क्या AI के दौर में CAPTCHA अब बेअसर हो चुका है?

Story by  अनिल निगम | Published by  [email protected] | Date 30-09-2026
Has CAPTCHA become ineffective in the age of AI?
Has CAPTCHA become ineffective in the age of AI?

 

ffडॉ. अनिल कुमार निगम

कभी इंटरनेट पर किसी वेबसाइट में प्रवेश करने से पहले हमें टेढ़े-मेढ़े अक्षरों अर्थात कैप्‍चा को पहचानना पड़ता था। इसके अलावा तस्वीरों में ट्रैफिक लाइट, बस या साइकिल चुननी पड़ती थी। और कई मर्तबा एक छोटे-से गणितीय सवाल का उत्तर देकर साबित करना पड़ता था कि हम इंसान हैं। यह मशीनों के खिलाफ इंसान की परीक्षा थी।

लेकिन अब स्थिति बदल रही है। मशीनें इतनी सक्षम हो चुकी हैं कि वे सिर्फ अक्षरों को पहचानने या गणित हल करने तक सीमित नहीं, बल्कि वे वेबसाइट खोल सकती हैं, जानकारी खोज सकती हैं, फॉर्म भर सकती हैं, खरीदारी कर सकती हैं और आश्‍चर्य की बात यह है कि कई डिजिटल काम इंसान की तरह कर सकती हैं। ऐसे में इंटरनेट के समक्ष एक नया प्रश्‍न खड़ा हो गया है कि अगर मशीन इंसान की तरह व्यवहार करने लगे तो वेबसाइट कैसे पहचाने कि सामने वास्तव में इंसान है?

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हाल ही में इंडियन रेलवे (आईआरसीटीसी) से जुड़ी एक वायरल तस्वीर ने इसी पुराने सवाल को नए संदर्भ में चर्चा में ला दिया। तस्वीर में ट्रेन टिकट की स्थिति देखने के लिए जटिल गणितीय कैपचा दिखाई दे रहा था। सोशल मीडिया पर इसे लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आईं। बाद में आईआरसीटीसी ने स्पष्ट किया कि उसके वर्तमान सिस्टम में ऐसा जटिल गणितीय कैप्‍चा इस्तेमाल नहीं किया जा रहा, बल्कि साधारण जोड़ या घटाव आधारित कैप्‍चा का उपयोग होता है।

विचारणीय यह है कि भले ही यह मामला एक वायरल तस्वीर का था, लेकिन इसके पीछे सवाल कहीं बड़ा छिपा है। कैप्‍चा आखिर बना ही क्यों था? इसका मूल उददेश्‍य था कि ऐसा सवाल पूछो जिसे इंसान आसानी से हल कर सके, लेकिन कंप्यूटर के लिए कठिन हो, और वेबसाइटों को automated bots से बचाना था।

टिकट बुकिंग, ऑनलाइन फॉर्म, लॉगिन, अकाउंट बनाने और दूसरी सेवाओं में bots का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होने लगा तो वेबसाइटों को यह सुनिश्चित करना पड़ा कि हर रेक्‍वेस्‍ट किसी वास्तविक व्यक्ति की ओर से आ रही है। लेकिन जिस तकनीक को कभी मशीनों को रोकने के लिए बनाया गया था, उसी मशीन ने धीरे-धीरे उसकी सीमाएं समझनी शुरू कर दीं।

आज Optical Character Recognition (OCR), computer vision और generative AI जैसी तकनीकें ऐसे कई काम कर रही हैं जिन्हें कभी केवल मानव की क्षमता माना जाता था। इसलिए ‘एक तस्वीर में ट्रैफिक लाइट पहचानिए’ जैसे पुराने परीक्षण अब उतने भरोसेमंद नहीं रहे। यानी कैप्‍चा की परीक्षा देने वाला विद्यार्थी अब खुद परीक्षा बनाने की तकनीक सीख चुका है।

असली चुनौती अब एआई एजेंट

जेनेरेटिव एआई की पहली लहर में हम ChatGPT से सवाल पूछते थे और जवाब प्राप्त करते थे। अब एआई का अगला चरण केवल जवाब देने तक सीमित नहीं है। एआई एजेंट को ऐसे काम सौंपे जा रहे हैं जिनमें वे कई चरण खुद पूरा कर सकते हैं। यही सबसे बड़ा कारण है, जहां से इंटरनेट की सुरक्षा के सामने नई चुनौती पैदा होती है।

मान लीजिए किसी व्यक्ति को किसी वेबसाइट से हर सप्ताह एक रिपोर्ट डाउनलोड करनी है। कल तक वह स्वयं वेबसाइट खोलता, लॉगिन करता, विकल्प चुनता और रिपोर्ट डाउनलोड करता था। भविष्य में वह किसी एआई एजेंट को यह काम सौंप सकता है।

ffपुराना कैप्‍चा कहता था, “साबित करो कि तुम इंसान हो।” एआई के दौर में यह सवाल पर्याप्त नहीं है। अब सवाल होना चाहिए, “तुम किसकी ओर से काम कर रहे हो और क्या तुम्हें यह काम करने की अनुमति है?” यानी इंटरनेट की सुरक्षा Human Verification से Identity Verification की ओर बढ़ रही है।

मशीन को पहचानना कठिन

आज एआई लिखित कंटेंट को पढ़कर हर बार यह तय करना आसान नहीं कि उसे इंसान ने लिखा है या मशीन ने। तस्वीरों और वीडियो के मामले में भी स्थिति तेजी से बदल रही है। डीप फेक तकनीक ने चेहरे और आवाज की विश्वसनीयता को चुनौती दी है।

यही कारण है कि साइबर सिक्‍योरिटी कंपनियां केवल कैप्‍चा पर निर्भर रहने के बजाय कई प्रकार के signals का इस्तेमाल कर रही हैं। Cloudflare का Turnstile इसका एक उदाहरण हैं।

कंपनी के अनुसार यह पारंपरिक कैप्‍चा की तरह हर उपयोगकर्ता से puzzle हल कराने के बजाय browser और interaction से जुड़े signals का इस्तेमाल करके automated traffic की पहचान करता है। कई मामलों में उपयोगकर्ता को कोई कैप्‍चा दिखाई भी नहीं देता। यानी भविष्य में शायद ऐसा कैप्‍चा होगा जिसे उपयोगकर्ता देखेगा ही नहीं।

नई व्यवस्था में वेबसाइट खुद कई संकेतों का विश्लेषण कर सकती है। उदाहरण के लिए browser environment, request pattern, interaction और session behavior जैसे संकेतों से automated activity का अनुमान लगाया जा सकता है।

Cloudflare ने 2026में Precursor नाम की technology भी पेश की है, जो पूरे user journey के दौरान behavioral signals का इस्तेमाल करके human और automated या agentic traffic में अंतर करने की कोशिश करती है।

ffसुरक्षा बढ़ाने की इस दौड़ में यह प्रश्‍न है कि वेबसाइट हमें पहचानने के लिए कितना डेटा इकट्ठा करेगी? यदि किसी वेबसाइट को यह जानना हो कि उपयोगकर्ता इंसान है या bot, तो वह उसके browser, device और व्यवहार से जुड़े अनेक संकेतों का विश्लेषण कर सकती है।

पत्रकारिता पर प्रभाव

इस बदलाव का असर मीडिया पर भी पड़ना तय है। आज समाचार वेबसाइट पर automated traffic, content scraping और फेक इनगेजमेंट जैसी चुनौतियां मौजूद हैं। कल एआई एजेंट बड़ी मात्रा में खबरें पढ़ सकते हैं, उनकी तुलना कर सकते हैं और कुछ ही सेकंड में सूचनाओं का विश्लेषण कर सकते हैं।

लेकिन इससे पत्रकारिता के सामने एक नया प्रश्न भी आएगा कि क्या वेबसाइट पर आने वाला ट्रैफिक वास्तव में पाठक है? कल्‍पना कीजिए, अगर लाखों एआई एजेंट किसी समाचार वेबसाइट की खबरें पढ़ रहे हों तो पेज व्‍यूज का मतलब क्या होगा?

इंसान और मशीन के बीच नई सीमा

दिलचस्प यह है कि एआई ने केवल मशीनों को इंसान के करीब नहीं पहुंचाया है। उसने हमें यह सोचने पर भी मजबूर किया है कि आखिर इंसान होने की डिजिटल पहचान है क्या? क्या इंसान वह है जो कैप्‍चा हल कर ले?

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क्या इंसान वह है जिसके माउस मूवमेंटस सामान्य हैं? क्या इंसान वह है जिसके पास verified digital identity है? या फिर इंसान वह है जिसके पीछे वास्तविक उद्देश्य, जिम्मेदारी और जवाबदेही है? यहीं पर भविष्य की इंटरनेट व्यवस्था का सबसे बड़ा बदलाव छिपा है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि कैप्‍चा खत्म हो गया। अधिक सही बात यह है कि कैप्‍चा बदल रहा है।

कल तक इंसान मशीन को पहचानने की कोशिश करता था। अब मशीन इंसान को पहचानने की कोशिश कर रही है। और आने वाले वर्षों में शायद सबसे दिलचस्प स्थिति यह होगी कि दोनों एक-दूसरे को पहचानने में लगे होंगे।

(लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍प्‍णीकार है।)