कोलकाता, जिसे दुनिया 'सिटी ऑफ जॉय' के नाम से जानती है, रमजान के मुकद्दस महीने में एक अलग ही रूहानी और सांस्कृतिक आभा से सराबोर हो जाता है। शहर की व्यस्त सड़कों से लेकर गलियों के आखिरी छोर तक, इन दिनों एक ऐसी खुशबू तैर रही है जो केवल नाक को नहीं, बल्कि रूह को सुकून देती है। रमजान के इस पाक महीने में अतर (इत्र) लगाना सुन्नत माना जाता है। कहा जाता है कि पैगंबर मुहम्मद साहब को खुशबू बेहद पसंद थी और वे रोजे की हालत में भी इसका इस्तेमाल फरमाते थे।
इसी सुन्नत का पालन करने और ईद की तैयारियों को मुकम्मल करने के लिए कोलकाता की पार्क स्ट्रीट और चितपुर रोड जैसे प्रमुख बाजारों में खरीदारों का हुजूम उमड़ पड़ा है। विशेषकर मध्य कोलकाता की ऐतिहासिक ज़करिया स्ट्रीट इन दिनों व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र बनी हुई है।
नाखुदा मस्जिद के सान्निध्य में बसा यह इलाका अतर, टोपी और तस्बीह का वह समंदर है, जहाँ से न केवल शहर बल्कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे दुकानदार भी माल ले जाकर बेचते हैं। कोलकाता के सबसे बड़े होलसेल सप्लायर मोहम्मद अश्फ़ाक साहब के पास इन दिनों बात करने की फुर्सत नहीं है।
उनका व्यापारिक अनुभव कहता है कि रमजान शुरू होने से दो हफ्ते पहले से जो सप्लाई शुरू होती है, वह आधे रमजान तक अपने शबाब पर रहती है। हालांकि, वे दबी ज़ुबान में यह स्वीकार करते हैं कि इस बार महंगाई ने बाजार की रफ्तार को थोड़ा धीमा जरूर किया है, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि अलविदा जुमे के करीब आते-आते कारोबार में जबरदस्त उछाल आएगा।
ज़करिया स्ट्रीट की गलियों में कदम रखते ही 'चितपुर अतर' की सदियों पुरानी विरासत आपका स्वागत करती है। यहाँ इत्र बेचना महज़ एक पेशा नहीं, बल्कि एक कला है जिसे पीढ़ियों से सहेजा गया है। इत्र व्यवसायी जनाब अमानुल्लाह, जिनकी उम्र 62 साल हो चुकी है, बाजार के बदलते मिजाज को बखूबी समझते हैं।
वे बताते हैं कि ग्राहक आज भी वही रूहानी खुशबू यानी 'मजुआ' और 'खस' ढूंढते हुए आते हैं, लेकिन उनकी क्रय शक्ति पर महंगाई का साया साफ दिख रहा है। जो मध्यमवर्गीय ग्राहक पहले 12ml की शीशी बेझिझक खरीदा करता था, वह अब जेब की तंगी के कारण 3ml या 6ml की शीशी से ही काम चला रहा है।
इसके पीछे का गणित बहुत गहरा है; उत्तर प्रदेश के कन्नौज से आने वाले कच्चे माल, फूलों के अर्क और बेस ऑयल की कीमतों में पिछले साल के मुकाबले 25 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है। साथ ही परिवहन की लागत और भाड़े में वृद्धि ने अतर को आम आदमी के लिए थोड़ा और 'महंगा' बना दिया है। व्यापारियों के लिए मुनाफा कमाना अब तलवार की धार पर चलने जैसा है, क्योंकि अगर वे कीमतें बहुत अधिक बढ़ाते हैं तो ग्राहक टूट जाता है, और अगर नहीं बढ़ाते तो लागत निकालना मुश्किल हो जाता है।
इत्र के बाद अगर किसी चीज़ की सबसे ज्यादा रौनक है, तो वह है टोपी बाजार। ज़करिया स्ट्रीट की दुकानों पर टोपियों के ऐसे अंबार लगे हैं कि नज़रें थक जाएं पर वैरायटी खत्म न हो। इस साल युवाओं के बीच 'तुर्की फेज़' और 'इंडोनेशियाई बुनावट' वाली टोपियों की जबरदस्त मांग है।
टोपी व्यवसायी रफीक आलम एक गंभीर चिंता साझा करते हैं कि कैसे मशीनी युग ने हाथ के हुनर को संकट में डाल दिया है। वे बताते हैं कि एक टोपी को हाथ से बुनने में कारीगर को कई दिनों की मेहनत लगती है, लेकिन बाजार में अब चीन और स्थानीय कारखानों से बनी सस्ती मशीनी टोपियाँ आ गई हैं। लोग अक्सर कला के बजाय कीमत देखते हैं, जिससे हाथ के कारीगरों का घर चलाना मुश्किल हो रहा है।
इसके अलावा धागे और कपड़े के दाम बढ़ने से एक साधारण टोपी की कीमत में भी इस साल 10 से 15 रुपये की बढ़ोतरी देखी गई है। यही हाल तस्बीह और अन्य नमाजी सामानों का भी है, जहाँ हर चीज़ पर महंगाई की छाप दिखाई देती है।
रमजान का जिक्र हो और लच्छा-सेंवई की बात न आए, यह नामुमकिन है। राजबाज़ार और कोलु टोला के कारखानों में इन दिनों दिन-रात भट्टियाँ धधक रही हैं। सेंवई कारखाने के मालिक अब्दुल बारी का कहना है कि इस बार मैदे, चीनी और घी के दाम में जबरदस्त उछाल आया है। जिस कोयले से भट्टियाँ जलती हैं, उसकी कीमत ने भी लागत बढ़ा दी है।
सेंवई की मिठास के पीछे कारीगरों और मालिकों का कड़वा संघर्ष छिपा है। बाजार में खरीदारी करने आए आम लोग, जैसे इरफान, बताते हैं कि पिछले साल जो लच्छा 120 रुपये किलो था, वह अब 150 रुपये के करीब बिक रहा है। त्योहार की रस्म अदायगी के लिए सामान तो खरीदना ही है, लेकिन बजट को संतुलित करने के लिए लोग मात्रा में कटौती कर रहे हैं।
यही हाल ज़करिया स्ट्रीट के 'फूड पैराडाइज़' का है। शाम होते ही यहाँ कवाबों और हलीम के धुएं से आसमान भर जाता है। 'आदम के सुतली कवाब' और 'सूफिया की हलीम' के दीवाने आज भी कतारों में खड़े हैं, लेकिन कवाब विक्रेताओं का कहना है कि गोश्त और मसालों की कीमतों ने उनकी कमर तोड़ दी है। मुनाफा बहुत कम हो गया है क्योंकि ग्राहकों की नाराज़गी के डर से वे प्लेट के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़ा पा रहे हैं जिस अनुपात में लागत बढ़ी है।
बाजार में घूमते हुए खरीदारों और दुकानदारों के बीच एक अजीब सा मनोवैज्ञानिक संघर्ष देखने को मिलता है। जहाँ भीड़ को देखकर लगता है कि मंदी का कोई नामोनिशान नहीं है, वहीं दुकानदारों का अनुभव कुछ और ही कहता है। रेडीमेड कुर्ते बेचने वाले अकरम बताते हैं कि इस साल 'विंडो शॉपिंग' करने वालों की तादाद बहुत ज्यादा है।
लोग कपड़े देखते हैं, डिजाइन पसंद करते हैं, दाम पूछते हैं और फिर बजट से बाहर होने पर आगे बढ़ जाते हैं। वे कहते हैं कि पिछले साल इस समय तक उनका आधा स्टॉक खत्म हो चुका था, लेकिन इस बार बिक्री की रफ्तार काफी सुस्त है। खरीदार ज़ीनत का दर्द भी कुछ ऐसा ही है; उनका कहना है कि हर सामान पर 20 से 30 टका (रुपये) की बढ़ोतरी हुई है, जिससे घर का पूरा बजट चरमरा गया है।
इसके बावजूद, कोलकाता की असली पहचान उसकी 'गंगा-जमुनी तहजीब' ज़करिया स्ट्रीट में आज भी सीना ताने खड़ी है। यहाँ केवल मुस्लिम समुदाय के लोग ही नहीं, बल्कि भारी संख्या में हिंदू और अन्य धर्मों के लोग भी इफ्तारी के वक्त हलीम और कवाबों का लुत्फ उठाते दिखते हैं। नाखुदा मस्जिद के बाहर जब अज़ान की गूँज होती है और लोग एक-दूसरे को खजूर खिलाते हैं, तो महंगाई का मुद्दा कुछ देर के लिए रूहानी सुकून के नीचे दब जाता है।
कोलकाता का यह ऐतिहासिक रमजान बाजार अपनी विरासत और आधुनिक चुनौतियों के बीच एक कठिन संघर्ष लड़ रहा है। एक तरफ सदियों पुराना हुनर और सुन्नत का पालन करने का जज्बा है, तो दूसरी तरफ मशीनी प्रतिस्पर्धा और बेतहाशा बढ़ती महंगाई। कारोबारियों और स्टॉकिस्टों को अब अलविदा जुमे के बाद आने वाले अंतिम दिनों से भारी उम्मीदें हैं, जब लोग अपनी ईद की आखिरी मिनट की खरीदारी के लिए बाजारों में टूट पड़ते हैं।
हालांकि थैली भले ही थोड़ी छोटी हो गई हो और बटुए पर बोझ बढ़ गया हो, लेकिन कोलकाता के लोगों का दिल आज भी उतना ही बड़ा है। ज़करिया स्ट्रीट की गलियों से उठती इत्र की खुशबू और कवाबों की महक यह पैगाम देती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, उत्सव का आनंद और आपसी भाईचारे की मिठास कभी कम नहीं होगी। कोलकाता की यह साझी संस्कृति और उम्मीदों का यह बाजार ही इस शहर को वाकई 'सिटी ऑफ जॉय' बनाता है।





