हिंदी पखवाड़ा: एक स्मृति जो कभी धुंधली नहीं हुई

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 01-10-2026
Hindi Fortnight: A memory that never faded.
Hindi Fortnight: A memory that never faded.

 

gडॉ. अभिनव वाजपेयी

केंद्र सरकार के कार्यालयों में हाल ही में हिंदी पखवाड़ा मनाया गया, जिसका आरंभ 14सितंबर को हुआ था। हर वर्ष यह अवसर अपने साथ प्रतियोगिताएँ, संबंधित कार्यक्रम, देवनागरी लिपि में अनिवार्य बोर्ड इत्यादि लाता है। हिंदी को राजभाषा के रूप में संवर्धित करने की आवश्यकता भी दोहराई जाती है।

मेरे अनुभव के अनुसार, अनेक के लिए यह आधिकारिक कैलेंडर पर एक और दर्ज तारीख बनकर रह जाता है। पर मेरे लिए यह 1992 का द्वार खोल देता है, जब मैं एक नए स्टेशन में स्थानांतरित हुआ था। मुझे आज भी याद है कि मैंने फरवरी के अंतिम सप्ताह में पदभार संभाला था।

पदभार संभाले अभी कुछ ही दिन हुए थे कि हिंदी अधिकारी स्पष्ट रूप से चिंतित मुद्रा में मेरे कक्ष में प्रवेश किए। उन्होंने बताया कि राजभाषा संबंधी उच्चस्तरीय समिति हमारे निष्पादन की समीक्षा करने वाली है और हमारी वर्षभर की हिंदी कार्यवाही की प्रगति दर्ज करने हेतु एक प्रारूप थमा दिया। मैंने उस प्रारूप को हमारी इकाई द्वारा वर्षभर किए गए हिंदी कार्य के रिकॉर्ड के अनुसार यथावत भरा और वापस लौटा दिया।

दो दिन बाद वे पुनः आए और सूचित किया कि हमारी स्थिति ‘मानक के अनुरूप नहीं’ है। मैंने तर्कसंगत ढंग से पूछा कि पिछले ग्यारह महीनों में उनके द्वारा क्या किया गया, जबकि मैं स्वयं केवल एक सप्ताह से उस डेस्क पर बैठा था। उन्होंने प्रश्न को टाल दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी रक्षा करनी है, मानो कर्तव्य कोई ऐसा वस्त्र हो, जिसे शीघ्रता से टाँका लगाया जाए, न कि एक जिम्मेदारी जो निभाई जाए।

मैंने समाधान के रूप में वही रास्ता सुझाया जो स्वाभाविक था। हम उपलब्ध समय में अधिक मेहनत करें, वास्तविक काम बढ़ाएँ और उसी के आधार पर आँकड़े बेहतर हों। लेकिन वे आश्वस्त नहीं हुए। उनका तर्क था कि समय बहुत कम है और कर्मचारी एक दिन में आखिर कितना ही काम कर सकते हैं। जाते-जाते उन्होंने कहा कि वे कोई ‘समाधान’ लेकर लौटेंगे।

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हिंदी पखवाड़ा 2026 | लौटोका I भारतीय उच्चायोग, सुवा एवं स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र के सहयोग से यूनिवर्सिटी ऑफ फिजी के भाषा, साहित्य एवं संचार विभाग ने हिंदी दिवस समारोह आयोजन किया।

अगले दिन वे लौटे, किंतु जो प्रस्ताव वे लाए थे, वह समाधान कम और समस्या को ढकने का उपाय अधिक था। उन्होंने बड़े सहज भाव से सुझाव दिया कि वर्तमान स्थिति को दर्शाने वाले आँकड़ों को थोड़ा ‘संशोधित’ कर दिया जाए।

मैंने पूछा, “जो आँकड़े वास्तविकता का प्रतिबिंब होने चाहिए, उन्हें आखिर किस तरह संशोधित किया जा सकता है?”

उन्होंने फिर वही बात दोहराई, “अपनी खाल बचाने के लिए ऐसा करना जरूरी है।”

मैंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “यह संशोधन नहीं है। यह लिखित का झूठा आवरण है। जिस उपलब्धि के पीछे वास्तविक श्रम न हो, उसे कागज की स्याही में बढ़ा देना चतुराई नहीं है। यह उपलब्धि का मुखौटा पहने हुआ आडंबर है।”

वे फिर लौटे और इस बार उनका तर्क कुछ और था। राज्य की अन्य स्वतंत्र इकाइयों ने भी आँकड़ों में परिवर्तन के लिए सहमति दे दी थी। फिर हमारी इकाई अलग क्यों रहे?

मैंने कहा, “बहुमत की सहमति असत्य को सत्य में नहीं बदल देती।”

उस क्षण मुझे राजनीतिक विज्ञान के अपने विद्यार्थी जीवन में जॉन स्टुअर्ट मिल की वह प्रसिद्ध स्थापना याद आई। यदि समूची मानवता किसी एक मत पर सहमत हो और केवल एक व्यक्ति उससे असहमत हो, तब भी उस अकेले व्यक्ति की आवाज सुने जाने का उतना ही अधिकार है। और संभव है कि अंततः वही सही सिद्ध हो।

वह इस विषय पर हमारी अंतिम बातचीत थी। हमारे अनुभाग की अंतिम रिपोर्ट जैसी थी, वैसी ही भेजी गई। बिना किसी अलंकरण के, बिना किसी मिलावट के।

फिर निर्णय का दिन आया। समिति ने हमारे राज्य की सभी इकाइयों की समग्र स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने स्थिति को व्यापक रूप से संतोषजनक घोषित किया। बस इतना जोड़ा कि विशेष रूप से हमारी इकाई को सुधार की आवश्यकता है। सौभाग्य से न कोई फटकार लगी, न कोई हंगामा हुआ, न कोई कटु टिप्पणी और न कोई अप्रिय स्थिति पैदा हुई।

हिंदी अधिकारी के लिए बैठक संपन्न हुई और मामला समाप्त। मेरे लिए यह एक आरंभ था। इस प्रसंग ने, और विशेष रूप से उस बैठक ने, मुझ पर अमिट प्रभाव छोड़ा। इस अनुभव ने कुछ ऐसा बोया, जो पखवाड़े और उस पदस्थापन दोनों से कहीं अधिक टिकाऊ रहा।

मेरी अगली नियुक्ति पूर्वोत्तर में, शिलांग मुख्यालय के साथ हुई। वहाँ मैंने हिंदी पखवाड़े के दौरान कर्मचारियों को हिंदी से जोड़ने का प्रयास किया। आदेश देकर नहीं, बल्कि स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करके।

छोटी-सी शुरुआत रजिस्टरों में हिंदी में हस्ताक्षर करने जैसे कार्य से हुई। आधिकारिक वर्गीकरण के अनुसार वह ‘क्षेत्र ‘ग’’ था, अर्थात हिंदीतर क्षेत्र। फिर भी कर्मचारियों ने जिस उत्साह से इसे अपनाया, वह पखवाड़े तक सीमित नहीं रहा। पूरे वर्ष वह अभ्यास चलता रहा।

मैंने अपने स्तर पर प्रश्नोत्तरी और निबंध प्रतियोगिताएँ भी आयोजित कीं, ताकि कैलेंडर पर पखवाड़ा समाप्त हो जाने के बाद भी हिंदी के प्रति उत्साह बना रहे।

बाद में आंध्र प्रदेश में कार्य करते हुए भी मैंने यही तरीका अपनाया। वह भी ‘क्षेत्र ‘ग’’ था। मैंने स्वयं उदाहरण प्रस्तुत किया और फिर वही अनुभव सामने आया। कर्मचारियों ने हिंदी के प्रति अपने दायित्व को केवल औपचारिकता न मानकर पूरे वर्ष ईमानदारी और उत्साह के साथ निभाया।

कभी-कभी कर्म शब्दों से कहीं अधिक मुखर होते हैं।

हिंदी पखवाड़ा इस वर्ष भी आएगा और चला जाएगा। हर सितंबर की तरह परिपत्र जारी होंगे, प्रतियोगिताएँ होंगी, भाषण होंगे और सरकारी व्यवस्था की परिचित गति के साथ एक और पखवाड़ा इतिहास में दर्ज हो जाएगा।

परंतु यदि हम इसके भीतर निहित प्रश्न को सुनना चाहें, तो हिंदी पखवाड़ा केवल एक आयोजन की सीमा में नहीं रहता। वह हमारे सामने एक सरल, किंतु शायद कुछ असुविधाजनक प्रश्न रखता है।

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जिस कार्य का हमने दावा किया है, क्या उसके पीछे हमारा ईमानदार श्रम भी है? या हमने केवल अनुपालन की रस्म निभाई है और अंत में आँकड़ों को ही थोड़ा ‘सुधार’ दिया है?

तीस से अधिक वर्ष बीत चुके हैं। उस दिन की घटना अब मेरे जीवन की एक दूरस्थ स्मृति है, लेकिन उससे मिला सबक आज भी उतना ही स्पष्ट है।

आँकड़े महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आँकड़ों से बड़ी चीज सत्य है। उपलब्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन उपलब्धि से बड़ा उसका आधार है। और किसी भी भाषा की वास्तविक प्रतिष्ठा उन शब्दों से नहीं होती, जो हम उसके पक्ष में बोलते हैं, बल्कि उन कर्मों से होती है, जिन्हें हम उसके लिए ईमानदारी से करते हैं।

संभवतः हिंदी पखवाड़े का सबसे बड़ा अर्थ यही है। केवल आयोजन की सीमाओं से आगे बढ़कर पूरे वर्ष के आचरण में हिंदी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को उतारना।

( लेखकपूर्व अपर सचिव, संचार मंत्रालय, 2026 के राष्ट्रीय अनुभव पुरस्कार के प्राप्तकर्ताहैं)