मेवात की पगड़ी पर आधुनिकता की मार, मिट रही ' फेंटे' की पहचान

Story by  यूनुस अल्वी | Published by  [email protected] | Date 27-09-2026
Modernity takes a toll on the Mewat turban; the identity of the 'Phenta' is fading.
Modernity takes a toll on the Mewat turban; the identity of the 'Phenta' is fading.

 

यूनुस अलवी/ मेवात/हरियाणा

मेवात में कभी किसी बुजुर्ग के सिर पर बंधा सफेद फेंटा देखते ही उसकी उम्र, सामाजिक हैसियत और अनुभव का अंदाजा लगाया जाता था। गांव की चौपाल हो या पंचायत, शादी का समारोह हो या कोई सामाजिक आयोजन, पगड़ी यानी फेंटा मेवाती समाज की पहचान का हिस्सा हुआ करता था। किसी सम्मानित व्यक्ति के सिर पर फेंटा बांधना सम्मान की परंपरा थी। इसे मेवात की शान और चौधर से भी जोड़कर देखा जाता रहा है।

लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। आधुनिक पहनावे, बदलती जीवनशैली और नई पीढ़ी की पसंद ने मेवाती पगड़ी को रोजमर्रा की जिंदगी से काफी दूर कर दिया है। गांवों में अब सफेद फेंटा बांधे बुजुर्ग तो दिखाई देते हैं, लेकिन युवाओं के सिर पर कैप और आधुनिक फैशन ज्यादा नजर आता है। पिछले 15 से 20 वर्षों में यह बदलाव खास तौर पर तेज हुआ है।

मेवात की पगड़ी का सवाल केवल एक पहनावे के कम होने का नहीं है। स्थानीय बुद्धिजीवी इसे मेवाती संस्कृति और पुरानी सामाजिक परंपराओं में आए बड़े बदलाव के रूप में देखते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता और मेवात जिला परिषद के पूर्व वाइस चेयरमैन नूरूद्दीननूर कहते हैं,”पिछले 40 से 50 वर्षों में मेवात की जीवनशैली से जुड़ी कई चीजें धीरे धीरे गायब हुई हैं।“

उनके मुताबिक, “ अकेली पगड़ी नहीं बदल रही है। मेवात की पुरानी संस्कृति से जुड़ी बहुत सी चीजें समय के साथ पीछे छूट गई हैं। पुराने कुएं, बैठकें, सराय, प्याऊ, पारंपरिक जेवर, लोक वाद्य यंत्र, मिट्टी के मटके, हांडी और चूल्हे अब पहले की तरह दिखाई नहीं देते। फ्रिज ने मटके की जरूरत कम कर दी। गैस चूल्हे ने पारंपरिक चूल्हे को पीछे कर दिया। इसी तरह आधुनिक कपड़ों ने पगड़ी के इस्तेमाल को सीमित कर दिया।

नूरूद्दीननूर की बात में मेवात के बदलते ग्रामीण जीवन की तस्वीर दिखाई देती है। कभी पगड़ी केवल सिर ढकने का साधन नहीं थी। वह सामाजिक पहचान थी। उसे सम्मान, अनुभव, जिम्मेदारी और बड़प्पन से जोड़ा जाता था। आज भी शादी या किसी बड़े सामाजिक कार्यक्रम में किसी बुजुर्ग या अतिथि को फेंटा बांधा जाता है। लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में इसका इस्तेमाल लगातार घट रहा है।

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तरसी का फेंटा था खास पहचान

मेवात में कई तरह के फेंटे प्रचलित रहे हैं। इनमें ‘तरसी का फेंटा’खास माना जाता है। स्थानीय जानकारों के अनुसार इसे एक विशेष प्रकार के कपड़े से तैयार किया जाता था। यह कपड़ा बिहार के भागलपुर से आने की बात कही जाती है। अपनी मजबूती और बनावट के कारण तरसी का फेंटा प्रतिष्ठा और रुतबे से जुड़ा रहा है।

तरसी का फेंटा हर व्यक्ति के पास नहीं होता। इसकी कीमत अपेक्षाकृत अधिक और उपलब्धता भी सीमित रहती थी। इसलिए इसे खास अवसरों पर पहना जाता था। स्थानीय दुकानदारों के अनुसार आज भी इसकी मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कई बार ग्राहक की मांग पर इसे मंगाया जाता है।

मेवात की पारंपरिक पगड़ी में सफेद रंग सबसे ज्यादा लोकप्रिय रहा है। किसान खेत में काम करते हुए भी इसे बांधते थे। गांव की चौपाल में बैठे बुजुर्ग भी सफेद फेंटा पहने नजर आते थे। तेज धूप और गर्मी से सिर को बचाने के साथ यह पहनावा मेवाती ग्रामीण जीवन का हिस्सा बन गया था।

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ggपगड़ी से पहचाना जाता था सामाजिक रुतबा

मेवात में पगड़ी की अपनी सामाजिक भाषा थी। किसी व्यक्ति के सिर पर बंधे फेंटे से उसकी उम्र और सामाजिक स्थिति का अंदाजा लगाया जाता था। चौपाल में पगड़ी बांधे बुजुर्गों की बात को गंभीरता से सुना जाता था। पंचायत और सामाजिक बैठकों में भी पगड़ी का महत्व था।

किसी व्यक्ति को पगड़ी पहनाना सम्मान का प्रतीक माना जाता था। कई सामाजिक संदर्भों में पगड़ी सम्मान और प्रतिष्ठा से जुड़ी रही। इसीलिए मेवाती समाज में पगड़ी को केवल कपड़ा मानना इसकी भूमिका को छोटा कर देना होगा।

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शादी ब्याह और दूसरे सामाजिक आयोजनों में भी फेंटा बांधने की परंपरा रही है। कार्यक्रम शुरू होने से पहले बड़ों और खास मेहमानों को फेंटा बांधकर सम्मानित किया जाता था। यह परंपरा आज भी कुछ इलाकों में मौजूद है, लेकिन पहले जैसी व्यापक नहीं रही।

तब्लीग जमात के प्रभाव का भी जिक्र

स्थानीय स्तर पर कुछ लोग मेवात में फेंटा परंपरा के कमजोर होने को सामाजिक और धार्मिक बदलावों से भी जोड़ते हैं। इनमें तब्लीग जमात के बढ़ते प्रभाव का उल्लेख किया जाता है। हालांकि, इसे पगड़ी के कम होने का अकेला कारण मानना सही नहीं। आधुनिक शिक्षा, रोजगार, शहरी संपर्क, बदलती फैशन पसंद और जीवनशैली भी इसके पीछे महत्वपूर्ण कारण हैं।

नूरूद्दीननूर का कहना है कि किसी आदेश या कुछ लोगों की कोशिश से पगड़ी को वापस नहीं लाया जा सकता। समाज को खुद इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान और सम्मान से जोड़ना होगा। जब लोग इसे अपनी विरासत मानकर अपनाएंगे, तभी यह परंपरा लंबे समय तक बच सकेगी।

उनके अनुसार,”आज एक दिलचस्प बदलाव दिखाई देता है। सम्मान देने के लिए किसी व्यक्ति के सिर पर पगड़ी बांधी जाती है, लेकिन सम्मान देने वाला खुद रोजमर्रा में पगड़ी नहीं पहनता। इस तरह पगड़ी धीरे धीरे दैनिक जीवन की पहचान से निकलकर एक रस्म बनती जा रही है।“

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मेवात के नेताओं ने भी बढ़ाई पगड़ी की शान

मेवात की पगड़ी का रिश्ता केवल गांवों के चौधरियों और बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहा। इस परंपरा को राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र के कई प्रमुख लोगों ने भी अपनाया। तीन राज्यों में मंत्री और सांसद रहे तैयब हुसैन, पूर्व मंत्री और सांसद रहीम खान, पूर्व मंत्री अजमत खान, पूर्व विधायक जलेब खान, पूर्व विधायक कबीर अहमद, पूर्व विधायक हामिद हुसैन और पूर्व विधायक अब्दुल रजाक माहौली जैसे नेताओं ने लंबे समय तक पगड़ी पहनी।

मोहम्मद इलयास भी कई मौकों पर पारंपरिक पगड़ी में नजर आते रहे हैं। नई पीढ़ी के नेताओं में विधायक आफताब अहमद, पूर्व विधायक जाकिर हुसैन, पूर्व डिप्टी स्पीकर आजाद मोहम्मद, विधायक मामन खान, विधायक इसराइल खान, पूर्व विधायक रहीस खान और पूर्व विधायक नसीम अहमद को भी खास अवसरों पर पगड़ी पहने देखा गया है।

चौधरियों से शुरू हो सकती है पहल

सिरौली क्षेत्र के 22 गांवों के चौधरी शौकत अली उर्फ घुड़चढ़ी का कहना है कि पगड़ी मेवात की पुरानी पहचान और चौधर की शान रही है। उनके अनुसार पहले चौधरी और बुजुर्ग नियमित रूप से पगड़ी बांधते थे। अब कई चौधरी और बुजुर्ग भी इसे छोड़ चुके हैं।

शौकत अली मानते हैं कि अगर समाज के जिम्मेदार लोग खुद पगड़ी पहनना शुरू करें तो नई पीढ़ी पर उसका असर पड़ेगा। उनके अनुसार इसे केवल सम्मान समारोह तक सीमित नहीं रखना चाहिए। गांवों और पालों के प्रमुख लोग इसे अपनी दैनिक पहचान का हिस्सा बनाएं तो परंपरा को फिर मजबूत किया जा सकता है।

जिला पार्षद और सामाजिक व्यक्ति उमर सरपंच पाड़ला भी पगड़ी को मेवाती बुजुर्गों की पहचान और सामाजिक सम्मान से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि समय के साथ पहनावा बदला है। नई पीढ़ी पारंपरिक वेशभूषा से दूर हुई है। ऐसे में सामाजिक आयोजनों के जरिए युवाओं को मेवाती संस्कृति और पगड़ी के महत्व से परिचित कराया जाना चाहिए।

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परंपरा रोकने की नहीं, बचाने की जरूरत

मेवात की पगड़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती बदलता समय है। आधुनिकता को रोकना न संभव है और न जरूरी। लेकिन आधुनिक जीवन के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को बचाए रखना भी जरूरी है।

मेवाती पगड़ी को स्कूलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, शादी समारोहों और सामाजिक आयोजनों से जोड़ा जा सकता है। मेवाती संस्कृति पर स्थानीय स्तर पर कार्यक्रम हों। पुरानी पीढ़ी युवाओं को फेंटा बांधने की कला और उसके सामाजिक महत्व के बारे में बताए। इससे परंपरा केवल तस्वीरों और पुराने किस्सों तक सीमित नहीं रहेगी।

मेवात की पगड़ी आज पहले की तरह हर सिर पर दिखाई नहीं देती। फिर भी इसकी कहानी खत्म नहीं हुई है। सफेद फेंटा आज भी कई बुजुर्गों के सिर पर मेवात की पुरानी तस्वीर की तरह नजर आता है। यह तस्वीर बताती है कि कपड़े का एक टुकड़ा भी किसी समाज की स्मृति, सम्मान और पहचान को अपने भीतर समेट सकता है।

जरूरत इसे अतीत की चीज समझकर छोड़ने की नहीं, बल्कि बदलते समय के साथ इसकी जगह तलाशने की है। अगर मेवात की नई पीढ़ी अपनी इस विरासत को समझे और समाज के बुजुर्ग इसके महत्व को आगे बढ़ाएं, तो फेंटा केवल इतिहास का हिस्सा बनकर नहीं रहेगा। वह मेवात की बदलती पहचान के बीच अपनी जगह बनाए रख सकता है।