दिव्यांगों के लिए गांव की राह चुनौती पूर्ण

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 01-10-2026
The path to the village is challenging for the differently-abled.
The path to the village is challenging for the differently-abled.

 

FFअनिता

किसी गांव में सड़क होना और उस सड़क पर हर व्यक्ति का आसानी से चल पाना, दोनों अलग बातें हैं। अस्पताल गांव में होना और किसी दिव्यांग व्यक्ति का वहां तक बिना किसी की मदद के पहुंच पाना भी अलग बातें हैं। स्कूल की इमारत होना और उसका हर बच्चे के लिए सुलभ होना भी एक जैसी बात नहीं है। गांवों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी आज भी लोगों के जीवन को मुश्किल बनाती है।

लेकिन जब कोई व्यक्ति दिव्यांगता के साथ जीवन जी रहा हो, तो इन कमियों का असर और गहरा हो जाता है। उसके लिए गांव में रहना केवल एक जगह पर रहना नहीं, बल्कि ऐसी जगह में जीवन बिताना है जहां कई जरूरी सुविधाएं उसकी पहुंच से बाहर हो सकती हैं।

बीकानेर जिले के लूणकरणसर ब्लॉक से करीब 12 किलोमीटर दूर खियेरा गांव के सहीराम की जिंदगी इसे समझने का एक उदाहरण है। 30 वर्षीय सहीराम बचपन से दोनों पैरों से दिव्यांग हैं। वह गांव में ही जूते बनाने और मरम्मत करने का काम करते हैं।

इसी काम से होने वाली छोटी-सी आमदनी से वह अपने परिवार की जरूरतें पूरी करने की कोशिश करते हैं। सहीराम पढ़े-लिखे हैं और काम करने की इच्छा रखते हैं। लेकिन उनके लिए गांव से बाहर जाकर नौकरी तलाशना आसान नहीं है।

सहीराम की परेशानी केवल रोजगार की नहीं है। उनके लिए कहीं आना-जाना भी एक चुनौती है। उनके पास विकलांग साइकिल नहीं है। इसलिए जब भी उन्हें गांव से बाहर या किसी जरूरी जगह पर जाना होता है, उन्हें किसी दूसरे व्यक्ति की मदद लेनी पड़ती है। किसी काम के लिए बाहर जाना उनके लिए केवल यह तय करना नहीं है कि कहां जाना है, बल्कि यह भी सोचना है कि वहां तक पहुंचने के लिए किसकी मदद मिलेगी।

गांव के ही 28 वर्षीय मुखराम के सामने भी रोजगार और आने-जाने जैसी चुनौतियां हैं। वह बताते हैं कि उन्हें सरकार की ओर से दिव्यांगों के लिए चलाई जाने वाली योजनाओं की जानकारी नहीं है। यह भी एक समस्या है। योजना या सुविधा का होना तभी मायने रखता है, जब उसकी जानकारी उस व्यक्ति तक पहुंचे जिसके लिए वह बनाई गई है।

दिव्यांग लोगों की समस्या को केवल स्वास्थ्य के नजरिए से देखने से तस्वीर अधूरी रह जाती है। अगर किसी व्यक्ति को चलने में कठिनाई है, लेकिन उसके आसपास की सड़क समतल और सुगम है, सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध है, अस्पताल तक पहुंचने के लिए रैंप है, शौचालय उपयोग के अनुकूल हैं और रोजगार के अवसर उसके गांव या आसपास मौजूद हैं, तो उसकी रोजमर्रा की कठिनाइयां काफी कम हो सकती हैं। लेकिन जब इन सुविधाओं का अभाव हो, तो शरीर की एक चुनौती कई दूसरी चुनौतियों में बदल जाती है।

यही वजह है कि सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि किसी व्यक्ति को दिव्यांगता है या नहीं? सवाल यह भी होना चाहिए कि उसके आसपास का समाज और व्यवस्था उसे कितनी स्वतंत्रता देती है? 

गांव के अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र का उदाहरण ही लें। स्वास्थ्य सेवा वहां मौजूद हो सकती है, लेकिन अगर भवन तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां हों, रैंप न हो, शौचालय उपयोग के अनुकूल न हों या जांच और इलाज की प्रक्रिया में जरूरी सहायता उपलब्ध न हो, तो सुविधा होने के बावजूद व्यक्ति उसका पूरा लाभ नहीं उठा पाता।

इसी तरह स्कूल की इमारत में कक्षा तो हो सकती है, लेकिन अगर वहां तक पहुंचने का रास्ता दिव्यांग बच्चे की जरूरत के अनुसार नहीं है, तो शिक्षा का अधिकार कागज पर मौजूद रहते हुए भी व्यवहार में कमजोर पड़ जाता है।

किसी बच्चे के लिए स्कूल तक पहुंचना ही मुश्किल हो, तो उसकी पढ़ाई की निरंतरता पर भी असर पड़ सकता है। आने-जाने की सुविधा का अभाव रोजगार के रास्ते को भी छोटा कर देता है। ग्रामीण इलाकों में पहले से ही रोजगार के सीमित अवसर हैं। कई युवा रोजगार की तलाश में शहरों या दूसरे इलाकों की ओर जाते हैं। 

लेकिन किसी ऐसे व्यक्ति के लिए, जिसे चलने-फिरने में कठिनाई होती है और जिसके पास परिवहन की सुविधा नहीं है, गांव से बाहर जाकर काम तलाशना और भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में वह गांव में रहकर कोई छोटा काम करने को मजबूर हो सकता है।

सहीराम का जूते बनाने और मरम्मत करने का काम उनकी मेहनत और हुनर को दिखाता है। लेकिन एक सवाल यह भी है कि क्या यह काम उनकी पसंद है या उनके सामने उपलब्ध सीमित विकल्पों में से एक?

दिव्यांगता और गरीबी जब एक साथ मौजूद हों, तो कठिनाई और बढ़ जाती है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार किसी व्यक्ति के लिए सहायक उपकरण, निजी परिवहन, इलाज या बार-बार शहर जाने का खर्च आसानी से नहीं उठा पाता।

अगर व्यक्ति सामाजिक और आर्थिक रूप से पहले से वंचित परिवार से आता है, तो अवसरों तक उसकी पहुंच और सीमित हो सकती है। शिक्षा की कमी, रोजगार के कम अवसर, सामाजिक भेदभाव और आर्थिक कमजोरी एक-दूसरे को बढ़ाते हुए जीवन को और कठिन बना सकते हैं।

इसका असर परिवार के दूसरे सदस्यों पर भी पड़ता है। किसी सदस्य को अस्पताल ले जाने, सरकारी कार्यालय तक पहुंचाने या रोजगार के लिए बाहर ले जाने की जिम्मेदारी अक्सर परिवार के किसी दूसरे व्यक्ति को उठानी पड़ती है।

राजस्थान में इस समस्या का आकार छोटा नहीं है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में 15,63,694 दिव्यांग व्यक्ति दर्ज किए गए थे। इनमें 8,48,287 पुरुष और 7,15,407 महिलाएं थीं। यानी दिव्यांग आबादी में पुरुषों के साथ बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल हैं।

 इन आंकड़ों के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात केवल यह नहीं है कि राज्य में कितने दिव्यांग लोग हैं। यह देखना भी जरूरी है कि उनमें से कितने बच्चे स्कूल तक पहुंच पा रहे हैं, कितने लोगों के पास रोजगार है, कितने लोग अपने गांव से बाहर स्वतंत्र रूप से जा सकते हैं और कितने लोगों को आज भी रोजमर्रा की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए किसी दूसरे व्यक्ति की सहायता लेनी पड़ती है।

एक गांव तब ही वास्तव में विकसित कहा जा सकता है जब सहीराम और मुखराम जैसे दिव्यांग लोग भी अपनी जरूरत के मुताबिक बिना किसी की मदद के आ-जा सकें। जब अस्पताल की सीढ़ियां उनके लिए दीवार न बनें। जब स्कूल का रास्ता किसी बच्चे के लिए बंद रास्ता न हो।

और जब रोजगार पाने के लिए किसी व्यक्ति की दिव्यांगता उसके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा न बने। दिव्यांग लोगों को दया नहीं, अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने का अवसर चाहिए। उन्हें ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें सहायता मिलना उनका अधिकार हो, लेकिन हर छोटी जरूरत के लिए किसी दूसरे व्यक्ति पर निर्भर रहना उनकी मजबूरी न हो।

(यह लेखिका की निजी राय है)