नौशाद अख्तर
बिहार के ऐतिहासिक शहर गया जी के एक शांत कस्बे आबगीला का नाम सुनते ही लोग इसे एक साधारण सा इलाका समझ लेते हैं। लेकिन इस मिट्टी का नाता ईरान के मश्हद, कड़ा मानिकपुर और दिल्ली की सल्तनत कालीन इतिहास से जुड़ा है। आबगीला की गलियों में बिखरी 800 साल पुरानी तारीख इसे बेहद खास बनाती है।
गया के इस कदीम इलाके में तुगलक के जमाने से सादात खानदान आबाद है। स्थानीय निवासी सैयद नजम इमाम बताते हैं कि उनका खानदान बीते 248 सालों से यहाँ बसा है। जबकि आबगीला की अपनी तारीख करीब आठ शताब्दियों पुरानी है।
इतिहास के पन्नों को टटोलें तो चार बड़ी किताबों में आबगीला का स्पष्ट जिक्र मिलता है। इनमें मौलाना मोहम्मद तहा कमाल नदवी की 'हयात फरीद', मौलाना सैयद रियासत अली नदवी की 'अहद इस्लामी का हिंदुस्तान', सैयद अहमद उल्लाह नदवी की 1965 में कराची से प्रकाशित 'तस्कीरा मुस्लिम शोर बिहार' और हजरत सैयद शाता हुसैन फानी द्वारा 1272 हिजरी में बंबई से छपवाई गई फारसी किताब 'कंजुल अंसार' शामिल हैं।
इतिहासकारों और पुरानी किताबों में इस बात का जिक्र है कि हजरत मखदूम शामीना रिजवी मश्हदी रहमतुल्ला अलैह ईरान के पवित्र शहर मश्हद से भारत आए थे। वे इमाम मूसा रजा अलैहिस्सलाम की औलाद में से थे। पुरानी रिवायतों के अनुसार दो बुजुर्ग भाइयों में से एक भाई कड़ा मानिकपुर होते हुए आबगीला में आकर बस गए। वहीं दूसरे भाई दिल्ली में तुगलक दौर की शाही मस्जिद के इमाम बने।
कुछ इतिहासकारों के बीच दिल्ली की जामा मस्जिद और तुगलकी दौर की मस्जिद को लेकर संशय रहा है। हालांकि अहमद उल्लाह नदवी के शोध और मखदूम बिहारी की किताबों के विवरण से स्पष्ट होता है कि यह वाकया तुगलक काल का ही है। मखदूम शर्फा बिहारी के अंतिम समय में काजी मीना का जिक्र आता है। यह विवरण इसी दौर के समकालीन इतिहास की पुष्टि करता है।
आबगीला की यह पावन धरती आज भी अपने भीतर प्राचीन इस्लामी इतिहास, पुरानी पांडुलिपियों और सादात खानदान की अनमोल विरासत को समेटे हुए है।