खालिद रसूल
बलूचिस्तान पाकिस्तान के लोकतांत्रिक दावों के सामने सबसे कठिन सवालों में से एक बना हुआ है। इस प्रांत की स्थिति को केवल सुरक्षा या आतंकवाद के नजरिए से समझना मुश्किल है। यहां एक तरफ सशस्त्र उग्रवाद है, जिसने आम नागरिकों और सुरक्षा बलों दोनों की जान ली है। दूसरी तरफ जबरन गुमशुदगी, मनमानी हिरासत, विरोध प्रदर्शनों पर पाबंदी और राजनीतिक असहमति को दबाने के आरोप लंबे समय से सामने आते रहे हैं।
इन दोनों वास्तविकताओं को अलग करके नहीं देखा जा सकता। आम नागरिकों के खिलाफ हिंसा को किसी राजनीतिक शिकायत के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता। उसी तरह उग्रवाद से निपटने के नाम पर राज्य को कानून और न्यायिक प्रक्रिया से बाहर जाने की खुली छूट भी नहीं मिल सकती।असल सवाल यही है कि क्या कोई राज्य आतंकवाद और हिंसा का मुकाबला करते हुए अपने नागरिकों के मौलिक अधिकारों की भी रक्षा कर सकता है?
In Balochistan, the law of the jungle continues unabated. Military operations, fake encounters, extrajudicial mass killings, and enforced disappearances have turned people's lives upside down. #EndEnforcedDisappearances #Balochistan pic.twitter.com/dPLSBzYCr9
— Shahbaaz (@ShehbaazKashmir) September 26, 2026
जब लोग अचानक गायब हो जाते हैं
बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी सबसे गंभीर मानवाधिकार मुद्दों में शामिल है। ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान यानी एचआरसीपी ने प्रांत में तथ्य खोजने के बाद अपनी रिपोर्ट ‘बलूचिस्तान: नेगलेक्टेड स्टिल’ में गुमशुदगी की घटनाओं और राजनीतिक उपेक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं दर्ज की हैं। रिपोर्ट में सुरक्षा एजेंसियों पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों और लापता लोगों के मामलों में जवाबदेही की कमी का उल्लेख किया गया है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी कई व्यक्तिगत मामलों का उल्लेख किया है। उसके अनुसार बलूच स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष जियांद बलूच को 24 जुलाई 2026 को उनके घर से कथित तौर पर जबरन उठा लिया गया। संगठन के मुताबिक, छापेमारी के दौरान उनके परिवार को धमकाया गया और उनके साथ मारपीट की गई। एमनेस्टी के अनुसार, यह उनकी कथित जबरन गुमशुदगी का तीसरा मामला था।
ऐसे मामलों में सबसे बुनियादी सवाल कानून के शासन से जुड़ता है। अगर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है तो उसके परिवार को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उसे किस आरोप में और कहां रखा गया है। अदालत के सामने पेश करना और कानूनी सहायता उपलब्ध कराना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी जिम्मेदारी मानी जाती है।
जब किसी व्यक्ति के ठिकाने की जानकारी ही परिवार से छिपा दी जाए, तो न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
The security establishment treated Balochistan as a silent periphery through total media blackouts and enforced disappearances. @World_Back1 @noormullakhail5 @daoudmiakhel pic.twitter.com/2Zkx8KEoV1
— Fatima Khan (@bibif4743) September 27, 2026
परिवारों की लंबी लड़ाई
लापता लोगों के परिवारों ने वर्षों से अपनी आवाज सरकार और जनता तक पहुंचाने की कोशिश की है। कई परिवार राजधानी इस्लामाबाद तक पहुंचे। नेशनल प्रेस क्लब के बाहर धरने हुए। बलूच यकजेहती कमेटी यानी बीवाईसी के नेताओं की रिहाई और जबरन गुमशुदगी रोकने की मांग को लेकर भी लंबे विरोध प्रदर्शन हुए।
प्रदर्शनकारियों ने पुलिस बैरिकेडिंग, उत्पीड़न और शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही महिलाओं तथा बच्चों के खिलाफ बल प्रयोग के आरोप लगाए। इन परिवारों के संघर्ष को बीबीसी सहित कई मीडिया संस्थानों ने भी रिपोर्ट किया है।
इन घटनाओं को केवल कानून व्यवस्था का मुद्दा मान लेना समस्या को छोटा कर देता है। किसी परिवार का सदस्य वर्षों तक लापता रहे तो उसका असर सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं पड़ता। पूरा परिवार अनिश्चितता में जीता है। न उन्हें मौत की पुष्टि मिलती है और न वापसी की कोई निश्चित उम्मीद।
छात्र और युवा कार्यकर्ता भी घेरे में
बलूचिस्तान में छात्रों और युवा कार्यकर्ताओं की स्थिति भी चिंता का विषय रही है। विश्वविद्यालय और नागरिक संस्थाएं सामान्य तौर पर बहस, राजनीतिक भागीदारी और असहमति के लिए जगह उपलब्ध कराती हैं। लेकिन जब शांतिपूर्ण सक्रियता को सुरक्षा खतरे से जोड़कर देखा जाने लगे तो इसका असर पूरे समाज पर पड़ता है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने जियांद बलूच के मामले को बलूच छात्रों पर कार्रवाई के व्यापक संदर्भ में रखा है। संगठन ने मानवाधिकार कार्यकर्ता फौजिया बलूच के भाई दाद शाह के मामले का भी उल्लेख किया है। रिपोर्ट के अनुसार उन्हें 21 अप्रैल को कराची स्थित उनके घर से कथित तौर पर आतंकवाद रोधी विभाग के अधिकारियों ने हिरासत में लिया और बाद में उनका पता नहीं चला। संगठन का कहना है कि प्रत्यक्षदर्शियों की मौजूदगी के बावजूद मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई।
ये गंभीर आरोप हैं। ऐसे मामलों में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की जरूरत होती है। किसी आरोप को केवल राजनीतिक बयानबाजी से खारिज करना भी समाधान नहीं है और बिना जांच उसे अंतिम सत्य मान लेना भी उचित नहीं होगा।
Decades of heavy-handed military operations, enforced disappearances, and resource plunder have created an irreversible security crisis in Balochistan.@World_Back1 @DureshewarB @noormullakhail5 pic.twitter.com/HdGGY0piAp
— Nathan Jones (@nathan019970) September 24, 2026
आतंकवाद रोधी कानून और निष्पक्ष सुनवाई
बलूचिस्तान में सुरक्षा कानूनों के इस्तेमाल को लेकर भी बहस जारी है। 22 जून 2026 को क्वेटा की एक आतंकवाद रोधी अदालत ने बलूच यकजेहती कमेटी की नेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. महरंग बलूच तथा उनके साथी कार्यकर्ता सिबघतुल्लाह शाहजी को उम्रकैद की सजा सुनाई।
यह मामला 2024 में ग्वादर में हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान फ्रंटियर कोर के एक जवान की मौत से जुड़ा था। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने सुनवाई की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। संगठन के अनुसार मुकदमा जेल परिसर में जल्दबाजी में चलाया गया और बचाव पक्ष को निष्पक्ष सुनवाई के पर्याप्त अवसर नहीं मिले।
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भी इस मामले में कानूनी प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई। उनके अनुसार मुकदमे को जेल में स्थानांतरित किया गया और डॉ. महरंग बलूच को व्यक्तिगत रूप से सुनवाई में शामिल होने के पर्याप्त अवसर नहीं मिले। विशेषज्ञों ने उनके खिलाफ दर्ज अन्य मामलों की संख्या को लेकर भी चिंता व्यक्त की।
दूसरी तरफ पाकिस्तानी अधिकारियों का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। अधिकारियों ने कुछ कार्यकर्ता नेटवर्कों पर उग्रवादी संगठनों से संबंध होने के आरोप लगाए हैं और अपनी कार्रवाई को आतंकवाद विरोधी कदम बताया है। ऐसे आरोपों की स्थिति में खुली और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
यदि किसी व्यक्ति पर आतंकवाद से जुड़े अपराध का आरोप है तो उसके खिलाफ सबूत अदालत में पेश किए जाने चाहिए। उसे वकील रखने, आरोपों का जवाब देने और निष्पक्ष सुनवाई पाने का अधिकार होना चाहिए। सुरक्षा कानूनों का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को बदलना नहीं हो सकता।
नागरिक सरकार की भूमिका पर सवाल
पाकिस्तान में नागरिक और सैन्य संस्थाओं के संबंध लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रहे हैं। बलूचिस्तान में यह सवाल और गंभीर हो जाता है क्योंकि सुरक्षा नीति का प्रभाव राजनीतिक और नागरिक जीवन पर भी दिखाई देता है।
सवाल यह है कि सुरक्षा एजेंसियों और आतंकवाद विरोधी अभियानों पर वास्तविक नागरिक निगरानी कितनी प्रभावी है? क्या चुनी हुई सरकारें सुरक्षा संस्थाओं के खिलाफ लगे आरोपों की स्वतंत्र जांच करा सकती हैं? क्या किसी हिरासत में लिए गए व्यक्ति के बारे में परिवार को जानकारी दिलाने के लिए नागरिक प्रशासन प्रभावी हस्तक्षेप कर सकता है?
हर निर्वाचित प्रतिनिधि को सुरक्षा प्रतिष्ठान का प्रतिनिधि मान लेना भी सही नहीं होगा। कई स्थानीय नेता अपनी जनता की समस्याओं को उठाने की कोशिश करते हैं। लेकिन संस्थागत जवाबदेही का सवाल अपनी जगह बना रहता है।
लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। चुनाव उसके एक हिस्से हैं। इसके साथ स्वतंत्र संस्थाएं, न्यायिक निगरानी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने की आजादी भी जरूरी होती है।
एचआरसीपी ने बलूचिस्तान के विश्वविद्यालयों में सुरक्षा बलों की मौजूदगी को लेकर भी चिंता दर्ज की है। रिपोर्ट के अनुसार इससे नागरिक प्रशासन और प्रांतीय संस्थाओं की भूमिका प्रभावित हुई है।

सुरक्षा की जरूरत और उसकी सीमाएं
बलूचिस्तान में पाकिस्तान की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सशस्त्र समूहों ने नागरिकों और सुरक्षा बलों को निशाना बनाया है। सार्वजनिक संस्थानों और परिवहन पर भी हमले हुए हैं।
सितंबर 2026 की शुरुआत में कलात जिले में एक सैन्य अभियान के दौरान पाकिस्तानी सेना ने 12 उग्रवादियों को मार गिराने का दावा किया था। सेना ने उन्हें भारत समर्थित नेटवर्क से जुड़ा बताया और हथियार तथा विस्फोटक बरामद करने की बात कही थी। ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग विषय है।
मार्च 2025 में जाफर एक्सप्रेस पर हमला भी बलूचिस्तान में जारी हिंसा की गंभीरता दिखाता है। बलूच लिबरेशन आर्मी से जुड़े उग्रवादियों ने ट्रेन पर कब्जा कर सैकड़ों यात्रियों को बंधक बनाया था। इसके बाद सुरक्षा बलों ने अभियान चलाया। पाकिस्तानी अधिकारियों ने बड़ी संख्या में उग्रवादियों के मारे जाने की बात कही। इस घटना में 20 से अधिक बंधकों की भी मौत हुई थी।
आम नागरिकों के खिलाफ ऐसी हिंसा किसी भी स्थिति में गंभीर अपराध है। लेकिन इसी के साथ सुरक्षा अभियान चलाने वाली संस्थाओं की जवाबदेही भी जरूरी है।
किसी छात्र कार्यकर्ता को केवल उसकी राजनीतिक सक्रियता के कारण उग्रवादी नहीं माना जा सकता। किसी पत्रकार की आलोचनात्मक रिपोर्ट उसे राज्य का दुश्मन नहीं बना देती। मानवाधिकार कार्यकर्ता होना भी आतंकवाद का प्रमाण नहीं है। और अपने लापता परिजन के बारे में जवाब मांगना किसी विद्रोह के बराबर नहीं माना जा सकता।
अविश्वास का बढ़ता दायरा
अत्यधिक सैन्यीकरण का असर केवल सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता। जब लोगों को लगातार संदेह की नजर से देखा जाता है, शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगते हैं, कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया जाता है और परिवारों को अपने लापता रिश्तेदारों की जानकारी नहीं मिलती, तो राज्य और नागरिकों के बीच भरोसा कमजोर होता है।
यहीं से एक कठिन चक्र शुरू होता है।
दमन से अविश्वास बढ़ता है। अविश्वास राजनीतिक अलगाव को बढ़ा सकता है। अलगाव से संवाद की संभावनाएं कम होती हैं। और फिर उसी अलगाव को सुरक्षा समस्या के रूप में देखा जाता है।इस चक्र को तोड़ना आसान नहीं है। इसके लिए राजनीतिक संवाद, संस्थागत सुधार और जवाबदेही की जरूरत होगी।
बलूचिस्तान सिर्फ सुरक्षा का मुद्दा नहीं
बलूचिस्तान को केवल आतंकवाद और सैन्य अभियानों के आंकड़ों से समझना पर्याप्त नहीं होगा। इस कहानी के केंद्र में वे परिवार भी हैं जो अपने लापता रिश्तेदारों को खोज रहे हैं। वे छात्र हैं जो राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर आवाज उठाना चाहते हैं। वे पत्रकार हैं जो घटनाओं की रिपोर्टिंग करते हैं। वे वकील हैं जो विवादित मामलों में बचाव का प्रयास करते हैं।
इन सभी लोगों के अधिकार इस बात से तय नहीं होने चाहिए कि उनकी राय सरकार या सुरक्षा प्रतिष्ठान के पक्ष में है या विपक्ष में।मानवाधिकार का सिद्धांत इसी बिंदु पर महत्वपूर्ण हो जाता है। नागरिकों पर हिंसा करने वाले उग्रवादी समूहों से जवाबदेही मांगी जानी चाहिए। वहीं राज्य संस्थाओं पर जबरन गुमशुदगी, अवैध हिरासत, यातना या निष्पक्ष सुनवाई से जुड़े आरोप हों तो उनकी भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।एक व्यवस्था में कानून सबके लिए समान होना चाहिए।
The forced disappearances and extrajudicial killings of Baloch leaders and activists by the Pak military have become a systematic method of silencing political dissent in Balochistan.@b51833638 @Miqbal_BRP @a_siab pic.twitter.com/706fu6B4Lk
— Andrin Krause (@andrin199720) September 22, 2026
आगे का रास्ता क्या हो सकता है
बलूचिस्तान की स्थिति में सुधार के लिए सबसे पहले गुमशुदगी के मामलों की स्वतंत्र जांच जरूरी है। परिवारों को अपने लापता सदस्यों की जानकारी मिलनी चाहिए। जिन लोगों पर अपराध के आरोप हैं, उनके मामलों की सुनवाई पारदर्शी अदालतों में होनी चाहिए।
मीडिया और स्वतंत्र पर्यवेक्षकों को न्यायिक कार्यवाही तक पहुंच मिलनी चाहिए। विश्वसनीय मानवाधिकार संस्थाओं को भी घटनाओं की जांच करने की अनुमति मिलनी चाहिए।इसके साथ सुरक्षा एजेंसियों और हिरासत व्यवस्था पर नागरिक प्रशासन की प्रभावी निगरानी आवश्यक है।
यह मांग किसी एक राजनीतिक पक्ष के समर्थन या विरोध का मामला नहीं है। यह कानून के शासन से जुड़ा सवाल है।पाकिस्तान की संप्रभुता का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन संप्रभुता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि मानवाधिकारों से जुड़े आरोपों की जांच ही न हो।
राज्य की असली परीक्षा
किसी राज्य की ताकत केवल उसके सुरक्षा ढांचे से नहीं मापी जाती। यह भी देखा जाता है कि उसकी संस्थाएं आलोचना और असहमति को किस तरह संभालती हैं।बलूचिस्तान में स्थायी शांति के लिए दो चुनौतियों पर एक साथ काम करना होगा। पहली चुनौती सशस्त्र उग्रवाद और नागरिकों के खिलाफ हिंसा है। दूसरी चुनौती राज्य संस्थाओं पर लगे मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप और उनसे पैदा हुआ अविश्वास है।
इनमें से किसी एक को नजरअंदाज करने से समस्या खत्म नहीं होगी।
न्याय के बिना सुरक्षा लंबे समय तक स्थिरता की गारंटी नहीं दे सकती। राजनीतिक भागीदारी के बिना विकास अलगाव को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता। नागरिक निगरानी के बिना चुनाव जवाबदेही सुनिश्चित नहीं कर सकते। और उचित कानूनी प्रक्रिया के बिना आतंकवाद विरोधी अभियान लोगों के बीच भय और अविश्वास बढ़ा सकते हैं।
बलूचिस्तान आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। एक रास्ता और अधिक सैन्यीकरण और गहरे होते अविश्वास की तरफ जा सकता है। दूसरा रास्ता स्वतंत्र जांच, पारदर्शी सुनवाई, शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों के लिए जगह, स्वतंत्र पत्रकारिता, प्रभावी नागरिक प्रशासन और मानवाधिकार उल्लंघनों पर जवाबदेही से होकर गुजरता है।
आखिरकार सवाल सिर्फ बलूचिस्तान का नहीं है। सवाल यह भी है कि पाकिस्तान अपने लोकतांत्रिक संस्थानों को किस दिशा में ले जाना चाहता है।किसी भी राज्य की वास्तविक मजबूती केवल इस बात में नहीं होती कि उसके नागरिक उससे कितना डरते हैं। उसकी असली परीक्षा यह है कि उसके नागरिक उसकी संस्थाओं पर कितना भरोसा कर सकते हैं।