंपरिक ढांचे में आसानी से फिट नहीं होते। यूनियन नेतृत्व अभी भी पुराने क्षेत्रों और सार्वजनिक उपक्रमों में केंद्रित है, जहां उनका प्रभाव ज्यादा है लेकिन प्रतिनिधित्व सीमित है। हड़ताल की मांगें अक्सर सुधारों और निजीकरण का विरोध करने पर केंद्रित होती हैं, लेकिन व्यवहारिक विकल्प कम ही सामने आते हैं।

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इससे यह धारणा बनती है कि यूनियन बदलाव का विरोध कर रही हैं, न कि रचनात्मक संवाद कर रही हैं। यूनियनों के बीच आपसी विभाजन भी उनकी एकजुटता और संदेश को कमजोर करता है, जबकि आज के अस्थिर रोजगार माहौल में लंबे समय तक आंदोलन करना भी मुश्किल है।

यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक व्यापार वातावरण अस्थिर है और आपूर्ति श्रृंखलाएं बदल रही हैं। फिर भी भारत ने कई मुक्त व्यापार समझौते किए हैं और खुद को एक विश्वसनीय विनिर्माण और सेवा साझेदार के रूप में स्थापित किया है। ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय व्यापार अनिश्चित है, भारत के पास नए औद्योगिक अवसर हैं। देश इस अवसर को गंवा नहीं सकता—जैसा कि तीन दशक पहले चीन ने वैश्विक सुधारों और एकीकरण के जरिए अवसर का लाभ उठाकर खुद को दुनिया की फैक्ट्री बना लिया।

इसका मतलब यह नहीं कि श्रमिक संगठन की आवश्यकता कम हो गई है। बल्कि जैसे-जैसे भारत “मेक इन इंडिया” जैसी पहलों को आगे बढ़ा रहा है और वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ रहा है, श्रमिक कल्याण, कौशल विकास, उत्पादकता और सामाजिक सुरक्षा और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

लेकिन आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में वैधता केवल काम रोकने की क्षमता से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से सुधारों में भाग लेने से मिलती है। ट्रेड यूनियन अगर कौशल विकास, लाभों की पोर्टेबिलिटी, कार्यस्थल सुरक्षा और विवाद समाधान जैसे विषयों पर ठोस सुझाव दें, तो उनकी विश्वसनीयता बढ़ेगी,सिर्फ बंद और हड़ताल करने से नहीं।

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संपूर्ण भारत में हड़तालों की घटती प्रभावशीलता केवल संस्थागत कमजोरी नहीं, बल्कि एक मोड़ का संकेत है। एक उभरता हुआ भारत जब वैश्विक अवसरों को स्थायी समृद्धि में बदलना चाहता है—और संविधान के अनुसार नागरिकों को सम्मानजनक आजीविका का अवसर देना चाहता है,तब ट्रेड यूनियनों के सामने एक महत्वपूर्ण विकल्प है।

वे अपनी रणनीति बदलकर विकास में साझेदार बन सकती हैं और साथ ही श्रमिकों की गरिमा की रक्षा कर सकती हैं। या फिर वे प्रतीकात्मक बंद तक सीमित रह सकती हैं। पहला रास्ता ही श्रमिक हितों को भारत की आर्थिक प्रगति से जोड़ सकता है। और आज के समय में यह विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है।

( कमल मदीशेट्टी ऋषिहुड यूनिवर्सिटी, हरियाणा में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)