पलाश : वसंत की आग में दहकता सौंदर्य

Story by  मंजीत ठाकुर | Published by  onikamaheshwari | Date 17-02-2026
Palash: Beauty blazing in the fire of spring
Palash: Beauty blazing in the fire of spring

 

मंजीत ठाकुर  

आप कभी चलिए मेरे साथ मधुपुर. जैसे ही आप जमुई स्टेशन पार करेंगे और दोनों तरफ जंगलों और ऊंची-नीची घाटियों का इलाका शुरू होगा, आपको विलक्षण चीज दिखेगी. झाझा, सिमुलतला, जसीडीह और मधुपुर... इस पूरे रास्ते में रेल लाईन के दोनों तरफ घाटी जंगलों से भरी है और अब, फरवरी में गरमाहट आने के बाद इन जंगलों में खिलते हैं पलाश.

जैसे ही फाल्गुन की ठंडी सुबहें ढलने लगती हैं और हवा में वसंत की हल्की सुगंध घुलने लगती है, धरती पर एक अद्भुत चमत्कार घटित होता है. न जाने कहाँ से अचानक हमारे जंगलों, खेतों की मेड़ों, नदी किनारों और पथरीली भूमि पर लाल-नारंगी आग की लपटों से सुलग उठती है. यह अग्नि किसी विनाश की नहीं, बल्कि सौंदर्य और जीवन के उत्सव की होती है. यही है पलाश का फूल.
 
Palash Tree: The Fiery Blossom of Sacrifice and Strength – Grow Billion  Trees
 
संस्कृत में किंशुक और ढाक तथा अंग्रेज़ी में फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट. वसंत का सबसे प्रखर उद्घोषक है. जब अधिकांश वृक्ष अभी पत्तियों के बोझ से मुक्त होकर निर्वस्त्र खड़े होते हैं, तब पलाश अपनी नग्न शाखाओं पर अग्नि-सा सौंदर्य ओढ़ लेता है. ऐसा लगता है मानो धरती ने खुद अपने लिए केसरिया वस्त्र बुन लिए हों.
 
संस्कृत साहित्य में पलाश का उल्लेख अत्यंत भावपूर्ण ढंग से मिलता है. अमरकोश में कहा गया है- किंशुकः पलाशो ढाकः कालिदास ने अपने काव्य में पलाश को वसंत का प्रतीक बनाकर बार-बार उकेरा है. ऋतुसंहार में वे लिखते हैं- “प्रफुल्लकिंशुकवनानि शोभन्ते” (फूलों से भरे किंशुक वन शोभायमान हो उठे हैं.) कालिदास के लिए पलाश केवल वृक्ष नहीं, ऋतुओं का जीवंत चरित्र है. मेघदूत में भी वह प्रकृति के चित्रण में पलाश की आभा को समाहित करते हैं. उनके यहाँ पलाश प्रेम, विरह और सौंदर्य तीनों का साक्षी है.
 
हिमालय की तराइयों से लेकर दक्कन के पठार तक, राजस्थान की शुष्क भूमि से लेकर मध्य भारत के जंगलों तक, हर जगह पलाश ने अपने लाल-नारंगी दस्तख़त छोड़े हैं. बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के ग्रामीण अंचलों में तो पलाश मानो लोकजीवन का अभिन्न अंग है. बसंत आते ही गाँवों के बच्चे इसकी पंखुड़ियाँ बटोरते हैं और स्त्रियाँ इन्हें पूजा-पाठ में अर्पित करती हैं.
 
हमलोग होली के टाइम में खूब पलाश तोड़कर लाते थे. उनके फूलों को डंठल से अलग करते और फिर चूने का साथ मिलाकर पानी में उबालते थे. फिर जो ऐसा पक्का रंग तैयार होता था कि साइकिल पर झक्क सफेद कुरते-धोती में जाने वाले काका हों या कुरते-पाजामे में मौलाना चा, सब रंग जाते थे.
 
Five-petalled flowers for the five-headed one! My early encounter with the Palash  flowers was around a decade ago when we were travelling by road, in my home  state, Telangana, during the time
 
जिस पलासी के युद्ध ने भारत का इतिहास बदल दिया, असल में उसका नाम पलासी इसलिए ही पड़ा था क्योंकि उसके आसपास पलाश का बहुत घना जंगल था. हालांकि, अब इस इलाके में पलाश का जंगल छोड़िए, एक पेड़ तक नहीं बचा है. हमारा जब उपनयन हुआ था तो भिक्षाटन के समय कौपीन पहने हमने हाथ में पलाश का दंड ही रखा था. पलाश दंड का ऋषियों के लिए अगर महत्व रहा है. वैदिक काल में पलाश की लकड़ी से यज्ञकुंडों के उपकरण बनाए जाते थे. शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि पलाश को पवित्र वृक्ष माना जाता था. यज्ञ की अग्नि में पलाश की समिधा डालना शुभ समझा जाता था. यह वृक्ष तपस्या, साधना और संयम का प्रतीक बन गया.
 
प्राचीन भारत में पलाश से प्राकृतिक रंग बनाए जाते थे. होली के अवसर पर पलाश के फूलों से तैयार किया गया केसरिया रंग त्वचा के लिए सुरक्षित होता था. यह परंपरा आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में जीवित है. आधुनिक रासायनिक रंगों के बीच पलाश का प्राकृतिक रंग मानो हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देता है. लोकसाहित्य में पलाश का स्थान अत्यंत भावुक है. भोजपुरी, अवधी, बुंदेली और छत्तीसगढ़ी गीतों में पलाश प्रेम, विरह और प्रतीक्षा का प्रतीक है. कहीं यह प्रिय की लाल चुनरी बन जाता है, तो कहीं विरहिणी नायिका के हृदय की ज्वाला.
 
पुरुषों के लिए वरदान से कम नहीं है पलाश के फूल, डायबिटीज से लेकर पाइल्स तक  में देते हैं फायदा ayurveda health benefits of palash flower for men  diabetes piles and leucorrhoea
 
पलाश का फूल देखने वाला व्यक्ति अनायास ही ठहर जाता है. उसकी दृष्टि कुछ क्षणों के लिए संसार से कट जाती है. लाल-नारंगी पंखुड़ियों में जैसे सूर्य का अंश समा गया हो. यह रंग केवल आँखों को नहीं, आत्मा को भी आलोकित करता है. पलाश की छाल, फूल और बीज आयुर्वेद में औषधि की तरह इस्तेमाल तो होते हैं ही, रक्तशोधक, सूजन-नाशक और त्वचा रोगों में इसका प्रयोग प्राचीन काल से होता आया है.
 
पलाश केवल एक पेड़ नहीं, एक ऋतु है. यह वसंत का घोष है, इतिहास की स्मृति है, साहित्य की पंक्ति है, लोकगीत की धुन है और साधना की अग्नि है. इसके फूलों में भारत की आत्मा झलकती है — रंगों में, विश्वास में, परंपरा में और सौंदर्य में. जब अगली बार आप कहीं निर्जन पथ पर पलाश को दहकते देखें, तो क्षणभर ठहर जाइए. समझिए कि यह केवल प्रकृति का दृश्य नहीं, बल्कि सदियों से बहती भारतीय संस्कृति की मौन कविता है, जो बिना शब्दों के भी बहुत कुछ कह जाती है.